शिक्षकों ने SIR में काम किया, बोर्ड परीक्षा सम्पन्न कराई, लोकल परीक्षाएं सम्पन्न कराई, समय पर परिणाम जारी किया समय पर नया सत्र प्रारंभ कर दिया फिर भी विभाग की एकतरफा मनमानी से प्रदेश के शिक्षक हैरान हैं परेशान हैं।
अब एकजुटता का समय है राजस्थान शिक्षक संघ एकीकृत का साथ दीजिए
Rishi Raj Yadav
पश्चिमी राजस्थान की पवित्र धरा, जहाँ रेत, संस्कृति और प्रकृति का अनमोल संगम है, आज एक गंभीर समस्या का सामना कर रही है। पर्यटन स्थलों, खेल मैदानों, खेतों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बियर व शराब की कांच की टूटी बोतलों के टुकड़े विकराल रूप ले चुके हैं।
यह केवल गंदगी का मुद्दा नहीं है, बल्कि जनस्वास्थ्य, पर्यावरण और पशुधन तीनों के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। कांच नॉन-बायोडिग्रेडेबल होता है, यानी यह सैकड़ों वर्षों तक प्राकृतिक रूप से नष्ट नहीं होता। मिट्टी में कांच के कण मिल जाने से उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है, वहीं यह पशु तथा जानवरों को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
इस समस्या का समाधान हमारी अपनी जिम्मेदारी से ही शुरू होता है। स्थानीय स्तर पर जागरूकता बेहद जरूरी है कि बोतल तोड़ना प्रकृति के साथ सीधा खिलवाड़ है। हमें ऐसे कृत्यों पर सामाजिक रूप से रोक लगानी होगी और एक जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय देना होगा।
इस चुनौती से निपटने के लिए हमें दो स्तरों पर कार्य करना होगा, व्यक्तिगत और सरकारी।
सरकार को चाहिए कि कांच की बोतलों के स्थान पर इको-फ्रेंडली विकल्प (जैसे रीसायक्लेबल प्लास्टिक या कैन) को बढ़ावा दे या DRS (Deposit Return Scheme) (कोल्ड ड्रिंक्स इत्यादि की तरह) लागू करे।
वहीं आमजन को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए कांच के उपयोग को सीमित करने और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखने का संकल्प लेना होगा।
साथ ही मेरा स्थानीय जनप्रतिनिधियों से आग्रह है कि इस गंभीर विषय पर जन-जागरूकता अभियान चलाएं। वीडियो संदेश, सोशल मीडिया कैंपेन और जमीनी स्तर पर सफाई व जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को जागरूक करना आज समय की मांग है।
इस जन-जागरूकता अभियान के लिए मैं पोकरण विधायक महंत प्रतापपुरी जी महाराज, जैसलमेर विधायक श्री छोटू सिंह भाटी, शिव विधायक श्री रविन्द्र सिंह भाटी, पूर्व विधायक श्री रूपाराम धनदेव एवं श्री आजाद सिंह राठौड़ से आग्रह करता हूँ कि वे आगे आकर वीडियो संदेश जारी करें, सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता फैलाएं और इस अभियान को आगे बढ़ाने हेतु कम से कम 5 अन्य साथियों को भी आमंत्रित करें।
आइए, हम सब मिलकर अपनी धरा को सुरक्षित, स्वच्छ और सुंदर बनाए रखने का संकल्प लें।
@PratapPuriJi@mla_chhotusingh@RavindraBhati__@RooparamDhandev@AzadBarmer
किसान के सचमुच कितने बैरी हैं? यह गिनना शुरू कीजिए तो लगता है जैसे उसके चारों ओर दुनिया ने दुश्मनी की एक गोल घेराबंदी कर रखी हो। खेत उसका है, पर इरादे दूसरों के; मिट्टी उसकी है, पर नज़रें औरों की; पसीना उसका है, पर मुनाफ़ा किसी और की जेब में चला जाता है। कभी सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर उसकी धरती पर नाप-जोख की रेखाएँ खिंचने लगती हैं, जैसे अन्न उगाने वाली जमीन अब रोटी नहीं, केवल मुनाफ़ा उगाने के लिए बची हो। कभी पानी उसका बैरी बन जाता है या तो इतना कम कि बीज सूखे कंठ की तरह मिट्टी में ही कराहता रह जाए, या इतना अधिक कि महीनों की मेहनत एक ही रात में कीचड़ बनकर बह निकले।
और यह त्रासदी यहीं कहाँ रुकती है। कभी खाद नकली निकलती है, कभी बीज नकली; यानी किसान को लूटने की सबसे क्रूर व्यवस्था वही है जो उसके भरोसे पर हमला करती है। वह बाजार जाता है उम्मीद लेकर, लौटता है धोखे के साथ। वह समझता है कि इस बार फसल अच्छी होगी, लेकिन उसकी आशा की थैली में अक्सर छल, मिलावट और साजिश भरी होती है। उसके हाथ में कुदाल है, पर उसके खिलाफ पूरा तंत्र हथियारबंद खड़ा दिखता है।
और मान लीजिए कि वह इन सब बैरियों से जूझकर भी फसल खड़ी कर ले; हरी, भरी, झूमती हुई, जैसे उसके बच्चों की हँसी खेतों में उतर आई हो तो तभी कुदरत बैरी हो जाती है। ओलावृष्टि, बेमौसम बारिश, लू, पाला, तूफान; प्रकृति भी बस उसी की परीक्षा लेने पर उतारू रहती है। किसान की आँखों के सामने उसकी महीनों की साधना गिरती है, टूटती है, बिखरती है। वह आदमी जो धरती को जीवन देता है, वही सबसे अधिक असुरक्षित है।
यह कैसी व्यवस्था है कि जो सबका पेट भरता है, वही सबसे अधिक भूख, कर्ज, अपमान और अनिश्चितता से घिरा रहता है? किसान केवल एक पेशा नहीं, इस देश की धड़कन है; लेकिन विडंबना देखिए, सबसे अधिक चोट भी उसी धड़कन पर पड़ती है। उसके हिस्से में सम्मान के भाषण बहुत आते हैं, सुरक्षा बहुत कम। उसके लिए जयकार बहुत होती है, न्याय बहुत कम।
किसान के सब बैरी हैं; यह कोई कहावत नहीं, हमारे समय का करुण सत्य है। फिर भी वही किसान हर मौसम के बाद फिर बीज डालता है। यही उसकी महानता है और शायद यही इस देश की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा भी कि हम कब उस आदमी के साथ सचमुच खड़े होंगे, जिसकी पीठ पर हमारी सभ्यता अब तक टिकी हुई है।
मैंने social media पर सबसे ज्यादा नफरत किसी के लिए देखी है तो वो अध्यापक के लिए🙏
बल्कि ईमानदारी से कहूं तो सबसे कम भ्रष्ट इस देश में कोई नौकरी है तो वो अध्यापक की है और जो कुछ भी लिखते हो इस योग्य भी किसी न किसी अध्यापक ने ही बनाया।
खैर इसे शास्त्रों में नमक हराम बोला जाता है
सत्र 2026-27 के शैक्षणिक कैलेंडर में अवकाश कटौती के विरोध में @RESMA_7 द्वारा 7 अप्रैल को जिला स्तर पर कलेक्टर को ज्ञापन दिया जाएगा
मुख्य मांगें:
• प्रधानाचार्य अवकाश 2 दिन यथावत रहे
• ग्रीष्मकालीन अवकाश 17 मई–30 जून किया जाए
• शीतकालीन अवकाश 26 दिसम्बर–10 जनवरी किया जाए।
बुद्धदेव भट्टाचार्य: वह कवि, अनुवादक और मार्क्सवादी, जो अपनी ही रोशनी और अपनी ही छाया से न केवल ख़ुद पराजित हो गया, बंगाल में पूरे वामपंथ को ही डुबो गया
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों की इस सीरीज में बुद्धदेव भट्टाचार्य पर लिखना दरअसल एक ऐसे कक्ष में प्रवेश करना है, जिसमें एक साथ कई रोशनियाँ जल रही हों। एक में धोती-कुर्ता पहने, मोटा चश्मा लगाए, लगभग संकोची-से भद्रलोक; दूसरे में कठोर मुख्यमंत्री; तीसरे में कवि-मन का अनुवादक; चौथे में पूँजी को आमंत्रित करता कम्युनिस्ट; पाँचवीं में वही आदमी, जो अंततः अपनी ही औद्योगिक आकांक्षा, अपनी ही पार्टी की जड़ता और अपने ही प्रशासन की हिंसा से घायल पड़ा मिलता है।
बुद्धदेव को केवल “ब्रैंड बुद्धा” या “ईमानदार कम्युनिस्ट” कह देना उनके जीवन के उस असहज नाटक को छोटा कर देना होगा, जिसमें पुरोहित-वंश का विद्रोही पुत्र बचपन में ही नास्तिक बनता है, कविता से अनूठे रिश्ते रखने वाला पुलिस की भाषा बोलता है और मुख्यमंत्री होकर भी पाम ऐवेन्यू के साधारण टू रूम फ्लैट में लौटकर मायकॉव्स्की और मार्खेस के पन्ने पलटता है।
उनका पहला बड़ा विरोधाभास जन्म से ही शुरू हो जाता है। वे एक बंगाली पुजारी-परंपरा वाले रूढ़िवादी परिवार में जन्मे; उनके दादा कृष्णचंद्र स्मृतितीर्थ ने पुरोहित दर्पणजैसी पुरोहित-पुस्तिका लिखी थी और पिता नेपालचंद्र धार्मिक प्रकाशन से जुड़े थे। लेकिन इसी घर से एक घोर नास्तिक कम्युनिस्ट निकला, जिसने मार्क्सवाद को अपना बौद्धिक धर्म बनाया।
माता-पिता ने नाम बुद्धदेव रखा; लेकिन बालक अपने चाचा सुकांत भट्टाचार्य से इतना प्रभावित था कि बचपन से ही विद्रोही हो गया। सुकांत भट्टाचार्य एक अद्वितीय प्रतिभा थे। बीस साल की उम्र में 13 मई 1947 में ही वे दिवंगत हो गए; लेकिन युवा नज़रुल कहलाने वाले सुकांत ने इतनी छोटी उम्र में ही इतना कुछ लिखा था कि उनकी पूरी रचनावली को उच्च कोटि के बंगाली साहित्यकार सुभाष मुखोपाध्याय ने 1967 में संपादित किया था। वह बांग्ला साहित्य की एक बेहतरीन धरोहर है।
और यही नहीं, उनकी नसों में कविता की एक और धारा बहती थी, जो उन्हें सीधे काज़ी नज़रुल इस्लाम, माइकेल मधुसूदन दत्त और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे लोगों से जोड़ती थी। इस तरह बुद्धदेव के भीतर धर्म-ग्रंथों की गंध और विद्रोही कविता की आग साथ-साथ पड़ी रही; बाद में यही द्वंद्व उनके पूरे सार्वजनिक जीवन का व्याकरण बना। प्रेजिडेंसी कॉलेज में उन्होंने बाँग्ला साहित्य पढ़ा, शिक्षक रहे, फिर राजनीति में आए यानी सत्ता में पहुँचने से पहले शब्द उनके स्वभाव का हिस्सा थे, नारा नहीं।
यही कारण है कि 1977 में जब वे केवल 33 वर्ष के थे, पहली वाम मोर्चा सरकार में मंत्री बने। वह दृश्य बंगाल की राजनीति में असाधारण था। एक युवा मंत्री, जो सूचना और संस्कृति जैसे विभाग संभाल रहा है और आगे चलकर वही व्यक्ति ज्योति बसु का उत्तराधिकारी भी बनता है। मगर बुद्धदेव का राजनीतिक आरोहण रेखीय नहीं था; उसमें दरारें बहुत जल्दी दिखाई देने लगी थीं। 1993 में उन्होंने ज्योति बसु मंत्रिमंडल से अचानक इस्तीफ़ा दिया। वजह प्रशासन के कामकाज और भ्रष्टाचार पर गहरे मतभेद थे। उस क्षण की तीखी नाटकीयता का सबसे चर्चित प्रतीक वही वाक्य बना, जिसमें उन्होंने ज्योति बसु मंत्रिमंडल को “काउंसिल ऑव थीव्ज़” कहा था।
यह कोई मामूली क्षोभ नहीं था; यह उस वाम शासन के भीतर से उठी वह चिंगारी थी, जिसने बता दिया कि बुद्धदेव अपने ही घर की कालिख देख रहे हैं। बाद में वे लौट आए, पर लौटना भी किसी सहज सुलह की तरह नहीं था; वह ऐसे था जैसे कोई घायल अभिनेता फिर मंच पर आ जाए, पर हृदय के भीतर गहरी दरारें बची रहें।
लेकिन यहीं से बुद्धदेव की दूसरी छवि भी बनती है। ऐसा राजनेता, जो संस्कृति का उपासक है, पर प्रेस से चिढ़ता है; जो सत्यजित रे, नंदन और विश्व-सिनेमा की भाषा बोलता है, पर पत्रकारों पर अंकुश लगाता है। 1993 की समकालीन प्रोफाइलों में उन्हें “टिनपॉट स्टालिन” और “देसी गॉयबल्स” जैसे कटु उपनामों से पुकारा गया। राइटर्स बिल्डिंग का प्रेस कॉर्नर हटवाने और पत्रकारों की आवाजाही सीमित करने जैसे कदमों ने उनकी बौद्धिक-उदार छवि पर कठोर परत चढ़ा दी और इस कारण वे मीडिया के तीखे निशाने पर भी रहे। यह एक तरह से आ बैल मुझे मार जैसा मामला था।
साल 2002 में भी राइटर्स बिल्डिंग में मीडिया की आवाजाही पर पाबंदियों को लेकर विवाद हुआ। यानी बुद्धदेव के भीतर एक विचित्र दोधारी सत्ता थी।संस्कृति-प्रेमी व्यक्ति और नियंत्रणप्रिय प्रशासक। वह फिल्म-फेस्टिवल का आदमी भी था और “लाइन पार मत कीजिए” कहने वाला शासक भी। यही काँट्रास्ट उन्हें रोचक बनाता है; लेकिन भयावह भी।
फिर भी, अगर केवल सत्ता-रूढ़ि से उन्हें पढ़ा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। बंगाल के सांस्कृतिक जीवन में उनकी उपस्थिति आकस्मिक नहीं थी। उन्होंने ही कलकत्ता फ़िल्म फेस्टीवल को 1995 में शुरू कराने की पहल की। नंदन उनके लिए लगभग दूसरे घर जैसा था। पाम ऐवेन्यू के किराए के टू रूम फ्लैट से निकलकर वे पार्टी मुख्यालय, फिर राइटर्स और फिर नंदन की अड्डेबाज़ी तक एक विशिष्ट दिनचर्या जीते थे। उनके कमरे, कार, बेड और यात्रा के दौरान किताबें ठुँसी रहती थीं।
यह कितनी हैरानी की बात है कि एक राजनेता जो सरकार में है, गैब्रिएल गार्सिया मार्खेस का अनुवाद कर रहा है, मायाकोव्स्की को बंगला में ला रहा है, काफ्का के 'मेटामॉर्फोसिस' को अनूदित कर रहा है, टैगोर के नाटकों की ओर लौट रहा है और बाबरी विध्वंस के बाद सांप्रदायिक तनाव पर दुःसमयजैसा नाटक लिखता है।
और विडंबना देखिए कि सेक्युलरिज्म की झंडाबरदार पार्टी का प्रधानमंत्री उस मस्जिद को ध्वस्त करवाता है और इतनी सुदूर बैठा एक मार्क्सवादी राजनेता बताता है कि अभी नहीं जागे तो सामने अट्टहास करता दु:स्वप्न आपको निगल लेगा।
ऐसे नेता भारतीय राजनीति में विरले हैं। डिप्टी सीएम और सीएम की कुर्सियों से गुजरता हुआ एक आदमी, जो फाइलों के बीच भी कविता के लिए जगह बचाए रखता है। कम्युनिस्ट सीएम के रूप में विश्व साहित्य और शास्त्रीय संगीत का ये गहरा शौक विरोधाभासी लगता है। और स्वास्थ्य के प्रति इतने लापरवाह कि लंबी फिल्टर सिगरेट चेन स्मोकर बनकर पीते थे और कई बार उनके सिगरेट के धुएं के कारण मुख्यमंत्री कार्यालय का स्मोक अलार्म बज गया तो उसे बंद करवाने का फै़सला किया, सिगरेट बंद नहीं की।
लेकिन इतिहास, खासकर बंगाल का इतिहास, केवल संस्कृति से प्रभावित नहीं होता; वह ज़मीन, पुलिस, पूँजी और क्रोध से भी बनता है। बुद्धदेव दा ने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी छलाँग तब लगाई जब उन्होंने खुले तौर पर उद्योगीकरण की भाषा अपनाई। उन्होंने खुद को “अ कम्युनिस्ट कंप्रोमाइजिंग विद कैपिटलिज़्म” कहा। यह वाक्य सिर्फ़ बयान नहीं था; यह एक पूरे युग-परिवर्तन का घोष था।
18 मई 2006 को, जिस दिन उन्होंने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उसी दिन रतन टाटा ने सिंगुर में नैनो परियोजना की घोषणा की। इस दृश्य में कितना प्रतीक-बल था, वह दर्शनीय था। लाल झंडे के पीछे से कारखाने का धुआँ उठ रहा था; मार्क्स और बाज़ार एक असहज आलिंगन में थे। कुछ लोगों ने उन्हें बंगाल का डेंग शियाओपेंग मानना और प्रचारित करना शुरू कर दिया। उन्हें लगा कि वे ठहरे हुए बंगाल को निवेश, आईटी, उद्योग और आधुनिकता की ओर मोड़ देंगे। पर यहीं उनकी महत्त्वाकांक्षा ने अपनी त्रासदी का बीज भी बो दिया।
सिंगुर और नंदीग्राम ने उसी बीज को विस्फोट में बदला। किसानों की ज़मीन, अधिग्रहण की भाषा, विकास का ऊँचा शब्दकोश, गाँवों का अविश्वास और एक वामपंथी राजनेता से क्षुब्ध मीडिया ने मिलकर बुद्धदेव की “प्रगतिशील” छवि के भीतर छिपा प्रशासनिक कठोरता का चेहरा दिखा दिया। नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग में 14 लोग मारे गए; उसके बाद बुद्धदेव पर न केवल विपक्ष, वाम मोर्चे के भीतर से और स्वयं ज्योति बसु की ओर से भी आलोचना हुई। बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से माना कि नंदीग्राम “एडमिनिस्ट्रेटिव ऐंड पॉलिटिकल फेल्योर” था और यह भी कहा कि उनसे कुछ बातें नहीं कहनी चाहिए थीं। यह स्वीकारोक्ति महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि वहराजनेता ग़लती देख सकता था; लेकिन इतिहास की क्रूरता यह है कि कभी-कभी ग़लती स्वीकार लेने से उसका नैतिक बोझ हल्का नहीं होता।
बंगाल की जनता ने सिंगुर-नंदीग्राम को केवल नीति-विवाद की तरह नहीं, वाम शासन की आत्मा में आई एक दरार की तरह पढ़ा।
यहीं से बुद्धदेव की सबसे बड़ी विडंबना बनती है। निजी ईमानदारी और सार्वजनिक विफलता साथ-साथ चलती हैं। 2011 के हलफ़नामे में उनका चित्र लगभग अविश्वसनीय लगता है। अपने नाम पर न घर, न कार, बैंक में केवल पाँच हज़ार रुपये; पॉम ऐवेन्यू के साधारण सरकारी फ्लैट में जीवन; पत्नी मीरा की आय परिवार के लिए अधिक स्थिर सहारा और मुख्यमंत्री की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा पार्टी फंड में जाना।
मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने अपनी पूरी सैलरी सीधे पार्टी खाते में भेजने को कहा था और पार्टी उन्हें तय “वेतन” देती थी। आज के भारत में, जहाँ राजनीति और संपत्ति लगभग एक ही वाक्य में उच्चरित होते हैं, बुद्धदेव की यह निजी सादगी असाधारण लगती है। लेकिन यही उनकी त्रासदी को और गहरा करती है और वह यह कि व्यक्ति लगभग निर्दोष; लेकिन शासन रूप से गहरे विवादग्रस्त।
बुद्धदेव भट्टाचार्य के जीवन का निजी संसार भी उतना ही असामान्य था। पाम ऐवेन्यू के उसी छोटे फ्लैट में किताबें थीं, संगीत था, चुपचाप सा हास्य था, कुत्तों के लिए ममता थी। रोजाना पड़ोस में सड़क पर डेरा डाले कुत्तों को मुख्यमंत्री रहते खाना खिलाते थे। 'भद्रलोक' का ये नरम पहलू कठोर राजनीतिक छवि से बिल्कुल मेल नहीं खाता।
शास्त्रीय संगीत-रसिक, दुनिया के साहित्य से गहरी परिचय रखने वाला, सड़क के कुत्तों को खिलाने-पुचकारने वाला व्यक्ति। इस कोमल मनुष्य की तस्वीर को अगर नंदीग्राम, लालगढ़, पुलिस और भूमि-अधिग्रहण की छवियों के साथ रख दें तो बुद्धदेव भट्टाचार्य लगभग एक असंभव कोलाज लगते हैं; जैसे किसी चित्रकार ने एक ही कैनवास पर शिशिर और बारूद दोनों चिपका दिए हों।
फिर एक और काला मोड़ आया। रिजवानुर रहमान प्रकरण। एक मुस्लिम युवक और उद्योगपति की बेटी के प्रेम-विवाह में पुलिस की दख़ल, युवक की संदिग्ध मृत्यु, और उसके बाद उठे जनाक्रोश ने बुद्धदेव सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। दबाव इतना बढ़ा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के तबादले करने पड़े, और हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई जाँच की राह खुली। यह घटना केवल एक प्रेम-कथा की त्रासदी नहीं थी; इसने उस सरकार के नैतिक दावे को चोट पहुँचाई जो स्वयं को प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और अल्पसंख्यक-संवेदनशील कहती थी।
इस सबके बीच बुद्धदेव का शरीर भी उनके विरुद्ध काम कर रहा था। वे चेन-स्मोकर थे; धूम्रपान-निषेध के माहौल में भी उन्होंने खुलकर कहा था कि वे धूम्रपान नहीं छोड़ेंगे। बाद के वर्षों में टीबी ने उन्हें जकड़ लिया। पर शरीर की यह क्षति भी जैसे उनके व्यक्तित्व के अनुकूल ही थी। एक ऐसा राजनेता, जो अपने फेफड़ों के साथ भी वैसा ही बरताव करता रहा जैसा अपने ऐतिहासिक मिशन के साथ: चेतावनियाँ सुनता हुआ, मगर पूरी तरह रुकता नहीं। 2008 में सलबोनी में माओवादियों के हमले से वे बाल-बाल बचे; इसने यह भी दिखाया कि बंगाल का मुख्यमंत्री अब केवल चुनावी प्रतिद्वंद्विता नहीं, सशस्त्र हिंसा के भूगोल में चल रहा है।
और फिर वह दृश्य आता है, जिस पर खास ठहरना चाहिए, जब सत्ता उनके हाथ में थी, पर भीतर पराजय उतरने लगी थी। 2009 की पराजयों और राजनीतिक गिरावट के बाद समकालीन विवरणों में एक उदास बुद्धदेव दिखाई देते हैं। अलीमुद्दीन स्ट्रीट पर पार्टी मुख्यालय का पड़ाव, दफ़्तर, फिर घर लौटकर भोजन और विश्राम, फिर शाम तक काम, फिर नंदन में कुछ घंटे, और अंततः पाम ऐवेन्यू की वापसी।
लेकिन असल शरण राजनीति नहीं, साहित्य था। वे मायाकोव्स्की की पुरानी अनुवाद-प्रतियों पर लौटे, मार्खेस को फिर पढ़ना चाहते थे, टैगोर के नाटक मँगवा रहे थे, नए पाकिस्तानी, ईरानी और मध्य-पूर्वी लेखकों में रुचि ले रहे थे और दुःसमयका कोई अधिक अँधेरा उत्तर-नाटक लिखने का विचार मन में पल रहा था। यह दृश्य असाधारण है। मुख्यमंत्री अपनी गिरती हुई दुनिया से बचने के लिए कविता, नाटक और अनुवाद में शरण ले रहा है। राजनीति ने उसे निराश किया; लेकिन भाषा अभी भी उसे धोखा नहीं दे रही थी।
लेकिन हम जानते हैं, साहित्य राजनीतिक पराजय को रोक नहीं सका। 2011 में वे जादवपुर से अपनी ही सरकार के पूर्व मुख्य सचिव मनीष गुप्ता से हार गए और वह भी लगभग 16,684 वोटों से। वे पश्चिम बंगाल के उन विरले मुख्यमंत्रियों में शामिल हो गए, जो अपनी ही सीट हार गए। उसी चुनाव ने 34 वर्ष पुराने वाम शासन को भी उखाड़ दिया। यह केवल एक हार नहीं थी; यह उस “ब्रैंड बुद्धा” की सार्वजनिक पराजय थी, जिसे कभी बंगाल के आधुनिकीकरण की अंतिम आशा की तरह पेश किया गया था। जिस आदमी को कभी डेंग की तरह देखा गया, वह अंततः अपने ही प्रयोग का पराजित नायक बन गया।
हार के बाद भी उनके भीतर का कठोर संयम बचा रहा। 2022 में जब पद्मभूषण की घोषणा हुई तो उन्होंने साफ़ कह दिया कि उन्हें बताया तक नहीं गया; अगर यह पुरस्कार उन्हें दिया गया है तो वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे। यह प्रतिक्रिया केवल पार्टी-लाइन नहीं थी; यह उनकी प्रकृति के अनुरूप भी थी। सम्मानों से एक दूरी, राजकीय अलंकरण के प्रति अविश्वास और सार्वजनिक विनम्रता का वह पुराना संस्कार, जो आज दुर्लभ हो चुका है।
और अंत में, मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपने जीवन की तरह ही एक सादा, लगभग कठोर वाक्य लिखा: आँखें और शरीर दान। 8 अगस्त 2024 को उनके निधन के बाद उनकी आँखें दान की गईं; एक पुरुष और एक महिला को उनके कॉर्निया प्रत्यारोपित किए गए। शरीर चिकित्सा-अनुसंधान के लिए दान हुआ। बिना धार्मिक कर्मकांड के, बिना अलंकार के, बिना उस आडंबर के जो भारतीय राजनीति अपने मृतकों पर चढ़ा देती है। यह अंत भी बुद्धदेव की ही तरह था। कट्टर पुरोहित-वंश से आया आदमी, नास्तिक होकर गया; सत्ता में रहा राजनेता अंत में शरीर तक समाज को शिक्षा के लिए सौंप गया।
तो बुद्धदेव भट्टाचार्य को किस नाम से याद किया जाए? कवि? कम्युनिस्ट? उद्योगोन्मुख सुधारक? नंदीग्राम का दोषी शासक? भद्रलोक मार्क्सवादी? प्रेस से चिढ़ा हुआ संस्कृति-पुरुष? या वह आदमी जिसकी निजी सादगी उसकी सार्वजनिक विफलताओं को और अधिक असह्य बना देती है? शायद सबसे सटीक उत्तर यह है कि वे बंगाल के आख़िरी बड़े विरोधाभासों में से एक थे। उन्होंने वामपंथ को आधुनिक बनाना चाहा, पर उसकी नैतिक लागत को पूरी तरह समझ नहीं पाए; उन्होंने पूँजी को बुलाया, पर ज़मीन की स्मृति को कम आँका; उन्होंने संस्कृति को प्रेम किया, पर सत्ता की भाषा से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं हुए; उन्होंने ग़लती मानी, पर इतिहास तब तक निर्णय दे चुका था।
बुद्धदेव दा इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि वे हमें यह सिखाते हैंकि ईमानदार व्यक्ति होना और सही शासक होना एक ही बात नहीं है। और कभी-कभी सबसे दु:खद पात्र वही होता है, जो भ्रष्ट नहीं होता, पर अपनी ही ऐतिहासिक भूलों के कारण एक युग के पतन का चेहरा बन जाता है।
मैं जब साल 2011 में पश्चिम बंगाल चुनाव कवर करने के लिए गया था तो उनसे मिलने की कोशिश की। उनके पास उस समय मोबाइल तक नहीं था और वे मुख्यमंत्री होते हुए पार्टी कार्यालय में ढेर सारी किताबों से घिरे और पार्टी के लिए आम कार्यकर्ता की तरह काम करते मिले। वे अपने पास बैठे किसी युवा नेता को मायकॉव्स्की की किताब से कुछ अंश सुना रहे थे,
“Our planet is poorly equipped for delight.
One must snatch gladness from the days that are.
In this life
it's not difficult to die.
To make life
is more difficult by far.”
यानी हमारा ग्रह आनंद के लिए ठीक से बना नहीं है।
इंसान को खुशी उन दिनों से छीननी पड़ती है जो बीत रहे हैं।
इस जीवन में
मरना मुश्किल नहीं है।
जीवन को गढ़ना
कहीं ज़्यादा मुश्किल है।”
मैंने उनसे बातचीत की कोशिश की और पूछा कि लोग मान रहे हैं, इस बार दीदी आ जाएंगी तो वे बोले, कॉमरेड : उनी दीदी नाना, उनी दादा! अरे वो काहे की दीदी, वो तो पूरी दादा हैं! और मैंने वह स्टोरी भेजी कि इस बार बंगाल में दीदी ही दादा हैं तो नतीजे आने के बाद वह ख़बर एकदम सटीक रही! रहती भी क्यों न; क्योंकि हैडिंग तो ख़ुद तत्कालीन सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दिया था।
#GhoshToBananerjee #BuddhDebBhattacharya @cpimspeak@CPIM_WESTBENGAL@CPIMKerala@tncpim@AmraRamMPSikar@seemay@manojkjhadu@_YogendraYadav@Alok304kumar
ग्रीष्मावकाश कटौती पर शिक्षक संघ हुए लामबंद,कटौती का कर रहे विरोध..
भीषण गर्मी के समय स्कूलों को खोलना विद्यार्थियों के हित मे नही
शिक्षकों भी करना होगा अतिरिक्त उपार्जित अवकाश का भुगतान।
@madandilawar
माता-पिता के निधन पर 13 दिन सवैतनिक शोक अवकाश की मांग!
राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा ने माता-पिता के निधन पर सरकारी व निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को 13 दिन का अनिवार्य सवैतनिक शोक अवकाश देने की मांग उठाई है।
शिक्षक संघ @RESTARajasthan ने किया ग्रीष्मावकाश में 10 दिन की कटौती का प्रस्ताव विरोध,राज्य सरकार एवं शिक्षा विभाग से की पुनर्विचार की मांग। @me_moharsingh
जब शैक्षणिक कैलेंडर केंद्रीय तर्ज पर है,तो अवकाश और अधिकार सौतेले क्यों?
राजस्थान शिक्षा विभाग: जिम्मेदारी केंद्रीय,सुविधाएं प्रांतीय?
मापदंड | KVS | राजस्थान
सत्र: समान (अप्रैल से शुरू)
ग्रीष्मावकाश:03 मई से | 16 मई से
स्कूल खुलना:21 जून | 21 जून
कुल अवकाश:76 दिन | 46 दिन
@RESMA_7@Dadarwal7@saten_08@JATbera1 @SKT_Choudhary @Rahulchechi26
नया शिक्षा सत्र 1 अप्रैल से शुरु होगा ओर 21 जून से राज्य में वापस स्कूलें खुलेंगे तो सही है क्योंकि पहले शीतकालीन अवकाश 7 दिन के होते थे अब 12 दिन के कर दिए ऐसे ही ग्रीष्मकालीन अवकाश 16 की जगह 11 मई से होंगे। जैसे केंद्रीय स्कूलों में होता है।
यह वीडियो सीकर का है। डिलीवरी बॉय की घर चलाने की मजबूरी है, लेकिन इन कंपनियों को सोचना चाहिए। क्यों किसी की जिंदगी खतरे में डाल रहे हैं। शर्म आनी चाहिए।