Sri yantrodharak hanuman temple
(Hampi , Karnataka)
This 500yr old temple was established and consecrated by Brahman rajguru of Vijaynagar Empire sri vayasraj
Brahmans preserved this legacy by serving daily rituals
Pujyashri Shankara Vijayendra Saraswathi Shankaracharya Swamigal visited the Athur Veda Patashala and blessed the vidyarthis, adhyapaks and other devotees with Anugraha Bhashanam yesterday (11 Jan. 2026) #kamakoti
These are exactly the kind of initiatives we need to do to show that India is not just the world’s back office, but can also be its think tank…
More such projects, please, for creating knowledge at the frontiers of technology & exploration.
👏🏽👏🏽👏🏽
I’ve been posting stories about exotic locations & landscapes, but touring the great temples of India is a worthy obsession in itself…
Visiting them is more than a spiritual trip; the temples are visually breathtaking.
But it’s also an exploration of the world’s most sophisticated ancient engineering.
Brihadeeswara Temple in Thanjavur was built between 1003 and 1010 CE and constructed from granite, without any mortar, using a sophisticated interlocking stone technique that has withstood earthquakes for a millennium.
Video courtesy: @iAkankshaP
#SundayWanderer
1000 yrs of unbroken tradition Initiated by the Great Rajaraja Chola I 🔱
Divya darshan of Shiv Lingam abhishekam at the Brihadeeswarar Mandir, Thanjavur, TamilNadu
वेद + अंत = वेदांत, यानी वेदों का अंतिम, गूढ़ और परम निष्कर्ष। वैदिक काल (लगभग 1500-800 ईसा पूर्व) में धर्म का केंद्र यज्ञ, कर्मकांड और देवताओं की उपासना था, पर धीरे-धीरे यह प्रश्न उठने लगा कि क्या केवल यज्ञों से ही जीवन का अंतिम सत्य जाना जा सकता है। इसी जिज्ञासा से उपनिषद काल (800-300 ईसा पूर्व) आया और यहीं से वेदांत की वास्तविक शुरुआत हुई। लोगों ने पहली बार भीतर की ओर प्रश्न करना शुरू किया मैं कौन हूँ, आत्मा क्या है, मृत्यु के बाद क्या होता है, ब्रह्म क्या है। उपनिषदों ने उत्तर दिया कि आत्मा और ब्रह्म के संबंध को जान लेना ही मुक्ति है।
समय के साथ उपनिषदों के विचार अलग-अलग ऋषियों की अलग भाषाओं और प्रतीकों में बिखरे हुए थे। लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवी के बीच ऋषि बादरायण आए और उन्होंने इन सबको सूत्रबद्ध करके ब्रह्मसूत्र की रचना की, ताकि उपनिषदों के सार को एक ही ढांचे में समझा जा सके। पर समस्या यह थी कि ब्रह्मसूत्र अत्यंत संक्षिप्त और काव्यात्मक थे। एक ही सूत्र से कई-कई अर्थ निकल सकते थे कहीं ब्रह्म को निराकार कहा गया, कहीं सगुण, कहीं आत्मा को ब्रह्म बताया गया, तो कहीं भक्ति से मुक्ति की बात आई। अब प्रश्न उठा कि अंतिम सत्य कौन-सा माना जाए।
यहीं से आचार्यों की व्याख्याओं का दौर शुरू हुआ। हर आचार्य ने अपने अनुभव, तर्क और साधना के अनुसार अर्थ निकाले। इसलिए वेदांत एक ही होते हुए भी अलग-अलग रूपों में प्रकट हुआ। जो ज्ञान को प्रधान मानते थे, उन्होंने अद्वैत को महत्व दिया; जो भक्ति को प्रमुख मानते थे, उनके लिए विशिष्टाद्वैत और द्वैत उपयुक्त हुए; जो जीवन के व्यवहारिक पक्ष को देखते थे, उन्होंने भेदाभेद को स्वीकारा; और जो रहस्यात्मक अनुभव पर टिके थे, उनके लिए अचिन्त्य भेदाभेद आया। वेदांत को सबके लिए साध्य और चलने योग्य बनाना आवश्यक था।
फिर भक्ति आंदोलन आया। आम जनता संस्कृत नहीं जानती थी, इसलिए दर्शन को सरल और ईश्वर-केंद्रित बनाना पड़ा। विष्णु, कृष्ण, राम और शिव जैसे सगुण रूप केंद्र में आए और सगुण ब्रह्म पर जोर बढ़ा। शंकर ने ब्रह्म को शुद्ध चेतना के रूप में देखा, रामानुज ने सगुण ईश्वर के रूप में, और माध्व ने आत्मा-ईश्वर के द्वैत को स्पष्ट किया।
तो सबको समेटा जाए तो
वेदांत = एक नदी, कई धाराएँ
उपनिषद = स्रोत
ब्रह्मसूत्र = नदी का पाट
भाष्य = धाराएँ
सबका लक्ष्य एक: मोक्ष
रास्ते अलग: ज्ञान, भक्ति, कृपा, प्रेम
तो वेदांत कोई एक कठोर सिद्धांत नहीं, बल्कि चेतना की यात्रा है। वह यह नहीं कहता कि सब एक ही रास्ते से चलें, बल्कि यह सिखाता है कि हर व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार सत्य तक पहुँच सकता है। कोई ज्ञान से, कोई भक्ति से, कोई प्रेम से पर मंज़िल एक ही है: स्वयं को जान लेना।
जीवन यात्रा... 🚶♂️
श्री काशी विश्वनाथ धाम नवीनीकरण के चार वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में धाम में हुई भव्य सजावट
12 दिसम्बर 2025
श्री काशी विश्वनाथ धाम नवीनीकरण के चौथी वर्ष्गांठ 13 दिसम्बर 2025 को पूर्ण हो रही हैं। इस पावन अवसर पर 13 एवं 14 दिसम्बर को विविध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
धाम को इस उत्सव हेतु भव्य रूप से सजाया गया है। परिसर में प्रकाश अलंकरण, पुष्प सज्जा तथा श्रद्धालुओं की सुगमता के लिए विशेष व्यवस्थाएँ की गई हैं। दोनों दिनों में भक्तों के लिए भजन-गायन, वैदिक मंत्रोच्चार,सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ तथा दिव्य दर्शन की विशेष व्यवस्था रहेगी।
परियोजना के चार वर्ष पूर्ण होने पर यह आयोजन काशी की प्राचीन परम्परा, आस्था तथा नवनिर्माण की भावना का प्रतीक होगा।
#banaras #kashivishwanath #Harharmahadev #bholenath #shivbhakt
माघ मेले के इतिहास में पहली बार मेले के दर्शन तत्त्व को परिलक्षित करते हुए माननीय मुख्यमंत्री जी के स्तर से माघ मेले का लोगो जारी किया गया है। इस लोगो के अन्तर्गत तीर्थराज प्रयाग, संगम की तपोभूमि तथा ज्योतिषीय गणना के अनुसार माघ मास में संगम की रेती पर अनुष्ठान करने की महत्वता को समग्र रूप से दर्शाया गया है।
सर्वप्रथम लोगो में सूर्य एवं चंद्रमा की 14 कलाओं की उपस्थिति ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य, चंद्रमा एवं नक्षत्रों की स्थितियों को प्रतिबिंबित करता है जो प्रयागराज में माघ मेले का कारक बनता। भारतीय ज्योतिषीय गणना के अनुसार चंद्रमा 27 नक्षत्रों की परिक्रमा लगभग 27.3 दिनों में पूर्ण करता है। माघ मेला इन्हीं नक्षत्रीय गतियों के अत्यंत सूक्ष्म गणित पर आधारित है। जब सूर्य मकर राशि में होता है और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा माघी या अश्लेषा-पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रों के समीप होता है, तब माघ मास बनता है और उसी काल में माघ मेला आयोजित होता है।
चंद्रमा की 14 कलाओं का संबंध मानव जीवन, मनोवैज्ञानिक ऊर्जा और आध्यात्मिक साधना से माना गया है। माघ मेला चंद्र-ऊर्जा की इन कलाओं के सक्रिय होने का विशेष काल भी है। अमावस्या से पूर्णिमा की ओर चंद्रमा की वृद्धि (शुक्ल पक्ष) साधना की उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। माघ स्नान की तिथियाँ चंद्र कलाओं के अत्यंत सूक्ष्म संतुलन पर चुनी जाती हैं। माघ महीने की ऊर्जा (शक्ति) अनुशासन, भक्ति और गहन आध्यात्मिक कार्यों से जुड़ी होती है क्योंकि यह महीना पवित्र नदियों में स्नान, दान, तपस्या और कल्पवास जैसे कार्यों के लिए विशेष माना जाता है। इस माह में किए गए कार्य व्यक्ति को निरोगी बनाते हैं और उसे दिव्य ऊर्जा से भर देते हैं।
प्रयागराज का अविनाशी अक्षयवट, जिसकी जड़ों में भगवन ब्रह्मा जी का, तने में भगवन विष्णु जी का एवं शाखाओं और जटाओं में भगवन शिव जी का वास है, उसके दर्शन मात्र से मोक्ष मार्ग सरल हो जाता हैं। इसी कारण कल्पवासियों में उसका स्थान अद्वितीय है। सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हैं अतः महात्मा का चित्र इस देव भूमि में सनातनी परम्परा को दर्शाता है जहां चिर काल से ऋषि-मुनि आध्यात्मिक ऊर्जा हेतु आते रहे हैं।
माघ मास में किए गए पूजन एवं कल्पवास का पूर्ण फल संगम स्नान के उपरांत श्री लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन से प्राप्त होता है: अतः लोगों पर उनके मंदिर एवं पताका की उपस्थिति माघ मेले में किए गए तप की पूर्णता: की व्याख्या करता है। संगम पर साइबेरियन पक्षियों की उपस्थिति यहाँ के पर्यावरण की विशेषता को दर्शाता है। लोगो पर श्लोक "माघे निमज्जनं यत्र पापं परिहरेत् तत:" का अर्थ है माघ के महीने में स्नान करने से सभी पाप मुक्ति हो जाती है। यह लोगो मेला प्राधिकरण द्वारा आबद्ध किए गए डिजाइन कंसल्टेंट श्री अजय सक्सेना एवं प्रागल्भ अजय द्वारा डिजाइन किया गया।
@InfoDeptUP@UPGovt@CMOfficeUP@ChiefSecyUP
दुनिया में मनुष्य तीन प्रकार के हैं।
पहला - जो दृश्य बन गए।
दूसरा - जो दर्शक बन गए।
तीसरा - जो द्रष्टा बन गए।
इन तीनों को अलग-अलग समझना ज़रूरी है।
यदि तुम दृश्य बन जाते हो, तो तुम वस्तु हो गए तुमने अपनी आत्मा खो दी।
इसीलिए राजनेताओं में आत्मा को पाना कठिन है, अभिनेताओं में आत्मा को पाना कठिन है। वे दृश्य बन गए हैं। उनका जीवन इसी पर है कि लोग मुझे कैसे अच्छा समझें, मैं कैसे सुंदर लगूँ, कैसे श्रेष्ठ दिखूँ। श्रेष्ठ होने की चेष्टा नहीं, श्रेष्ठ दिखने की चेष्टा है। कैसे मैं श्रेष्ठ दिखाई दूँ!
जो दृश्य बनता है, वह पाखंडी हो जाता है। ऊपर से मुखौटे पहन लेता है, ऊपर से सब व्यवस्था कर लेता है और भीतर से गलता जाता है।
दूसरे वे हैं जो दर्शक बन गए।
इनकी भी बड़ी भीड़ है।
स्वाभाविक है पहली किस्म के लोगों के लिए दूसरी किस्म के लोगों की ज़रूरत होती है नहीं तो दृश्य किसके लिए बनेंगे?
कोई राजनेता बन जाता है, तो तालियाँ बजाने वाली भीड़ भी मिल जाती है। नेता हो, तो अनुयायी भी चाहिए। कोई नाच रहा हो, तो देखने वाले भी चाहिए। कोई गीत गा रहा हो, तो सुनने वाले भी चाहिए।
कुछ दृश्य बनने में लगे हैं, और कुछ दर्शक बने रह गए हैं।
दर्शकों की बड़ी भीड़ है।
पश्चिम के मनोवैज्ञानिक बहुत चिंतित हैं क्योंकि लोग बिल्कुल दर्शक होकर रह गए हैं।
फिल्म देखो, रेडियो चालू करो, टेलीविजन के सामने घंटों बैठ जाओ! अमेरिका में एक साधारण व्यक्ति रोज़ लगभग छह घंटे टीवी देख रहा है।
फुटबॉल मैच हो - देखने चले जाते हैं।
कुश्ती हो - देखने चले जाते हैं।
क्रिकेट हो - देखने चले जाते हैं।
ओलंपिक हो - देखने चले जाते हैं।
सिर्फ देखने वाले ही रह गए हैं। रास्ते के किनारे खड़े दर्शकों की तरह। जीवन का जुलूस निकल रहा है और तुम देख रहे हो।
कुछ हैं जो जीवन के जुलूस में शामिल हो गए वह थोड़ा कठिन काम है। वहाँ बड़ी प्रतिस्पर्धा है। जुलूस में समाया रहना थोड़ा मुश्किल है बहुत संघर्ष और आक्रामकता चाहिए। लेकिन जुलूस को देखने वाले भी चाहिए।
यदि वे न हों, तो जुलूस भी बेरस हो जाए।
सोचो ज़रा यदि अनुयायी न चलें, तो नेता का क्या होगा?
अकेला “झंडा ऊँचा रहे हमारा!” बहुत पागल दिखाई देगा!
रास्ते के किनारे लोग चाहिए, भीड़ चाहिए तब पागलपन भी ठीक लगता है।
सोचो ज़रा कोई देखने न आए, और क्रिकेट मैच चलता रहे मैच की जान निकल जाए!
मैच की जान मैच में नहीं है
वह तो देखने वाले लाखों लोगों में है।
अष्टावक्र कहते हैं मनुष्य का स्वभाव द्रष्टा का है।
न तो दृश्य बनना है, और न ही दर्शक।
इस बात को कभी मत भूलना।
अक्सर मैंने देखा है कुछ लोग यह भूल कर लेते हैं।
वे समझते हैं कि यदि दर्शक बन गए, तो द्रष्टा हो गए।
इन दोनों शब्दों में बहुत बुनियादी अंतर है।
भाषा-कोष में शायद कोई अंतर न मिले
वहाँ दर्शक और द्रष्टा का एक ही अर्थ लिखा होगा
लेकिन जीवन के कोष में बहुत बड़ा अंतर है।
दर्शक का अर्थ है दृष्टि दूसरे पर है।
और द्रष्टा का अर्थ है दृष्टि अपने पर है।
यदि दृष्टि देखने वाले पर टिकी है तो द्रष्टा।
और यदि दृष्टि दृश्य पर टिकी है तो दर्शक।
यह बहुत क्रांतिकारी भेद है बहुत बुनियादी भेद!
जब तुम्हारी नज़र दृश्य पर अटक जाती है
और तुम अपने आप को भूल जाते हो
तब तुम दर्शक हो।
और जब तुम्हारी दृष्टि से सारे दृश्य विदा हो जाते हैं,
सिर्फ तुम ही रहते हो
सिर्फ जागरण रहता है,
सिर्फ होश रहता है
तब तुम द्रष्टा हो
ओशो
अष्टावक्र महागीता (प्रवचन 03)
अष्टावक्र और उनके शिष्य राजा जनक का संवाद
13 सितम्बर 1976 ओशो आश्रम, पूना
People in India and around the world are thrilled.
For us, Deepavali is very closely linked to our culture and ethos. It is the soul of our civilisation. It personifies illumination and righteousness. The addition of Deepavali to the UNESCO Intangible Heritage List will contribute to the festival’s global popularity even further.
May the ideals of Prabhu Shri Ram keep guiding us for eternity.
@UNESCO
Humbled to be in the sacred land, the spiritual powerhouse of Bharat, Udupi = where
Lord Sri Krishna resides in eternal grace,
Mukhya Prana Lord Hanuman, stands as the eternal guardian,
and Jagadguru Sri Madhvacharya awakened generations with his profound wisdom.
Here to seek their blessings on the auspicious occasion of Bruhath Gitotsava, and to join devotees in celebrating the timeless message of the Bhagavad Gita - the very soul of our civilisation.
Under the visionary guidance of His Holiness Sri Sri Sugunendra Teertha Swamiji, this sacred land is witnessing historic spiritual movements, from the One Crore Handwritten Bhagavad Gita Project to the Laksha Kanta Parayana - inspiring millions across the world.
May the message of the Gita guide our actions, strengthen our society, and elevate our national spirit.
Jai Sri Krishna.
Jai Hanuman.
Jai Hind.
Thirupparankundram is the First of the Six Abodes of Lord Murugan (Kartikeya). The practice of lighting lamps atop the hill during the Tamil month of Karthigai is an ancient tradition of Hindus. It is sad and ironic that today the Hindus in Bharat have to seek judicial interventions to practice their faith and perform their rituals. If, even after winning a decisive legal battle, devotees cannot perform a simple, peaceful ritual on their own property, then where, in their own country, shall they truly find constitutional justice?
In short and simple, let all the Hindus in Bharat understand this - The bitter truth is - The Chennai High Court affirmed our right to light the Deepathoon - first by a single judge, then upheld by a higher bench. Legally, the battle was won. Yet, practically, we were forced to adjust.
Ask yourself - Can any religious festival be moved a week late? Can a holy day's celebration be shifted to a different time? No. Because the sanctity of religious time and the integrity of every religious calendar is non-negotiable.
Yet, for Sanatana Dharma, the moment—the sacred Karthigai Deepam—was stolen, vanished forever. Why? Because Hindus can be taken for granted. Sometimes it's the governments, sometimes it’s the executive, sometimes it’s the NGOs, sometimes it’s a random pseudo intellectual groups – but every time, it is Hindus who accept the loss and adjust. We secured the right, but lost the ritual. This repeated, systemic denial is why a time has come to demand more than just court victories - We need the Sanatana Dharma Raksha Board where devotees actively manage their own temples and religious affairs.
Mockery of Hindu traditions and rituals has become a norm for certain groups. Do they dare to do the same for other religious events?
Does Article 25 become an optional right instead of a fundamental right to the Hindus? Can a Police Commissioner or a District Magistrate unilaterally nullify a specific High Court Directive? If the High Court confirmed the Deepam lighting was a "harmless religious act" on legally owned land, who decides that this practice constitutes a threat to "communal harmony," and by what legal mechanism? How come HR&CE Department consistently and repeatedly act against the interests of Hindu devotees and their temple's traditions, and how do these officials evade serious accountability?
Hindus should observe the collective spirit and solidarity shown by practitioners of Abrahamic religions (religions of Arabian origin) when religious issues arise. They overcome their ethnic, regional, and linguistic differences for the sake of their faith.
As long as Hindus remain divided by caste, regional, and linguistic barriers, the mockery, insults, and abuses against the Hindu religion and its practices shall continue. If Hindus in our nation don't unite under a common minimum program with the collective spirit of Hindu Dharma (or Aram in Tamil), this spirit will be lost.
I hope for a day when every Hindu from Kashmir to Kanyakumari and Kamakhya to Dwarka wakes up to the humiliation Hindus face in their own land.
#Tiruparakundaram
#SanatanaDharmaRakshaBoard
शिवगर्जना की गूँज, ढोल-ताशाओं की थाप और ध्वज पथक का अद्भुत वैभव…
नागपुर से पधारे 70 सदस्यीय दल द्वारा श्री काशी विश्वनाथ धाम में
भगवान् श्री विश्वेश्वर को समर्पित दिव्य शिवांजलि। हर हर महादेव
IIश्री काशीविश्वनाथो विजयतेतराम II
#kashivishwanath#kashi#babavishwanath #sanatandharma #hinduism