United Kingdom: When asked that India's ancient philosophical tradition enters the world's top university, but is India ready to recognise its own worth?, philosopher Acharya Prashant says, "Yes, Political, ethnic, cultural, geographical boundaries divide us. But finally, we are one as a species. That oneness is at the base of all wisdom. Oneness - not only in terms of species, but also in terms of how we look at other species and how we look at the entire planet. So yes, there is a free exchange. Definitely, the West has progressed so much in the sciences and everything that has to do with the observed world. The West, we can say, has truly conquered the material and is still winning at newer frontiers. And India too is freely exchanging and has been doing that since long. The Vedantic knowledge was never a secret..."
Cambridge, UK: Addressing Cambridge Judge Business School on Inequality and Global Responsibility, philosopher Acharya Prashant said the root of global economic problems lies not in systems but in the human being making decisions.
He argued that science, economics, business, and medicine all ultimately aim at human welfare, but that human welfare itself cannot be achieved without understanding the inner self. When the person making choices lacks self-awareness, he said, even the most well-designed systems can become destructive.
लिप ग्लॉस 🫦 कोई प्यारा ब्यूटी ट्रेंड नहीं है; यह विकासक्रम की एक तरकीब है, जिसे “genital mimicry” कहा जा सकता है। गीला, लाल, सूजा हुआ लुक, उत्तेजित प्रजनन तंत्र में होने वाली अत्यधिक वासोडायलेशन (रक्त का तेज़ी से उन ऊतकों में भरना) और स्नेहन (lubrication) की कृत्रिम नकल करता है। 🫦💦 आप असल में एक प्राइमेट का मैथुन-प्रतिवर्त (mating reflex) खरीद रहे हैं, न कि सिर्फ चमक। 🧬👀
इसका एक सीधा संबंध है, लेकिन evolutionary biologists और psychologists इसे आम तौर पर स्त्री‑यौन‑उत्तेजना ���र जननांग‑अनुकृति (genital mimicry) के व���यापक संकेत के रूप में देखते हैं, न कि केवल विशेष रूप से oral sex के कार्य से जोड़ते हैं।
जब आप यह समझने के लिए विकासक्रम और जीवविज्ञान का चश्मा लगाते हैं कि दिमाग गीले, लाल होंठों पर क्यों प्रतिक्रिया करता है, तो बात आख़िरकार इस पर आकर टिकती है कि मनुष्यों ने यौन‑तत्परता (sexual readiness) के संकेत देने के लिए कैसे विकास किया। इसका यांत्रिक विश्लेषण इस प्रकार है:
## 1. “Genital Echo” सिद्धांत
1967 में evolutionary zoologist डेसमंड मॉरिस ने अपनी किताब *The Naked Ape* में **self-mimicry** या **genital echo** के नाम से एक विचार प्रस्तुत किया।
प्राइमेट्स में मनुष्य अनोखे हैं, क्योंकि हम आमने‑सामने संभोग के लिए बहुत अनुकूलित हैं; द्विपाद गति (bipedalism, दो पैरों पर चल��ा) ने हमारे यौन संकेतों को शरीर के सामने वाले हिस्से की ओर खिसका दिया। मॉरिस ने यह सिद्धांत दिया कि मानव स्त्रियों के स्थायी रूप से बाहर की ओर मुड़े हुए (everted), मांसल लाल होंठ खास तौर पर लैबिया (स्त्री जननांग के बाहरी भाग) की आकृति की नकल करने के लिए विकसित हुए।
यौन उत्तेजना के दौरान, दोनों प्रकार के ऊतक वासोडायलेशन से गुज़रते हैं (उनमें रक्त भर जाता है) और वे अधिक लाल और सूजे हुए दिखने लगते हैं। ज�� कोई व्यक्ति होंठों पर ग्लॉस या रंग लगाकर उन्हें उभारता है, तो वह अनजाने में एक ऐसी जैविक होर्डिंग को और ज़्यादा तेज़ कर देता है जो जननांग‑उत्तेजना का प्रतिबिंब दिखाती है।
## 2. स्वायत्त यौन‑उत्तेजना (स्नेहन) की नकल
लिप ग्लॉस का “गीला लुक” यौन उत्तेजना के समय पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम की शारीरिक प्रतिक्रियाओं की सीधी नकल करता है।
* **जैविक अवस्था:** उत्तेजना शरीर में स्रावों की मात्रा ब���़ा देती है, जिनमें मुँह में लार और प्रजनन अंगों में स्नेहन शामिल है।
* **दृष्टि‑आधारित तरकीब:** हमेशा गीले दिखने वाला मुँह, सक्रिय शारीरिक उत्तेजना और स्नेहन की उसी अवस्था को कृत्रिम रूप से संकेतित करता है। भले ही दिमाग सचेत रूप से यह न सोचे कि “यह व्यक्ति उत्तेजित है,” लेकिन भीतर छिपा आदिम प्रोग्राम उस गीलापन को यौन‑तत्परता के संकेत के रूप में पहचान लेता है।
## 3. मनोविश्लेषण और सांस्कृतिक प्��क्षेपण
जहाँ जैविक आधार जननांग‑उत्तेजना के प्रतिबिंब से जुड़ा है, वहीं इसे विशेष रूप से oral sex से जोड़ना मनोविश्लेषण और सांस्कृतिक कंडीशनिंग का क्षेत्र है।
* **Oral Fixation:** फ़्रॉइडियन मनोविज्ञान में मुँह एक प्राथमिक कामोन्मादक क्षेत्र (erogenous zone) माना जाता है। होंठों पर गीला, फिसलन भरा टेक्सचर लगाकर उन पर तीव्र दृश्य ध्यान खींचना, पर्यवेक्षक के अवचेतन को स्वाभाविक रूप से मौखिक (oral) अंतःक्रियाओं की ओर ���ोड़ देता है।
* **��ंद्रिय‑अनुकरण:** ग्लॉस होंठों को चिकना, स्नेहक‑सा रूप देता है, जो दृश्य रूप से oral sex की भौतिक यांत्रिकी और उसके बाद की अवस्था की नकल करता है। अवचेतन स्तर पर यह घर्षण, नमी और उस क्रिया की जैविक वास्तविकता से जुड़ी संवेदनात्मक स्मृतियों को सक्रिय कर देता है।
संक्षेप में: लिप ग्लॉस केवल होंठों को “सुंदर” नहीं बनाता। जैविक दृष्टि से यह हमारी विकासक्रम से बँधी प्रोग्रामिंग का लाभ उठाता है, यौन‑उत���तेजना की अवस्था में होने वाली सूजन, लालिमा और स्नेहन की नकल करके।
#AcharyaPrashant #Science
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धमकी देने वाले की गिरफ्तारी होनी चाहिए।
आचार्य प्रशांत वेदांत और सनातन धर्म को हर व्यक्ति तक ला रहे हैं। वे युवाओं के मार्गदर्शक हैं और महिलाओं को उनके बंधनों से मुक्त कर रहे हैं। वे हर जीव की आज़ादी के लिए संघर्षरत हैं।
वे असली भारत रत्न है और कोई अगर भारत रत्न को मारने की धमकी दे तो सबसे पहले उस आदमी की गिरफ्तारी हो।
भारत महान था अपने उपनिषदों, गीताओं और बोध के प्रति अपने समर्पण के कारण। और इसी बोध को आज जन जन तक लाने का काम आचार्य जी कर रहे हैं।
राहुल,
>> इसका क्या अर्थ है: "गलती से मेरा नंबर चला गया"?
अपने आप फ़ोन नंबर चलकर हमारे पास आया था? संस्था आपको स्वयं कभी सामने से कॉल नहीं करती - पहले आपने ख़���द वेबसाइट पर जाकर फ़ॉर्म भरा था और उस फ़ॉर्म में अनुरोध/स्वीकार किया था कि संस्था आपको कॉल करे।
और अगर आप चाहते थे कि संस्था कॉल न करे, तो वेबसाइट पर यह भी साफ़ बताया गया है कि अकाउंट कैसे डिलीट करते हैं। WhatsApp के हर संदेश पर लिखा आता है - "इन संदेशों को रोकें" (STOP Messages)। आप अपना नंबर हटा सकते थे। आप पढ़े लिखे तो होंगे? पाँच साल में ये नहीं पता चला कि अकाउंट कैसे डिलीट करना है? रोज़ सैकड़ों लोग करते हैं, ��स आप ही अनूठे निकले.
>> “रोज़ कॉल और व्हाट्सएप आते हैं कि पैसे दो और कोर्स लो। ये अध्यात्म के नाम पर शुद्ध धंधा चला रहे हैं।”
भाई, तुम्हें मुफ़्त में कुछ दिया जा रहा है, और अगर तुम कुछ दो भी दोगे तो भी 50 रुपए दोगे। यही वो न्यूनतम योगदान राशि है जिस पर दो लाख छात्रों को संस्था आज गीता पढ़ा रही है। आज तक तुमने 50 रुपए के लिए किसी को बार-बार कॉल करते हुए सुना है? बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी पैसे बचाने के लिए ऐसा नहीं करतीं। जितना तुम दोगे, उससे कहीं ज़्यादा संस्था सिर्फ़ कॉल और WhatsApp पर तुम पर खर्च कर देती है। तुम्हें गीता से जोड़ने से पहले ही संस्था तुम पर ज़्यादा खर्च कर चुकी होती है - और इसमें हम ये तो गिनाना भी नहीं चाहते कि गीता समझने का मूल्य क्या होता है। तो फ़ोन तुमसे कुछ लेने ��े लिए नहीं, तुम्हें कुछ देने के लिए किया जाता है।
जो भी व्यक्ति आचार्य जी की गीता से जुड़ता है, उसे
🔸महीने के तीसों दिन या तो सत्र या तो परीक्षा उपलब्ध करवाई जाती है। प्रतिदिन।
🔸गीता के हर श्लोक को दो-दो घंटे समझाया जाता है, और हर श्लोक की रिकॉर्डिंग्स पिछले कई सालों की आपके लिए उपलब्ध हैं।
🔸सिर्फ़ गीता ही नहीं, कबीर साहेब के भजन, बौद्ध दर्शन, अष्टावक्र गीता, ऋभु गीता, लाओ त्ज़ू पर भी सत्र होत�� हैं।
🔸एक पूरी सोशल मीडिय�� ऐप आपके लिए बनाई गई है जहाँ गॉसिप नहीं, गहरी चर्चा होती है। एक सोशल मीडिया के IT system पर कितना खर्चा होता है, कुछ अंदाज़ा है? और वो आपको बिना किसी शुल्क के मिलता है।
🔸Ask AP AI आपको मुफ़्त में, हाँ मुफ़्त में, ऐसे जवाब देता है जो पिछले 25 सालों की आचार्य जी की मेहनत से निकले हैं।
🔸महीने में 15 गीता परीक्षापत्र बनाए जाते हैं, आपकी समझ को धार देने के लिए।
थोड़ा बुद्धि को ज़ोर दो, ये सब ₹50 में देना मुमकिन है? जिन���हें तुम धर्मगुरु वगैरह कहते हो, वे तुम्हें ₹50 में मिलने भी न दें, सिखाना तो दूर की बात है। इतने में तो Zomato पर एक समोसे की डिलीवरी भी नहीं आती।
और तुम कहते हो हम धंधा चला रहे हैं? अरे, ये धंधा नहीं, अहंकार के लिए बहुत बड़ा फंदा है, जो गीता से भागना चाहता है। तुम्हारा यह ट्वीट बता रहा है कि हमारा तरीका सच में कारगर है।
>> “इतनी शिद्दत से तो कोई भगवान का नाम नहीं जपता, जितनी शिद्दत से ये लोग मार्केटिंग करते हैं।”
ये भगवान का नाम भी बिना मार्केटिंग के तुम तक नहीं पहुँचा होता - पर खैर, इतना तुम नहीं समझ पाओगे। शुक्र करो कि संस्था मार्केटिंग पर खर्चा कर रही है, वरना 2 लाख से भी ज़्यादा लोग कभी गीता सुनने और परीक्षा देने नहीं आते, वो परीक्षा इंडिया बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ अध्यात्म क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर पहली attempt में पास कर लोगे न राहुल, तो जीवन भर के लिए गीता तुम्हें मुफ़्त में सिखाई जाएगी।
>> “अगर आपके ज्ञान में वाकई दम होता, तो आपको फोन कर-करके लोगों से भीख नहीं मांगनी पड़ती।”
उपनिषदों में दम है? यदि है, तो तुमने ख़ुद पढ़े हैं? सार्त्र, हैडेगर, विटगेंस्टीन में दम है? यदि है, तो तुमने ख़ुद पढ़े हैं? शून्यता सप्तति में दम है? यदि है, तो तुमने ख़ुद पढ़ी है?
जिस भी चीज़ में दम है, वो तुमने ख़ुद कभी नहीं पढ़ी, तुम्हें ज़बरदस्ती ही पढ़वाई गई - स्कूल से लेकर कालेज ��क। अपनेआप तो सड़ा कोकशास्त्र और व्हाट्सएप साहित्य ही पढ़ा है तुमने। अपनी ज़िंदगी देखो - तुम हो किस गुम��न में? तुम्हें सचमुच लगता है तुम सच और गहराई की ओर अपनेआप ही चले जाओगे? नहीं, कभी नहीं। अपनेआप तो झूठ और गंदगी ही फैलते हैं। सफाई अपने आप कभी नहीं हो जाती - उसके लिए किसी को जान लगानी पड़ती है। सच स्वयं नहीं फैलता, दार्शनिकों और ज्ञानियों को सच फैलाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ती है।
फ़ोन कर कर के भीख नहीं माँगी जा रही। फ़ोन कर कर के इस दुनिया को कुछ ऐसा दिया जा रहा है जो माँगने की भी इस��ी औक़ात नहीं है। एहसान समझो कि तुम्हें कॉल किया जा रहा है। वरना आज कोई नहीं है जो तुम्हें गीता का अतिशुद्धतम अर्थ समझा रहा हो, जो अपना IIT और IIM का करियर छोड़कर तीसों दिन आपको समर्पित कर रहा हो और ऊपर से इस काम के लिए खुद खर्चा कर रहा हो ताकि तुम्हें कुछ सिखा सके।
जो काम आज कोई नहीं कर रहा, वो प्रशांतअद्वैत संस्था कर रही है, चाहे वो अंधविश्वास को तोड़ने की बात हो, चाहे पशु प्रेम सिखाने की बात हो, चाहे ��्त्री सशक्तिकरण की बात हो। हमारी संस्था आज इन सब में सबसे अग्रणी है।
अगर ये बात समझ नहीं आ रही तो ग���ता कम्युनिटी पर आइए और कुछ दिन बिताइए। आपको खुद समझ आ जाएगा, जहाँ हर कुछ मिनटों में नए-नए testimonials आते हैं, जिनमें दुनियाभर के लोग बताते हैं कि गीता मिशन से जुड़ने के बाद उनकी ज़िंदगी में क्या परिवर्तन आया और क्या लाभ हुआ।
और हाँ, हमारे पास तुम्हें किए गए सारे कॉल्स, उनकी ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, तारीख़ और समय सहित उपलब्ध हैं। ऐसी झूठी अफ़वाहें फैलाने के कारण तुम्हारा Twitter account रिपोर्ट भी कर सकते है।
——���
आपके होने न होने से आचार्य प्रशांत गीता मिशन को कुछ नहीं होगा पर आपका नुकसान जरूर होगा। सच को समझें और अभी जुड़ें:
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@Advait_Prashant
Greater Noida, Uttar Pradesh: On Mahashivratri, Philosopher and author Acharya Prashant combined knowledge, art, and spirituality through a special theatrical performance and exhibition, educating 2,000 selected participants, sharing Vedantic insights, answering questions, and demonstrating the true essence of Shivtatva while signing over 10,000 books
“माइंड-वाइब्रेशन” जैसी बकवास को आध्यात्म कहकर बेचने वालों से पहले हिसाब ले।
Osho ने रहस्यवाद को मनगढ़ंत वैज्ञानिक शब्दों में पैक किया। आज उनकी वही क्लिप्स इंटरनेट पर पड़ी हैं।
और Acharya Prashant साफ कहते हैं - न चमत्कार, न ऊर्जा-तरंग, न पंथ।
��मझना है तो उनका AP Framework देखिए:
https://t.co/kuWFHEtBNP
जहाँ पूरी चर्चा ego की जाँच, suffering की जड़ और प्रत्यक्ष आत्म-पड़ताल पर टिकी है। कोई mystical धुंध नहीं, सीधी चोट।
तुलना करना ही आयामगत भूल है।
जहाँ एक तरफ़ रहस्यवादी बकवास है, वहाँ दूसरी तरफ़ निर्मम आत्म-विश्लेषण।
एक दार्शनिक की तुलना तूने एक टोटकेबाज़ से कैसे कर दी?
Acharya Prashant operates under entirely different conditions. He is doing philosophy in a new kind of warzone, one shaped not by state surveillance or institutional control, but by digital volatility, ideological fragmentation, and an audience that is both vast and unfiltered.
Osho openly promoted astrology as science, defended the literal existence of chakras and auras, spoke of remembering past lives, and described enlightenment as producing measurable energetic fields.
https://t.co/PZHS4qWFjl
Osho was part of a spiritual marketplace that offered comfort, rituals and pseudo-scientific mysticism — a guru who built communes, talked of “energy fields,” auras and other mystical paraphernalia, and had institutional followers ready to defend him.
Acharya Prashant stands as the singular saboteur of this economy. He is not merely refusing to sell the product; he is dismantling the demand itself. By teaching that “feeling good” is often a trap and that the ego’s desire for peace is the disturbance, he strikes at the foundation of spiritual consumerism.
So yes, by all means, totally a copy, right? 👏🤯
If spectacle and self-inquiry look identical to you. If selling transcendence and dismantling the consumer of transcendence seem like the same thing, then you are the confused one with brain-damage.
Read here:
https://t.co/QSBeYcl0j0
@sachinsgaur Osho को पेड़ पर चढ़ के ‘enlightenment’ मिल गया था।
आचार्य की के session में आकर ये सब बोलते तो बड़ी झाड़ पड़ती।
सारा enlightenment का भूत उतर जाता।
सही में ‘no mind’ में पहुँच जाते भाई साहब।
खैर!
😅
ओशो सोने वालों के लिए हैं, AP जागने के लिए हैं।
ओशो भागने वालों के लिए हैं, AP लड़ने वालों के लिए हैं।
फ़र्क समझो — कहानीकार और दार्शनिक का।
ओशो की "आध्यात्मिक विरासत" पर एक नज़र:
• 1984 bioterror attack, 751 लोग बीमार — कम्यून की सेवा भावना
• wiretapping, जासूसी, हत्या की साज़िश — ध्यान के गहरे प्रयोग
• गिरफ्तारी, डिपोर्टेशन, 21 देशों से ban — ज्ञान की वैश्विक यात्रा
• "सब Sheela ने किया" — जिम्मेदारी का आदर्श
• "भगवान" की उपाधि — विनम्रता की पराकाष्ठा
• "आत्मा गंदी होती है" — वेदान्त की गहरी समझ
• ज्योतिष "scientific" है — विज्ञान को नई दिशा
• पुनर्जन्म की कहानियाँ, past life regression — कहानीकार
अब AP की विरासत देखो:
• IIT Delhi + IIM Ahmedabad छोड़ा, Civil Services छोड़ी — सिर्फ़ वेदान्त के लिए
• AP Framework — अद्वैत वेदान्त का सबसे sharp contemporary ढांचा, हर सवाल "किसके लिए?" पर लौटता है
• 17 प्रकार की गीता, 60 प्रकार के उपनिषद पढ़ाते हैं — शास्त्र-संदर्भ और तर्क के साथ
• 2 लाख+ गीता के विद्यार्थी, दुनिया की सबसे बड़ी गीता परीक्षा आयोजित की
• PETA "Most Influential Vegan" 2022 — लाखों को veganism से जोड़ा
• Operation 2030 — climate change के ख़िलाफ़ youth movement
• IIT Delhi Alumni Award 2025 — "Outstanding Contribution to National Development"
• 70M+ YouTube subscribers — दुनिया के सबसे ज़्यादा followed आध्यात्मिक शिक्षक
• 150+ किताबें — Karma, Ananda, Maya जैसी national bestsellers
• Women empowerment, animal rights, anti-superstition — हर मोर्चे पर सक्रिय
अगर यही "ओरिजिनल सोच" है, तो हमें ऐसा व्यक्ति चाहिए जो गीता, उपनिषद और वेदान्त को त���्क और शास्त्र-संदर्भ से पढ़ाए — स्कैंडल और कहानियों से नहीं।
शास्त्र-आधारित दार्शनिक ढांचा क्या होता है, जानना हो तो:
👉 https://t.co/Zcpx6HPgMa
अगर मोहित होके सोना है तो फिर क्या ही बोलना, सो जाओ सबके बस की बात ��हीं है दर्शन।
बिल्कुल, ओशो के ओरिजिनल और अवैज्ञानि�� विचार इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। जैसे:
1️⃣ पुनर्जन्म (Reincarnation)
अनेक प्रवचनों में कहा कि व्यक्ति के वर्तमान जीवन की समस्याएँ पिछले जन्मों से जुड़ी हो सकती हैं।
ध्यान में पूर्वजन्म की स्मृतियाँ खुलने की बात की।
📌 आधुनिक विज्ञान में पुनर्जन्म का कोई सत्यापित प्रमाण नहीं।
2️⃣ कुंडलिनी और चक्र
रीढ़ में “ऊर्जा” के उठने और चक्रों के खुलने की भाषा का उपयोग।
ध्यान तकनीकों को कुंडलिनी-जागरण से जोड़ा।
📌 मानव शरीर में चक्रों या ऊर्जा-सर्प का कोई जैविक प्रमाण नहीं मिला है।
3️⃣ आभा (Aura) और ऊर्जा-क्षेत्र
व्यक्ति की ऊर्जा, वाइब्रेशन, आभा जैसी अवधारणाओं का प्रयोग।
📌 इन्हें मापने या वैज्ञानिक रूप से स्थापित करने का कोई मान्य ढाँचा नहीं है।
4️⃣ गुरु की उपस्थिति से रूपांतरण
यह विचार कि गुरु की ऊर्जा या उपस्थिति से चेतना बदल सकती है।
📌 वैज्ञानिक रूप से इसे प्लेसीबो, सुझाव या समूह-मनोविज्ञान से समझाया जाता है; “ऊर्जा हस्तांतरण” सिद्ध नहीं है।
5️⃣ टेलीपैथी / मानसिक संचार
विचार-तरंगों और मन-पढ़ने जैसी संभावनाओं का उल्लेख।
📌 नियंत्रित प्रयोगों में टेलीपैथी सिद्ध नहीं हुई है।
6️⃣ मृत्यु के बाद चेतना
आत्मा की यात्रा और मृत्यु के बाद अस्तित्व पर प्रवचन।
📌 मृत्यु के बाद व्यक्तिगत चेतना के बने रहने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
💦 दर्शन गायब, बस मनोरम कहानियों और कविताओं के चोगे में अंधविश्वास।
📜 अब आचार्य प्रशांत का शुद्ध दर्शन देखिए: https://t.co/e8Vx3Lpxzb
ओशो “ओरिजिनल” थे, बिल्कुल थे 🙂
• 1984 Rajneeshpuram बायोटेरर स्कैंडल - आध्यात्मिकता का जैविक प्रयोग
• कम्यून में अवैध wiretapping और आंतरिक जासूसी - ध्यान का नया स्तर
• अमेरिका में गिरफ्तारी और डिपोर्टेशन - वैश्विक ज्ञान यात्रा
• खुद को “भगवान” कहलवाना - विनम्रता का चरम रूप
अगर यही “ओरिजिनल सोच” है,
तो हाँ - हमें ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो गीता, उपनिषद और वेदांत को शास्त्र-संदर्भ और तर्क के साथ पढ़ाए… न कि स्कैंडल के साथ।
जिन्हें फर्क समझना हो कि शास्त्र-आधारित ढांचा क्या होता है, वे यह देख सकते हैं:
https://t.co/REqlbOmssd
"सस्ती कॉपी" कहने से पहले अपनी "महंगी गलतफहमियों" का इलाज कर लें। तथ्य यह है कि आचार्य प्रशांत, ओशो की 'कॉपी' नहीं, बल्कि ओशो द्वारा फैलाए गए आध्यात्मिक भ्रमों का 'Correction' (सुधार) हैं।
तुलना करनी ही है, तो सतही नहीं, गहरे तथ्यों पर करें:
1. दर्शन की शुद्धता (Purity of Philosophy): ओशो ने वेदांत को "संभोग से समाधि" और "तंत्र" की चाशनी में लपेटकर बेचा। उन्होंने कहा, "कर्मफल से आत्मा गंदी हो जाती है" और "प्रेम आत्मा का आत्मा से होता है"—जो कि ��पनिषदों के मूल ज्ञान के विरुद्ध है। वेदांत कहता है आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है; वह गंदी नहीं हो सकती। आचार्य प्रशांत (IIT-IIM) ने इस मिलावट को धोया है। वे आपको वो नहीं सुनाते जो आपको 'अच्छा' लगे, वे वो सुनाते हैं जो 'शास्त्र सम्मत' और 'सत्य' है। ओशो ने "आध्यात्मिक अहंकार" को पोषण दिया, आचार्य प्रशांत उस अहंकार को तोड़ते हैं।
2. अंधविश्वास बनाम विज्ञान (Superstition vs. Rationality): ओशो ने खुद को "भगवान" घोषित कि��ा, अपने पिछले जन्मों की कहानियां सुनाईं (700 साल पुराना तिब्बती भिक्षु), और ज्योतिष/कुंडली का समर्थन किया। यह सब भीड़ जुटाने के हथकंडे थे। इसके विपरीत, आचार्य प्रशांतपहले ऐसे आधुनिक संत हैं जो अंधविश्वास, ज्योतिष और चमत्कार के दावों को पूरी तरह खारिज करते हैं। जहाँ ओशो आपको 'सपनों' में ले जाते हैं, आचार्य प्रशांत आपको 'यथार्थ' (Reality) में पटकते हैं। सफाई करने वाले को कचरा फैलाने वाले की "कॉपी" नहीं कहा ��ाता।
3. भोग बनाम करुणा (Indulgence vs. Compassion): ओशो का अध्यात्म 93 Rolls Royces, डायमंड घड़ियों और Nitrous Oxide(Laughing Gas) के नशे तक सीमित था। उनके 'रजनीशपुरम' कम्यून पर 1984 में अमेरिका का सबसे बड़ा Bioterrorism Attack(Salmonella poisoning) करने का आरोप सिद्ध हुआ। दूसरी ओर, आचार्य प्रशांत वेगन (Vegan) जीवनशैली, पशु-क्रूरता विरोध और Climate Change के प्रति जागरूकता के वैश्विक स्वर हैं। एक ने शिष्यों के दान से अय्याशी की, दूसरे ने अपना जीवन और संसाधन पृथ्वी और पर्यावरण को बचाने में लगा दिए। यह "सस्ती कॉपी" नहीं, "उच्चतम जिम्मेदारी" है।
4. वक्ता बनाम आचार्य (Orator vs. Teacher): ओशो निस्संदेह एक महान 'वक्ता' (Orator) थे, वे शब्दों के जादूगर थे जो आपको सम्मोहित (Hypnotize) कर सकते थे। लेकिन आचार्य प्रशांत एक शिक्षक हैं जो आपको जगा��े (De-hypnotize) हैं। ओशो को सुनना 'नशा' करने जैसा है—मज़ा आता है पर जीवन नहीं बदलता। आचार्य प्रशांत को सुनना 'कड़वी दवा' है—पीड़ा होती है, पर बीमारी (अज्ञान) जड़ से खत्म हो जाती है।
इतिहास गवाह है कि सुकरात को जहर दिया गया और जीसस को सूली पर चढ़ाया गया क्योंकि उन्होंने कड़वा सच बोला था। ओशो को पूजा गया क्योंकि उन्होंने लोगों के विकारों (Lust/Greed) को आध्यात्मिक जामा पहना दिया।
आचार्य प्रशांत को 'सस्ती कॉपी' वही कह सकता है जिसने न तो वेदांत पढ़ा है, न ओशो का इतिहास जानता है, और न ही आचार्य जी की 'जलती हुई मशाल' का ताप सहा है।
'सस्ती कॉपी' व्यवहार की नकल होती है, मौलिक दर्शन की नहीं। ओशो ने जहां विरोधाभासी बातों का 'मिश्रण' परोसा, वहीं आचार्य प्रशांत ने AP Framework के जरिए अध्यात्म को पहली बार एक 'व्यवस्थित विज्ञान' बना दिया है। 'आध्यात्मिक मनोरंजन' के नशे से बाहर निकलें और इस Gold Standard को पढ़ें—आचार्य प्रशांत अतीत का दोहराव नहीं, बल्कि ��र्तमान का यथार्थ हैं: https://t.co/GRjwbsF5ds
@sachinsgaur ये confused लग रहा है
इसलिए कुछ भी लिख रहा है। किसी तर्क के साथ कोई बात तो लिखी नहीं है।
इसने अगर AI से भी पूछ लिया होता तो ऐसी ट्वीट नहीं करता।
चलो कोई नहीं, अब पता चलेगा कॉमेंट्स में इसे कि आचार्य प्रशांत और ओशो में कितना अंतर है।
शायद फिर आँखें खुल जाएगी। 🙂
भारत को महान अगर कहने में रुचि रखते हो तो खुद महान बनो, तुमसे ही है भारत की महानता। भारतीय अगर महान नहीं तो भारत महान कैसे हो सकता है?
बहुत महान लोग हुए हैं इस धरती पर। धर्म का पालना रहा है भारत, और विज्ञान का, और गणित का, और संगीत का भी पालना रहा है भा���त - इसलिए भारत महान था। उन लोगों की बदौलत भारत महान था।
आज भी वैसे लोग चाहिए। वैसे लोग होंगे तो भारत महान होगा, नहीं तो नहीं होगा। फिर ये तो कह लोगे कि इतिहास में पहले भारत महान था लेकिन ये न��ीं कह पाओगे कि भारत आज भी महान है।
आज भारत को महान बनाना है तो अपने भीतर लोहा पैदा करो और सच की तरफ़ निष्ठा पैदा करो।
~आचार्य जी
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देखिए, आचार्य प्रशांत के साथ बीबीसी हिन्दी के एडिटर नितिन श्रीवास्तव की ख़ास बातचीत सोमवार, 5 जनवरी को बीबीसी हिन्दी के यूट्यूब चैनल पर
@Advait_Prashant@Tweetnitins
*सीमेंट की एक 'फर्श' बचाने के लिए, धड़कते हुए 'दिल' को शांत कर दिया गया: क्या हम जानवर से भी बदतर हो चुके हैं? 🐕🩸*
प्रयागराज में एक जज के घर के बाहर जो हुआ, वह सिर्फ एक कुत्ते की हत्या नहीं, बल्कि हमारी *'संवेदना की आत्महत्या'* है।
एक बेजुबान कुत्ता, जिसे न नियमों का पता था, न सरहदों का, वह गलती से जज साहब की "नई बनी फर्श" पर चढ़ गया।
सजा? *मौत।*
गार्ड ने अपनी राइफल उठाई और उसे वहीं ढेर कर दिया।
सोचिए, हमारा अहंकार (Ego) कितना बड़ा हो चुका है कि हमें सीमेंट पर पड़े पंजों के निशान बर्दाश्त नहीं, लेकिन खून के धब्बे मंजूर हैं।
*यह एक घटना नहीं, हमारी सामूहिक मानसिकता (Collective Mindset) है*
हम उ��� गार्ड को गाली देंगे, लेकिन क्या हम उससे अलग हैं?
• भारत में हर रोज हज़ारों जानवर हमारी हवस और गुस्से का शिकार होते हैं। 2010-2020 के बीच 18,000+ दर्ज मामले हैं, लेकिन असल गिनती इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि जानवरों के खिलाफ अपराधों का कोई पब्लिक रिकॉर्ड ठीक से ��हीं रखा जाता।
• हम भी तो वही कर रहे हैं। हमें फर्नीचर चाहिए, तो हम जंगल काट देते हैं। हमें स्वाद चाहिए, तो हम जानवरों को कत्ल कर देते हैं। हमें बिजली चाहिए, तो हम नदियों और पहाड़ों का गला घोंट देते हैं।
ऐसी खबरें जब सुनता हूँ तो आचार्य जी से समझी बातें याद आती हैं कि पूरे अस्तित्व में सिर्फ इंसान ही है जिसके पास *'चुनाव' (Choice)* की ताकत है। कुत्ता अपनी प्रकृति (Nature) नहीं बदल सकता, लेकिन इंसान बदल सकता ह��। और दुर्भाग्य देखिये, हमने क्या चुना?
आचार्य जी कहते हैं कि "आदमी अकेला है जिसे छूट है कि वह कुछ और हो सकता है... शेर को कोई विकल्प नहीं है, पर आदमी को है। लेकिन 100 में से 99 लोग यही चुनते हैं कि वह जानवर से भी बदतर हो जाएंगे। यह जो छूट है, इसने हमारा नाश कर डाला।"
कुत्ता तो फर्श पर चढ़कर भी *'कुत्ता'* (निर्दोष) ही रहा। लेकिन उसे मारने वाला इंसान, इंसान होकर भी *'दानव'* बन गया।
हमने अपनी चेतना (Consciousness) को इतना गिरा दिया है कि हमें *जड़ पदार्थ (Cement/Money)* में जान दिखती है, और *चैतन्य जीव (Living Being)* में कचरा।
यही कारण है कि जब हम खुद को बाकी अस्तित्व से "अलग" और "ऊपर" मान लेते हैं, तो शोषण करना हमारा स्वभाव बन जाता है। हम अपनी 'भीतरी खालीपन' (Inner Void) को भरने के लिए बाहर विनाश करना शुरू कर देते हैं।
जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि *"दूसरों को दिया गया दर्द, अंततः खुद को ही नष्ट करता है"*, तब तक हम ऐसे ही गोली चलाते रहे��गे, कभी कुत्ते पर, कभी पड़ोसी पर, तो कभी प्रकृति पर।
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#AcharyaPrashant #CurrentAffairs
Posted by Bablu Prajapati on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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As someone who spent a couple of years sitting at the feet of Acharya' jee @Advait_Prashant (being a student) studying the Bhagavad Gita, something shifted irreversibly inside me: I can no longer watch religious traditions (any tradition, including my own Muslim heritage) harm children in the name of “spirituality” and stay silent.
Acharya taught us that true scripture is meant to liberate the mind, not imprison it; it is fire that burns ego, not a whip that breaks a child’s spirit. Every time I see these viral videos now (a little boy collapsing in tears after memorising the entire #Quran, adults cheering as if he’s been touched by God instead of pushed to the edge), something boils in me.
This is no longer “their problem” or “our beautiful tradition.”
This is my community still traumatising its children, century after century, and calling the tears “khushu” and the breakdown “love for Allah.”
I stayed quiet for too long out of guilt and fear of being labelled Islamophobic. No more.
If the Gita made me fall in love with truth, then truth now demands I speak when I see a 10-year-old’s childhood sacrificed on the altar of mechanical memorisation.
Why Acharyaji’s Teaching Feels Extraordinary
🎓 I explore free lectures on YouTube and other educational platforms—from professors of the world’s top universities: Harvard, Princeton, MIT, Oxford, Cambridge, and more.
I go through their published academic papers and journals too.
🧠 And every time, one realization strikes me deeply:-
🔥Acharyaji’s Teaching Is of Global Academic Standard
The clarity, depth, and intelligence with which Acharyaji explains the Gita and Vedanta matches — in fact exceeds — the finest academic lectures in the world.
Had he been a professor at an Ivy League or Oxbridge institution top philosophers, scientists, psychologists, and thinkers would stand in line to listen. They would go to any lengths to attend his lectures.
His insights could have remained within closed seminar rooms accessible only to elite intellectual circles.
📘He Is Bringing the Gita to Us —
The Bhagavad Gita, traditionally understood by only the deeply learned and committed, is being brought right into our everyday lives by Acharyaji.
Instead of expecting us to rise to the level of the Gita, he brings the wisdom of the Gita down to where we currently stand.
This is extremely rare:
Scriptures are coming directly to the student without any effort from the students’ side. The Teacher is running after the student day and night. It’s the student who should have been running after the scriptures and the Teacher who is imparting the teachings.
💰He Could Have Restricted His Teachings to an academic circle:-
His writings and lectures could have been copyrighted, put behind academic paywalls published only through prestigious universities.
Such content would have been worth millions, accessible only to a privileged few.
But…
🌍Instead, He Chose the Common Man — the “Jhunnu”
He didn’t choose prestige, exclusivity, or scholarly filtering.
He chose you, me, and the ordinary seeker.
And the irony is painful:
The ordinary person may not just fail to understand him, but may even disrespect the teaching itself.
It is not disrespect towards Acharyaji as an individual, it is disrespect toward the highest wisdom humanity has ever received.
💔I Often Feel Unworthy of This Grace
Sometimes I feel:
My intellect is not sharp enough. My effort is too weak. I am receiving more than I currently deserve, I am not yet living what is being shown
Yet, I Want to Become Worthy.
I know I am average today, I want to rise to deserve what I have been given.
I want to increase sincerity, strengthen inner discipline, grow in understanding, live the Gita in my actions, not just admire it in words.
🌱Not Everyone in History Gets This Opportunity
To receive the Gita in modern language with uncompromising honesty with practical relevance and without intellectual dilution is incredibly rare.
I do not want to waste it.
✨A Closing Thought If the teaching is the highest, then the least I can do
is raise myself to match even a fraction of it.
Note: This isn’t a comparison. But an honest observation of what we are receiving here. It is once in a lifetime opportunity.
#AcharyaPrashant #IndianPhilosophy
Posted by Parth Sarthy on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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