प्रभु की लीला देखिए!
रामलला की मूर्ति गढ़ने वाले प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगिराज ने अविश्वसनीय बात बताई।
"...मूर्ति निर्माण होते समय अलग दिखती थी। लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा होते ही भगवान ने अलग रूप ले लिया है। जिस रामलला को सात महीने तक गढ़ा, उसे ��्राण-प्रतिष्ठा के बाद मैं ख���द नहीं पहचान पाया था। गर्भगृह में जाते ही बहुत बदलाव हो गया..."
जैसे वनमें नयी-नयी घासकी खोजमें विचरते हुए अतृप्त पशुको उसकी घातमें लगा हुआ व्याघ्र सहसा आकर दबोच लेता है, उसी प्रकार भोगोंमें लगे हुए अतृप्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है।
विषयों में अनुराग रखने से आसक्ति हो जाती है बार बार इनका सुख लेने से चित्त में संस्कार निर्मित होता है जिससे वासना का रूप धारण कर लेता है इन्ही वासनाओं की तृप्ति के लिए जीव को बार बार देह धारण करना पड़ता है इसी विवशता को बन्धन कहते हैं!
बनावटी, दिखावटी,छल,कपट प्रपंच, प्रतिस्पर्धा,प्रभाव एवं प्रभुत्व की आकांक्षा लिए, माया से वशीभूत भागमभाग वाली जीवनचर्या से स्वास्थ्य एवं शांति को प्राप्त नहीँ किया जा सकता है।