बनारस में NEET की तैयारी कर रही सासाराम की बेटी #स्नेहा_कुशवाहा के साथ दरिंदगी हुई, फिर न्याय देने के बजाय प्रशासन ने साजिशन इसे आत्महत्या बना दिया।
सबूत मिटाने के लिए हाथरस कांड दोहराया गया—परिवार न्याय मांग रहा है, लेकिन सत्ता खामोश है।
#JusticeForSnehaKushwaha
लगेगी आग तो आएंगे कई घर जद में
यहां मेरा अकेले का मकान थोड़ी है.
बहन स्नेहा को न्याय दिलाने के लिए आगे आए सभी सोशल एक्टिविस्टों का धन्यवाद आभार जिन्होंने हर तरीके से जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक पर आवाज उठाई और शासन प्रशासन को हिलाकर रख दिया है.!
#JusticeForSnehaKushwaha #स्नेहा_कुशवाहा #स्नेहा_को_न्याय_दो
हम एक सभ्य और सुरक्षित समाज बनाने में असफल होते जा रहे हैं, लेकिन सरकार के पास अब भी मौका है कि वह दोषियों को ऐसी सजा दे, जो इंसाफ की मिसाल बने और भविष्य में कोई भी दरिंदा ऐसी हरकत करने की हिम्मत न कर सके।
#JusticeForSnehaKushwaha
राजे-रजवाड़े खत्म हो गए, यह लोग आपके वोट के मोहताज हैं। आप इन्हें प्रधानमंत्री बनाते हो, मुख्यमंत्री बनाते हो, सांसद-विधायक बनाते हो और यह आपको बेचारा समझते हैं, याचक समझते हैं"। राहुल गांधी को संसद में सुनने के बाद अब यह शानदार भाषण सुनिए।
पवन खेड़ा @Pawankhera बोल रहे थे और "भारतीय छात्र संसद "में खचाखच भरे हाल में हजारों छात्र उन्हें बेहद गंभीरता के साथ सुन रहे थे।
जब वह कहते हैं कि सवाल पूछना होगा तो वह जानते हैं कि इस देश के हुक्मरानों के पास जनता के सवाल के जवाब नहीं हैं।
"कौन सी बात कहां कैसे कही जाती है
यह सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है"
सबका साथ, सबकी आवाज़ – आपका अपना "जन काफिला"
नमस्कार प्यारे दोस्तों,
मैं अभिनव सिंह, दिल से आप सभी को एक बड़ी खुशखबरी देना चाहता हूँ। हमने एक सपना देखा था – एक ऐसा मंच जहाँ हर आवाज़ सुनी जाए, हर विचार को जगह मिले, और हर इंसान को उसकी सही पहचान मिले। आज, वह सपना "जन काफिला" के रूप में साकार हो रहा है।
यह सिर्फ एक पॉडकास्ट नहीं, बल्कि एक आंदोलन है – आपकी आवाज़ का आंदोलन। यहाँ कोई बड़ा या छोटा नहीं होगा, हर कोई ख़ास होगा। हम आपको सुनेंगे, आपके सवालों को जगह देंगे, आपकी कहानियों को दुनिया तक पहुँचाएँगे।
लेकिन यह सफर अकेले पूरा नहीं होगा। हमें आपके साथ, आपके समर्थन और आपके प्यार की जरूरत है। आपका हर एक सब्सक्राइब, हर एक शेयर, और हर एक कमेंट इस मिशन को और मजबूत बनाएगा। यह सिर्फ हमारा नहीं, हम सबका काफिला है।
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और इंदिरा गांधी ने ऐसे बना दिया राजेश पायलट का रिश्ता राजस्थान से
आज राजेश पायलट की जयंती है। वे हमारे बीच होते तो अस्सी बरस पार कर चुके होते। कल्पना करिए कि अस्सी पार के राजेश पायलट कैसे लगते और किस तरह के भाषण दे रहे होते।
एक बेहद निर्धन परिवार में पले-बढ़े राजेश्वरप्रसाद इतने ब्रिलिएंट स्टूडेँट थे कि उन्होंने उस सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में एडमिशन ले लिया, जहाँ से नूरूद्दीन अहमद, अमिताव घोष, गोपाल कृष्ण गांधी, सुचेता कृपलानी, राजमोहन गांधी, रामचंद्र गुहा, निर्मल वर्मा, गोपीचंद नारंग जैसी शख़्सियतें निकलीं।
राजेश पायलट का मूल नाम राजेश्वरप्रसाद था और उन्होंने भरतपुर संसदीय क्षेत्र का टिकट मिलने के बाद संजय गांधी की सलाह पर यह नाम बदला था।
राजेश पायलट के जीवन की कहानी बहुत ही दिलचस्प और प्रेरणादायी है। ख़ासकर उन युवक-युवतियों के लिए, जिनके पास पैसा नहीं है और वे इसके बावजूद राजनीति में आकर देश के लिए कुछ करना चाहते हैं।
लेकिन दु:खद है कि राजेश पायलट के प्रेरक जीवन को किसी अच्छे राजनीतिक लेखक ने शब्दों में नहीं पिरोया है। उनकी एक हृदयस्पर्शी जीवनी कुछ साल पहले उनकी सहधर्मिणी रमा पायलट ने लिखी थी, जिसमें कई दिलचस्प घटनाएं और जीवन के दु:खदर्द और संकटों को बहुत ही शालीन तरीके से पिरोया गया है। लेकिन एक पत्नी अपने पति के बारे में लिखे तो उसकी अपनी आंतरिक और बाहरी सीमाएं होती हैं।
आज हम ऐसे युग में हैं, जब नैतिक रूप से गिरे हुए लोगों को प्रेरक और सफल रूप से प्रस्तुत किया जाता है और लोग उनके संपर्क में होने से गर्व महसूस करते हैं। यही वजह है कि आज राजनीति, कला, संंस्कृति और मीडिया की वीथिकाओं में पतनशीलता भी गर्वीले एहसास के साथ टहलती है।
राजेश पायलट जीवन की धूल चाट कर बड़े हुए थे। उस धूल में गोधूलि के उन कणों का अंबार था, जिनसे किसी भी खेतिहर और पशुपालक परिवार के जीवन का सुनहरा भविष्य बनता है।
जिस व्यक्ति ने गायें नहीं पालीं, वह नहीं जानता कि जीवन और उसमें गोधूलि की क्या महत्ता है। जो गाय नहीं पालते और गाय को सिर्फ़ और सिर्फ़ पवित्र पशु मानते हैं, उन्हें गोधूलि की महत्ता स्वप्न में भी पता नहीं चल सकती।
मेरे अपने पिता और माँ गाएँ और भैंसें तो पालते ही थे; लेकिन उनका पारिवारिक काम पीढ़ियों से घोड़े पालने का था। गायों और भैंसों का सारा दूध घोड़ों को पिलाया जाता था और खेत से आने वाले जौ और चने घोड़ों को ही खिलाए जाते थे।
मैं समझ सकता हूँ कि राजेश पायलट के जीवन में गौ पालन से लेकर सेंट स्टीफ़न तक जाने के दौरान कैसी चुनौतियां रही होंगी। रमा पायलट ने इसके कई कोमल और हृदयस्पर्शी संस्मरण अपनी पुस्तक में लिखे हैं।
राजेश पायलट तूफ़ानों से लड़े, कई बार गिरे और बार-बार खड़े हुए। वे मिट्टी से सोना खोदने वाले और इस्पात मोड़ने वाली शख़्सियत साबित हुए थे।
एक अकल्पनीय क़ामयाबी पाने वाले राजेश्वर प्रसाद ने जब वायु सेना से पायलट की असाधारण नौकरी छोड़कर राजनीति में आना चाहा और इस दौरान इंदिरा गांधी से हुई मुलाकातों की बातें इंदिरा गांधी और संजय गांधी का एक अलग ही चेहरा प्रस्तुत करती हैं। वे क्या लोग थे, जिनसे मिलना इतना आसान था।
राजेश पायलट इंदिरा गांधी से आशीर्वाद लेने गए और कहा कि वे प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह के ख़िलाफ़ बागपत चुनाव लड़ना चाहते हैं तो उन्होंने उन्हें नौकरी न छोड़ने और बाद में किसी दिन अपनी पत्नी को भेजने के लिए कहा।
रमा पायलट जब इंदिरा गांधी से मिलने गईं तो वे उनकी मॉडर्न वेशभूषा देखकर एकबारगी अवाक् रह गईं और उन्हें पहचान नहीं पाईं। इंदिरा गांधी ने समझा था कि गुर्जर परिवार के इस युवक की पत्नी की वेशभूषा ठेठ ग्रामीण होगी।
इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप के बावजूद 1980 में राजेश पायलट को बाग़पत से टिकट नहीं मिला। इसकी एक लॉजिकल वजह भी थी। इस सीट पर रामचंद्र विकल की दावेदारी थी, जो गुर्जर ही थे और आर्यसमाज के बहुत बड़े सुधारक रहे थे। महात्मा गांधी की हत्या ने विकल को इतना झकझोर दिया था कि उन्होंने अपना पूरा जीवन काँग्रेस को समर्पित कर दिया था। उन्होंने काफ़ी भूमि भी निर्धनों को दे दी थी। लेकिन चरणसिंह के सामने वह चुनाव विकल बुरी तरह हार गए थे।
बागपत का टिकट घोषित होने के बाद निराश राजेश पायलट और रमा पायलट अपने स्कूटर से एयरपोर्ट पर जाकर हैदराबाद उड़ान भरती इंदिरा गांधी से मिले तो उन्होंने मुस्कुराकर दोनों को देखा और हुँम्ममम के साथ अभिवादन का जवाब देकर चली गईं। उसी शाम संजय गांधी ने राजेश पायलट को टेलीफ़ोन करके बुलवाया और इसके बाद जो हुआ, उसने राजस्थान की राजनीति की एक नई इबारत लिख दी। (१.) (अगले ट्वीट में २.)
@SachinPilot
#RajeshPilot #Sachinpilot #RajasthanPolitics
राजस्थान की राजनीति और राजेश पायलट (२.)
आज अगर सचिन पायलट जैसा नेता राजस्थान में है तो उस शाम की वजह से है, जब राजेश पायलट को भरतपुर चुनाव लड़ने के लिए भेजा गया। राजेश पायलट और उनकी पत्नी रमा के लिए भरतपुर एक नया इलाक़ा था और इसका नाम भी ठीक से उन्होंने नहीं सुना था।
राजनीति का सूर्य अब अब नया रथ लेकर तैयार था और एक नए चेहरे को ला रहा था।
अपने युवा काल में संसद में गरजने और अपने तर्कों से सरदार पटेल जैसे नेता को भारतीय संविधान सभा में पराभूत करने वाले राजबहादुर के साथ भी यही समस्या हुई कि वे राजनीति से समय पर संन्यास नहीं ले पाए और काँग्रेस हाईकमान के लिए बड़ी समस्या बन गए। आख़िर हाईकमान को टिकट काटनी पड़ी तो राजस्थान से कोई नेता तैयार नहीं हुआ। वह इलाक़ा ब्रजेश्वरसिंह और नत्थीसिंह जैसे नेताओं के दबदबे से आक्रांत था।
राजेश पायलट राजेश्वर प्रसाद के रूप में जयपुर पीसीसी आए तो पीसीसी चीफ जगन्नाथ पहाड़िया ने पहचाना नहीं।
राजेश पायलट ने भरतपुर से उम्मीदवार होने के बारे में कहा तो पहाड़िया और दूसरे नेताओं ने उपहास किए।
लेकिन जब एक सामान्य जगन्नाथ को सीएम पहाड़िया बनाने वाले संजय गांधी ने ही फ़ोन किया तो पहाड़िया कुछ पसीजे और उन्होंने अपनी गांधी टोपी संभालते हुए पायलट को बैठने के लिए कहा।
वैसे राजस्थान की राजनीति में नए और नौजवानों के प्रति असहिष्णुता का भाव बहुत गहरा है।
राजेश पायलट ने नामांकन भरा तो उसे किसी चूक से रद्द करवाने और नामांकन पत्र में कोई गंभीर त्रुटि रखवा देने वाले काम भी शुरू हो गए। राजेश पायलट को संजय गांधी ने इन सब बातों के बारे में समय पर नहीं चेताया होता तो उस दौर के काँग्रेसी पायलट को बहुत पहले वापस भेज देते। लेकिन गांधी-नेहरू परिवार इस सबको लेकर हमेशा ही सजग रहा है। उस समय उनकी कुचालों कामयाब हो जातीं तो शायद जनता दल के नेता नत्थीसिंह निर्विरोध ही चुनाव जीत जाते।
लेकिन जैसा कि कहते हैं, वह जन मारे नहीं मरेगा। नहीं मरेगा। जो जीवन की आग जला कर आग बना है। ऐसा राजेश पायलट के साथ ही नहीं, बहुत सी शख़्सियतों के साथ होता है। भले वे किसी भी दल या विचार में हों या किसी भी क्षेत्र में।
राजेश पायलट को आम कार्यकर्ताओं ने चुनाव जितवाया और राजस्थान की एक धारा में बहती राजनीति को बदल दिया।
1984 में भरतपुर नवलकिशोर शर्मा आ गए तो पायलट दौसा शिफ़्ट किए गए। और इसके बाद इस लोकसभा सीट के आरक्षित होने तक पायलट यहाँ आजीवन सदस्य रहे और उनके बाद रमा पायलट और सचिन पायलट सदस्य बने। इसके बाद की कहानी संभवत: राजस्थान के सब लोगों को पता है।
राजेश पायलट को राजनीति में आने की तब सूझी जब कृषि मंत्रालय के हेलीकॉप्टर से किसानों की फ़सलों पर पेस्टीसाइड का छिड़काव कर रहे थे।
मुझे याद है, मैं घमूड़वाली में छठी कक्षा में था तो वे घमूड़वाली, बींझबायला और 36 एलएनपी के बीच के इलाके़ में हेलीकॉप्टर से पेस्टीसाइड छिड़काव के लिए वे आए थे तो हमारा पूरा स्कूल वहीं आ गया था।
उस समय उन्होंने बहुत बच्चों से हाथ मिलाया, बातचीत की और सबसे अच्छा पढ़कर आगे बढ़ने का एक पूरा लेक्चर ही दे दिया था। उन्होंने सबको हेलीकॉप्टर के बारे में बताया।
राजेश पायलट ने जब हेलीकॉप्टर से किसानों की फ़सलों पर से उड़ान भरी तो उन्होंने देखा कि किसानों के हालात कितने बदतर हैं। ये हालात कैसे सुधरें और इसी जन्म में, इस जीवन में कैसे सुधरें तो इसका रास्ता राजनीति से होकर ही आता है।
जिन लोगों ने खेती नहीं की, पशुपालन नहीं किया और जिन्होंने सिर्फ़ बेचना और ख़रीदना ही सीखा है, उस संस्कृति से निकले लोग अगर राजनीति में भी जाएंगे और सत्ता भी हासिल करेंगे तो किसानों की समृद्धि को सुसंस्कृत राह पर लाने के बजाय इसे मौत की राह पर डालकर मुनाफ़े की चमक दिखाएंगे।
राजेश पायल को किसान और जवान से बहुत प्रेम था और उनकी राजनीति उस राह पर एक अंतिम गंतव्य तक पहुंचती, उससे पहले वे एक दु:खद दुर्घटना में चले गए।
राजस्थान की राजनीति में विभिन्न दलों में लोकतांत्रिक युग में जो बेहतरीन नेता हमें मिले हैं, उनमें राजेश पायलट एक थे। दमकते नक्षत्र सी उस शख़्सियत को सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल की इन पंक्तियों के साथ असीम प्रणाम :
हम जिएँ न जिएँ दोस्त
तुम जियो एक नौजवान की तरह,
खेत में झूम रहे धान की तरह,
मौत को मार रहे बान की तरह।
हम जिएँ न जिएँ दोस्त
तुम जियो अजेय इंसान की तरह
मरण के इस रण में अमरण
आकर्ण तनी
कमान की तरह!
#RajeshPilot #SachinPilot @SachinPilot #RajasthanPolitics
नेता विपक्ष श्री @RahulGandhi ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की।
आंगनवाड़ी बहनें दिनभर काम करती हैं, बहुत मेहनत करती हैं। भुखमरी और कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में आंगनवाड़ी बहनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
लेकिन आज सरकार द्वारा उपेक्षित आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपनी समस्याओं की सुनवाई और सम्मान को भी तरस गई हैं।
देश के विकास में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। सरकार को उनकी समस्याओं का समाधान कर उन्हें उचित मान-सम्मान देना चाहिए।
ये देश की सभी आंगनवाड़ी बहनों का अधिकार है।
📍 दिल्ली
किसी और नेता - मंत्री ने #Manipur की दर्द भारी आवाज़ नही सुनी
सिर्फ़ एक नेता है जिन्होंने दर्द देखा- सुना- महसूस किया… श्री @RahulGandhi जी
जो मणिपुर से लेकर दिल्ली तक… सड़क से लेकर संसद तक- #Manipur के लिए लगातार न्याय की माँग- शांति की अपील कर रहे है
चक्रव्यूह टूटेगा!
हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली में हार के बाद हर कार्यकर्ता यही पूछता है—बीजेपी को कैसे हराएंगे?
धार्मिक ध्रुवीकरण, जातिगत समीकरण, लुभावनी योजनाओं और विशाल संगठन का चक्रव्यूह हमारे सामने है।
क्या ये टूटेगा? हाँ, टूटेगा!
रणनीति 5 स्टार होटलों में नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ धर्मशालाओं में बनेगी। महाभारत में अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ने में असफल रहा, लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने छापामार रणनीति से बड़ी-बड़ी सेनाओं को ध्वस्त किया।
हर विधानसभा में 5 स्किल्ड लोग तैयार करें—जो डेटा एनालिसिस,सोशल मीडिया, माइक्रो मैनेजमेंट और जमीनी हकीकत को समझें। ये कांग्रेस के सच्चे सिपाही होंगे, जो जनता से जुड़कर सही फीडबैक देंगे।
एजेंसियों पर भरोसा छोड़ें।
ग्राउंड-लेवल नेटवर्क ही जीत की कुंजी है। दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और शहरी गरीबों को कांग्रेस से दोबारा जोड़ें।
मै ये ज्ञान इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि मध्यप्रदेश के उपचुनाव में ये काम सफलता पूर्वक कर चुका हूँ
जब कार्यकर्ता मजबूत होंगे, संगठन ताकतवर होगा और रणनीति जमीन से बनेगी, तब बीजेपी का चक्रव्यूह टूटेगा।
#DelhiElectionResults
"महाकुंभ के अवसर पर उप्र में वाहनों को टोल मुक्त किया जाना चाहिए, इससे यात्रा की बाधा भी कम होगी और जाम का संकट भी। जब फ़िल्मों को मनोरंजन कर मुक्त किया जा सकता है तो महाकुंभ के महापर्व पर गाड़ियों को कर मुक्त क्यों नहीं?"
- अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष
@yadavakhilesh@samajwadiparty@MediaCellSP
You may have seen @newslaundry’s reports on voter lists. I spent 3 months investigating it, and Aban Usmani edited the entire series single-handedly.
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शांति के दूत - महानायक … राष्ट्रपिता श्री Mahatma Gandhi जी ने पूरी दुनिया को सत्य - अहिंसा- निडरता- भाईचारा- सत्याग्रह- सर्वधर्म समभाव… प्रेम- शांति- क्षमा जैसे महान सिद्धांतों का सबक़ सिखाया
पूरी दुनिया को महात्मा गांधी जी ने सिखाया की “सत्य - प्रेम - शांति की शक्ति” के सामने बड़ी से बड़ी “धन - बल - सत्ता की ताक़त” घुटने टेक देती है
आज किसी को, महात्मा गांधी जी के इन सिद्धांतों की- सत्य की- “Power of Truth” की “असली ताक़त” समझ आ गई है
Film नहीं, महात्मा गांधी जी को पूरी दुनिया उनके महान जीवन - तप - सिद्धांतों की वजह से सदियों से जानती है…
IT'S NOT JUST FROM GOVERNMENT
that we seek safeguards for Ladakh & Himalayas.
Our demand is as much from... YOU
Please live simply in the big cities, so we in the mountains... may simply live
Watch full video here: https://t.co/dbtPgrfJ4l
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नेहरू की कथा कहता हूं
जब जब नेहरू का जिक्र आता है तो मुझे यूनान के एक पुराने देवता प्रोमीथियस, जिसे हिंदी में प्रमथ्यु भी कहते हैं, की कथा याद आती है. प्रोमीथियस स्वर्ग से धरती को देखता था. नीचे देखता तो इंसान बड़ी बदहाली में दिखाई देता. कभी उसके बच्चों को जंगली जानवर खा जाते, तो कभी वे जाड़े से मर जाते. देवताओं की तरह दो पांवों पर चलने वाला यह प्राणि सारे चौपायों से गया गुजरा नजर आता.
तब प्रोमीथियस को एक युक्ति सूझी. उसने देखा की स्वर्ग में आग है. इस आग ने देवताओं को बहुत से सुख, शक्ति और सुरक्षा दी है. अगर यह आग किसी तरह धरती पर इंसान के पास पहुंचा दी जाए, तो इंसान अपनी बहुत सी पीड़ाओं से मुक्त हो जाएगा.
आग पर स्वर्ग और देवताओं का कॉपीराइट था. प्रोमीथियस क्या करता. उसने स्वर्ग से आग चुरा ली. चुपके से आग धरती पर इंसानों को दे आया. आग मिलते ही इंसान की रातें रोशन हो गईं, उसका भोजन पकने लगा, जंगली जानवर उससे डरने लगे. धरती पर सुख की ऊष्मा पसरने लगी. सुख आया तो देवताओं की चाकरी बंद होने लगी. मनुष्य अब उन्हें कम अर्घ्य चढ़ाने लगा.
देवताओं ने जांच की तो पता चला कि कांड हो चुका है. देवताओं की बपौती आग, धरती पर पहुंच चुकी है. आदमी आत्मनिर्भर हो रहा है. यह पता लगते भी देर न लगी कि आग प्रमथ्यु ने धरती तक पहुंचाई है. प्रमथ्यु को बंदी बनाकर देवताओं के राजा के सामने पेश किया गया. हर कोई उसे कड़ी सजा देता चाहता था. ज्यादातर तो मृत्युदंड ही चाहते थे. लेकिन मृत्युदंड संभव नहीं था, देवता अमर होते हैं, वे भला कैसे मरें.
तब यूनान के इंद्र ने एक ज्यादा खतरनाक सजा सोची. प्रमथ्यु को स्वर्ग से निकालकर जमीन पर लाया गया. वहां इंसान की बस्ती के पास कम ऊंची पहाड़ी पर उसे सलीब पर टांग दिया गया. ठीक वैसे ही जिस तरह ईसा मसीह की सलीब पर टंगी तस्वीर हम देखते हैं. उसके शरीर में ठुकी कीलों से रक्त की धारा बह निकली. प्रोमीथियस असहनीय वेदना में टंगा हुआ था. फिर उसके कंधे पर एक गिद्ध बैठाया गया. यह गिद्ध दिनभर जीवित प्रमथ्यु का मांस नोचकर खाता. रात में जब गिद्ध सोता तो प्रमथ्यु का मांस फिर से भर जाता क्योंकि वह अमर देवता था. सुबह से गिद्ध फिर वही क्रम शुरू कर देता.
प्रमथ्यु की चीखें इंसानों की बस्ती तक पहुंचती रहतीं. सुबह की पहली किरण के साथ बस्ती वाले उस पहाड़ के नीचे पहुंच जाते. वे दिनभर प्रमथ्यु की चीखों को तमाशे की तरह देखते और शाम को फिर अपने घर आ जाते.
जिन मनुष्यों के लिए सलीब पर टंगा प्रमथ्यु अपना मांस नुचवा रहा था और असहनीय पीड़ा झेल रहा था, वे उसकी लाई आग से आगे बढ़ रहे थे और उसकी बेबसी का उत्सव मना रहे थे.
कथा यहीं समाप्त होती है. लेकिन कथा में बताई बात कभी खत्म नहीं होती. वह हर महापुरुष पर लागू होती है, जिसे गोली से नहीं मारा जा सका. लिंकन और गांधी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें गोली से मार दिया गया. नेहरू अभागे थे, जो देश की मरते दम तक सेवा करते रहे. जब तक वे सेवा कर रहे थे, जब तक वे स्वर्ग की आग भारत तक ला रहे थे, वे बहुत लाड़ले थे. उनके जाने के बाद हमने उनके पूरे किरदार को सलीब पर टांग दिया और गिद्ध की तरह उसे नोच रहे हैं.
पहाड़ी के नीचे खड़े होकर उनकी पीड़ा का तमाशा देखने का सिलसिला अब इतना लंबा हो गया है कि तमाशाइयों की नई पीढ़ी यह भूल ही गई है कि इस शख्स को किस बात की सजा दी जा रही है. आज नेहरू की पुण्यतिथि पर उन्हें फिर याद दिलाता हूं कि नेहरू का जुर्म यही था कि जब अंग्रेजी राज में वह सारे सुख भोग सकता था, तब वह बागी हो गया. जब नौजवान ही था तब उसने जलिंया वाला बाग हत्याकांड की रिपोर्ट विस्तार से तैयार की. वह उन चंद लोगों में था जो लोकमान्य तिलक की अंतिम यात्रा में गांधी के साथ चल रहा था. वह उन लोगों में था जिसके प्रभाव में आकर उसके पिता ने अपना घर-मकान सब कांग्रेस को दे दिया था. वह उन लोगों में था जो पहली बार अपने पिता के साथ जेल गया था. वह उन लोगों में था जो सरदार भगत सिंह से मिलने जेल गया था. और भगत सिंह की रिहाई के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था. कांग्रेस के अंदर वह सुभाष चंद्र बोस का सच्चा दोस्त था. अपनी पत्नी कमला की मौत के बाद उनकी चिता की एक चुटकी राख वह जीवन भर अपने साथ रखता रहा. महात्मा गांधी के अंतिम उपवास में चुपचाप खुद भी उपवास करने वाला वह विरला प्रधानमंत्री था. जब वह संसद में ट्रिस्ट विद डेस्टिनी का भाषण दे रहा था, तब उसके दिमाग में लाहौर के वे हिंदू मुहल्ले चल रहे थे, जहां का पानी काट दिया गया था.
वह इतना बुरा था कि जब दुनिया बमों के ढेर पर बैठी थी, तब भी शांति की बात करता था. उसकी शांति का ऐसा जलवा था कि कोरिया के गृहयुद्ध को अंतत: उसी ने एक समझौते पर पहुंचाया था. वह पूरी दुनिया में सम्मानित था और रहेगा.