पुलिस स्टेशन के अंदर सरेआम 10 गोलियाँ चलाने वाला BJP का ये MLA #GanpatGaikwad अब कम से कम मंत्री , गृहमंत्री, मुख्यमंत्री बनने के काबिल तो हो ही गया है।
सम्मानित विधायक महोदय 2009,2014 तक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ही चुनाव जीते थे और 2019 में जब परम आदरणीय युगपुरुष/युगदृष्टा/महामानव/विश्व गुरू ने इन्हें अपनी पार्टी का टिकट दिया था -तब तक इनके ख़िलाफ़ 18 आपराधिक मुक़दमे दर्ज हो चुके थे।
लेकिन नया भारत बनाने के लिए साक्षात अवतार जी को ऐसे ही तो कर्णधारों की ज़रूरत होती है। लिहाज़ा मुक़दमे/आचरण इत्यादि पर सोचना मिथ्या है -जब तक वो अपना है।
संघी कुतर्क कर रहे हैं कि फ़ोन में एप है तो फ़ोन में रेल की जानकारी क्यों नहीं देख लेते। पहली बात अक्सर फ़ोन में जिस प्लेटफार्म न. को दिखाया जाता है कई बार ट्रेन दूसरे प्लेटफार्म पर आती है। मेरी ख़ुद की ट्रेन इस चक्कर में छूट चुकी है। इसलिए स्टेशन पर मौजूद स्क्रीन पर देखना ज़रूरी होता है। कुछ कह रहे हैं इन स्क्रीन्स पर सिर्फ़ एड चलाये जाते हैं टाईम नहीं दिखाया जाता। इन गँवारों को कैसे बताऊँ कि कुछ मिनट पहले ही इन स्क्रीन्स पर रेल की टाइमिंग और प्लेटफार्म न. की जानकारी दी जा रही थी। मैं अपनी वीडियो में भी ये बात बता रहा हूँ। लेकिन भाजपाई अंधसमर्थक बिना जानकारी के भी अंदाज़े के भरोसे कुतर्क कर रहे हैं। तीसरी महत्वपूर्ण बात ये कि जो ट्रेन लेट हो जाती हैं। अक्सर IRCTC के एप पर उनकी जानकारी नहीं आती। कल मेरी ट्रेन दोपहर 1 बजे की थी। लेकिन लेट होते होते शाम 6 बजे के लिए Schedule हो गई। मैं रास्ते में ही एप पर जानकारी देख रहा था। लेकिन एप ख़ुद कह रहा था कि हमें इस ट्रेन की जानकारी नहीं है। अगर आप इस ट्रेन में हैं तो हमसे जानकारी शेयर करें। सिर्फ़ नार्मल मैसेज से रेलवे ने जानकारी दी कि ट्रेन इस वक्त आएगी, उस वक्त आएगी। लेकिन ये नहीं पता चल रहा था कि किस प्लेटफार्म पर आएगी। और जो ट्रेन पहले से ही 5 घंटे लेट है चलने में, जिसकी जानकारी एप पर भी नहीं मिल रही। उसकी जानकारी के लिए स्टेशन की स्क्रीन्स पर देखना ज़रूरी है। ख़ासकर तब जब आपको लगे कि आप लेट हो रहे हैं और आख़िरी मिनट्स में हूँ। ट्रेन और हवाई यात्रा के समय एक एक मिनट ज़रूरी होती है। 30 सेकंड लेट होने पर भी ट्रेन छूट जाती है। भले ही ट्रेन ख़ुद 5 घंटे लेट चल रही हो। वैसे में जब आप एक लेट चल रही ट्रेन की सही जानकारी के लिए स्टेशन की स्क्रीन देखें और तभी स्क्रीन पर रेल की टाइमिंग और प्लेटफार्म नंबर हटकर एक न्यूज़ चैनल और उसपर प्रधानमंत्री की वीडियो दिखाई जाने लगे। तब आपको क्या फ़्रस्ट्रेशन फील होगी? रेलवे की स्क्रीन्स पर एड्स का आना समझ आता है। हालाँकि वो भी फ़्रस्टेटिंग है। लेकिन फिर भी उसे समझा जा सकता है। लेकिन न्यूज़ चैनल चलाने का क्या तुक है? एक नेता के समर्थन में इस देश की व्यवस्थाओं को क्यों नष्ट करने में समर्थन कर रहे हो। मोदी का समर्थन किया जा सकता है। लेकिन इन बातों का विरोध भी किया जा सकता है। इतने अंधे होकर कैसे अपने आप को देशभक्त कह सकते हैं। ये तो नितांत मूर्खता है।
दोहराइये मेरे साथ -
हम, भारत के लोग,
भारत को एक संप्रभु समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और इसके सभी नागरिकों को सुरक्षित करने का गंभीरता से संकल्प लेते हैं:
न्याय , सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक;
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता …
तेलंगाना के संगारेड्डी में भीड़ ने JSR के नारे लगाते हुए मुस्लिम व्यक्ति अब्दुल क़ादिर की फलों की दुकान में लगाई आग,आस पास की अन्य संपत्ति में भी की गई तोड़फोड़, संगारेड्डी के दौलताबाद में अब्दुल क़ादिर फल की दुकान के माध्यम से अपने परिवार का पालन पोषण करते थे जो कि अब नही कर पायेंगे क्योंकि JSR के नारे लगाते हुई आई भीड़ ने उनकी दुकान को राख में बदल दिया है!
@revanth_anumula@TelanganaCMO
मोदी की सत्ता के सामने भजन आरती करने पादुका -पूजक मुझे पत्रकारिता का पाठ न पढ़ाएं .
मोदी की नज़र ए इनायत के लिए कुछ भी करने को तैयार चाटूकार भी पत्रकारिता पर ज्ञान दे रहे हैं .
नौ साल जिसने नौ सेकेंड का एक सवाल भी मोदी और शाह से नहीं पूछा हो , वो भी पत्रकारिता का प्रोफ़ेसर बना फिर रहा है .
@AshrafFem राजस्थान में पहली बार जब BJP आई तब वीरेंद्र सिंह न्यागली को मारा गया था।
दूसरी बार आनंदपाल को मारा गया ।
तीसरी बार सरकार बनने जा रही है और आपके सामने है सुखदेव सिंह को मारा गया।
न्यूरेम्बर्ग रैली की यह मशहूर तस्वीर..
आपने भी देखी होगी। और सोचा होगा कि यह जर्मनी की फौज है। कतई नही।
ये पार्टी की निजी फ़ौज है। एसएस है, आप इन्हें शाखा के स्वयंसेवक कह सकते हैं।
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जर्मनी में फ़ौज, रोजगार का एक प्रमुख साधन था। इसके बूते फ्रेडरिक, बिस्मार्क और कैसर ने दुनिया जीतने के ख्वाब संजोए।
इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, वर्साई की ट्रीटी में प्रमुख शर्त, जर्मन फौज घटाया जाना थी।
हर दस में से आठ फौजी को जबरन रिटायर किया गया। 1919 से 1930 के दौर में लाखों प्रशिक्षित फौजी सड़कों पर बेकार घूम रहे थे, मजदूरी कर रहे थे। उनका आत्मसम्मान चकनाचूर था।
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बेरोजगार फौजियों को हिटलर ने पार्टी में भर्ती किया। उनका स्वयंसेवक मंडल बनाया। सारे वेटरन फौजियों को पार्टी की विचारधारा में प्रशिक्षित किया।
जाहिर है, इसमे शुध्द जर्मन नस्ल के लोग ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें यहूदियों पर जुल्म ढाने के लिए उकसाया गया। कानून हाथ मे लेने की इस सामूहिक हिम्मत से पुलिस और सरकार को भी सांप सूंघ गया।
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एसएस के गुंडों का एक प्रमुख काम खुद की रैली एफिशिएंटली ऑर्गनाइज करना, दूसरों की बिगाड़ना था।
मार पीट, गुंडागर्दी एकदम सैनिक अनुशासन के साथ। उनका अपना रेजीमेंटेशन, पदक्रम, इलाका और फौजी रैंकिंग थी, जहां अवैध कमाई की वसूली करनी थी।
इन लोगो पूर्व सैनिक जीवन का सम्मान, नाम के आगे कैप्टन, मेजर लगा होना .. समाज मे नाजियों को समर्थन, जनता में नाजी पार्टी की स्वीकृति बढ़ाता था।
पूर्व फौजियों के समर्पित, "अनुशासनयुक्त अनुशासनहीनता" ने हिटलर की चुनावी राह आसान की।
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सत्ता में आने पर एसएस का विस्तार हुआ। हिटलर को देश की सेना और पुलिस का भरोसा नही था।
क्योकि वे लोग सरकारी थे, सम्विधान के लिए प्रतिबद्ध थे। एसएस में हिटलर, और सिर्फ हिटलर के प्रति वफादारी की कसम खायी जाती।
आने वाले दौर में सेना, पुलिस, गेस्टापो और तमाम सरकारी संगठनों में एसएस मेम्बर्स को कंट्रक्चुअल नियुक्त किया जाने लगा। वेतन दिया जाने लगा।
लैटरल एंट्री सिस्टम समझ लीजिए। इस तरह ब्यूरोक्रेसी के हर सिस्टम में नाजी घुस गए।
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एक वक्त आया, जब एसएस के मेंबर्स की तादाद, सेना की दस गुनी हो गयी थी।
पूरा देश, उसकी हर संस्था नाजी गैंग में बदल दी गयी। हर सरकारी संस्थान में, ऊपर से नीचे, नाजी पार्टी के पन्ना प्रभारी, ब्लाक प्रमुख, मण्डल प्रमुख ही बैठे थे। जर्मनी पूरी तरह हिटलर की मुट्ठी में था।
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यह वो शानदार मॉडल था, जिसे पढ़ने मुंजे यूरोप गए थे। लौटकर भारत मे भी शाखाएं शुरू हुई। स्वयंसेवको को सैनिक प्रशिक्षण देना शुरू हुआ।
सावरकर ने भी हिन्दुओ के सैन्यकरण पर जोर दिया था। इस कारण से हिन्दू महासभा और संघ, दूसरे विश्वयुद्ध दौरान में भारतीयों को सेना में अस्थायी प्रवेश लेने वकालत करते रहे।
वे भर्ती रैलियों को फैसिलिटेट करते रहे,। ठीक तब, जब गांधी "भारत छोड़ो" की हुंकार भर रहे थे।
गांधी हत्या में सजा पाने वाले दो किरदार, ब्रिटिश सेना में अस्थायी कैडर बनकर सैन्य प्रशिक्षित हुए थे-
गोपाल गोडसे, और नारायण आप्टे
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मुंजे ने यूरोप से वापस आने के बाद पुणे में "भोसले मिलिट्री स्कूल" खोला था।
वह स्कूल आज भी है, अब साधारण सीबीएसई क्युरिकुलम पढ़ाता है।
क्योकि नव नाजियों को प्रशिक्षित कर एसएस में बदलने का काम, अब भारतीय सेना को आउटसोर्स किया गया है।
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चार साल के बाद सैन्य प्रशिक्षित, हथियारो में सिद्धहस्त, विध्वंस और हत्या के कौशल में दक्ष हजारो युवा अपने यूथ के प्राइम में हिंदुस्तान की सड़कों पर बेरोजगार घूम रहे होंगे।
पार्टी, सरकार और नेता की उपलब्धियों के प्रचार की जिम्मेदारी उन्हें दी जा चुकी है।
सरकार की हमारी आँखों के सामने इंडियन आर्मी अब विशाल शाखा में तब्दील होने जा रही है।
आपके बच्चे, षड्यंत्र के इस "अग्निपथ" पर ढकेले जा चुके हैं।
पंडित जी कुछ उपाय बताइए, मैच फंसे हुए हैं 🙏
उपाय अब बस एक ही है,
इस नाम में दोष है, काँग्रेस के राज में बने स्टेडियम का नाम बदल कर दुबारा #सरदार_पटेल कर दीजिए... कृपा हो सकती है.
ना नाम बदला - ना ही कृपा हुई - मैच हार गए - #PanautiModi#Worlds2023#INDvAUS#SardarPatelStadium #Rajasthan