Sant Shri Asharamji Ashram द्वारा
Serving Humanity हेतु ध्यान योग साधना शिविरों के माध्यम से मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के साथ अपने आत्मतत्व को जानने की कला सिखाई जाती है ताकि मनुष्य जीते जी मुक्ति का अनुभव कर सके
#SelflessServices
https://t.co/IQ0CK7ptHZ
भारत की अप्रतिम शौर्य परंपरा को अपने अद्भुत अभिनय कौशल द्वारा हमारे प्राणधन शौर्य-स्वरूप छावा छत्रपति संभाजी महाराज के रूप में इतना जीवंत करने के लिए बहुत-बहुत बधाई @vickykaushal09 । अशेष शुभकामनाएँ ❤️🕉️🙏 #छावा
पूज्य Sant Shri Asharamji Bapu ने लाखों धर्मांतरित ईसाइयों को पुनः हिंदू बनाया व आदिवासी इलाकों में जाकर धर्म के संस्कार, मकान, जीवनोपयोगी सामग्री दी, जिससे धर्मान्तरण करानेवालों का धंधा चौपट हो गया।
Roots Of Religion
#LegacyOfHinduSaints
https://t.co/pvTA6gsxbD
20 - 30 secs के videos अपने-अपने agendas के मुताबिक लंबे चौड़े captions लिखकर viral करने वाले, मौक़ापरस्त, बिकाऊ लोग @DrKumarVishwas का ये video share नहीं करेंगे ....
सुनिए देश, मनुष्यता और सांझी विरासत पर कितनी महत्वपूर्ण बात कह गए जनकवि डॉ. कुमार विश्वास 👏🇮🇳
#KumarVishwas
@ArvindKejriwal अरविंद केजरीवाल जी आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था अपने माता-पिता के साथ राजनीतिक अलग है जांच पड़ताल अलग है और अपने अपने माता-पिता का उपयोग राजनीति के लिए कर लिए और मोदी जी को ब्लेम लगा रहे हैं तू बहुत गिरा हुआ इंसान है अरविंद केजरीवाल
सुप्रीम कोर्ट के कुछ जज इस चुनाव को प्रभावित करने के कोशिश में लगे हुए हैं। वह चुनावी मौक़े पर अपने शक्तियों का दुरुपयोग करने से भी बाज नहीं आ रहे। चाहे इलेक्टोरल बॉण्ड का विषय हो, बाबा रामदेव का विषय हो अथवा अब संविधान को तार तार करके केजरीवाल को बेल देने का मामला हो, यह पूरी तरह से चुनावों को प्रभावित करने का प्रयास है।
सुप्रीम कोर्ट जैसे माननीय संस्थानों को अपने एजेंडे के लिए जजों द्वारा प्रयोग करके उसे बदनाम करने का यह कार्य बहुत ही ओछा और निकृष्टता से भरा हुआ है।
भारत के इतिहास में शायद आज जजों द्वारा यह पहला फैसला होगा जिसने भारत के आम नागरिकों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया और नेता को प्रथम दर्जे का।
मैं भारत का नागरिक होने के नाते जजों द्वारा सुप्रीम कोर्ट को बदनाम करने वाले इस निर्णय की न केवल आलोचना करता हूँ बल्कि सुप्रीम कोर्ट से माँग करता हूँ कि संवैधानिक बेंच बनाकर आम नागरिकों को अपमानित करने वाले इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए। केजरीवाल को बेल मिले, न मिले से महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसका अधिकार आम नागरिकों के अधिकार से अधिक कैसे?
सुप्रीम कोर्ट हो अथवा कोई भी संस्था उसका मानहानि कोई आम व्यक्ति चाहकर भी तब तक नहीं कर सकता जब तक कि उसके निर्णयों में कोई पक्षपात न दिखे, संविधान का अपमान न दिखे। लेकिन यदि जज यह सोचते हैं कि कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के भरोसे वह न्यायालय की गरिमा बनाकर रख पायेंगे तो यह सोचना कोरी मूर्खता है।
मुख्य न्यायाधीश को संवैधानिक पीठ बनाकर केवल इस बात पर विचार करवाना चाहिए कि क्या नेताओं अधिकार आम आदमी के अधिकार से ज़्यादा हैं?
न्यायपालिका के इतिहास में एक शर्मनाक दिन।