राधा : जानते हो न माधव
जिस दिन से तुम ,मेरी रूह में बसे
उस दिन से
तुम्हें पाने के लिए,
तुम तक पहुँचने के लिए
तुम्हारे भक्तों ने मेरा नाम पुकारा
और उन्हें मुझमें ही तुम मिल गए
बोलो राधे राधे माधव ❤️🙏
हाथ मेरा भी जो पहुँचा तो मैं समझूँगा ख़ूब
ये अँगूठा तू किसी और को दिखलाया कर
गर तू आता नहीं है आलम-ए-बेदारी में
ख़्वाब में तू कभी ऐ राहत-ए-जाँ आया कर
ऐ सबा औरों की तुर्बत पे गुल-अफ़्शानी चंद
जानिब-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ भी कभी आया कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
हम भी ऐ जान-ए-मन इतने तो नहीं नाकारा
कभी कुछ काम तू हम को भी तो फ़रमाया कर
तुझ को खा जाएगा ऐ 'मुसहफ़ी' ये ग़म इक रोज़
दिल के जाने का तू इतना भी न ग़म खाया कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
इस क़दर भी तो मिरी जान न तरसाया कर
मिल के तन्हा तू गले से कभी लग जाया कर
देख कर हम को न पर्दे में तू छुप जाया कर
हम तो अपने हैं मियाँ ग़ैर से शरमाया कर
ये बुरी ख़ू है दिला तुझ में ख़ुदा की सौगंद
देख उस बुत को तू हैरान न रह जाया कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं
भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं
पीछे छूटे साथी मुझ को याद आ जाते हैं
वर्ना दौड़ में सब से आगे हो सकता हूँ मैं
कब समझेंगे जिन की ख़ातिर फूल बिछाता हूँ
राहगुज़र में काँटे भी तो बो सकता हूँ मैं
आलम ख़ुर्शीद
दे ख़ुदा और जगह सीना ओ पहलू के सिवा
कि बुरे वक़्त में हो जाए ठिकाना दिल का
मेरी आग़ोश से क्या ही वो तड़प कर निकले
उन का जाना था इलाही कि ये जाना दिल का
निगह-ए-शर्म को बे-ताब किया काम किया
रंग लाया तिरी आँखों में समाना दिल का
दाग़ देहलवी
अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाए ज़माना दिल का
तुम भी मुँह चूम लो बे-साख़्ता प्यार आ जाए
मैं सुनाऊँ जो कभी दिल से फ़साना दिल का
निगह-ए-यार ने की ख़ाना-ख़राबी ऐसी
न ठिकाना है जिगर का न ठिकाना दिल का
दाग़ देहलवी
मैं ख़ुश-नसीब हूँ मुझ को किसी का प्यार मिला
बड़ा हसीन मिरे दिल का राज़दार मिला
है दिल में प्यार ज़बाँ चुप झुकी झुकी नज़रें
अजब अदा से कोई आज पहली बार मिला
किसी को पा के मिरे दिल का हाल मत पूछो
के जैसे सारे ज़माने से इख़्तियार मिला
असद भोपाली
अगर हमारे ही दिल में ठिकाना चाहिए था
तो फिर तुझे ज़रा पहले बताना चाहिए था
चलो हमी सही सारी बुराइयों का सबब
मगर तुझे भी ज़रा सा निभाना चाहिए था
अगर नसीब में तारीकियाँ ही लिक्खी थीं
तो फिर चराग़ हवा में जलाना चाहिए था
शकील जमाली
मोहब्बतों को छुपाते हो बुज़दिलों की तरह
ये इश्तिहार गली में लगाना चाहिए था
जहाँ उसूल ख़ता में शुमार होते हों
वहाँ वक़ार नहीं सर बचाना चाहिए था
लगा के बैठ गए दिल को रोग चाहत का
ये उम्र वो थी कि खाना कमाना चाहिए था
शकील जमाली
किसी ने पूरे किए आज प्यार के वादे
मेरी वफ़ा का सिला मुझ को शानदार मिला
मेरे चमन का हर इक फूल मुस्कुराने लगा
वो क्या मिला कि मुझे मौसम-ए-बहार मिला
असद भोपाली