हमने नीम के सौ पौधे लगाए थे…
वो पौधे आज 20 फ़ीट से ज़्यादा बड़े हो गए हैं…
फिर भी तारबंदी करके उनकी देखभाल करनी पड़ती है
वरना ऊँट सारे नीम खा जाते हैं…
सरकार ने क्या सोचा था…
आज पौधे लगाएँगे, और कल बड़े पेड़ बन जाएँगे…??
खुले छोडकर जाओगे तो जानवर तो खाएँगे ही…
जानवरों के खाने के लिए जंगल तो तुमने छोड़े नहीं…
सरकार द्वारा लगाए गए 99% पौधे आज जीवित नहीं है…
कोरा पैसा बर्बाद करने का अभियान चल रहा है…!!
बेंगलुरु में राज्यपाल के काफिले के लिए 30 मिनट तक ट्रैफिक रोका गया।
इस दौरान अपनी गर्भवती पत्नी को अस्पताल ले जा रहा एक व्यक्ति जाम में फंस गया और विरोध में बैठ गया।
ये VVIP संस्कृति अब खत्म होनी चाहिए, उस व्यक्ति को पूरा समर्थन।
झारखंड के आदिवासी इलाकों में चर्च की बढ़ती संख्या पर मेरे बयान से काफी हंगामा हुआ। अपना धर्म बदल चुके कई लोग इस बात से परेशान हैं कि मैने सिर्फ चर्च की बात की, मंदिरों की नहीं। चलिए, आज इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हैं।
झारखंड के अधिकतर गांवों में आदिवासी-मूलवासी एक साथ रहते हैं। हमारे गांवों में हजारों सालों से जाहेरस्थान/ सरना स्थल/ देशाउली/ मांझी थान है और सनातन समाज के मंदिर भी, जिनमें मूलवासी पूजा करते हैं। आदिवासी- मूलवासी दोनों समुदाय एक दूसरे के पूजा स्थलों में सिर झुकाते हैं, एक-दूसरे के पर्व - त्योहारों में शामिल होते हैं और दोनों सबकी आस्था का सम्मान करते हैं।
इसके अलावा दिउड़ी मंदिर, रंकिणी मंदिर जैसे कई मंदिर हैं, जहाँ आदिवासी समाज के पाहन पुजारी की भूमिका में होते हैं, और सनातनी लोग भी वहाँ पूजा करते हैंं। ठीक उसी प्रकार, हम भी उनके पर्व-त्योहारों में शामिल होते हैं। लेकिन एक दूसरे के धार्मिक स्थलों एवं परंपराओं का यह परस्पर सम्मान हमारी आस्था, हमारी जीवन शैली को कभी नहीं बदलता।
हम आदिवासी पेड़ के नीचे बैठ कर पूजा करने वाले लोग हैं, और जन्म से लेकर शादी-विवाह एवं मृत्यु तक, हमारी बिल्कुल स्पष्ट जीवनशैली है। बच्चे के जन्म, नामकरण, विवाह समेत जीवन के सभी महत्वपूर्ण पड़ावों पर, हमारी सामाजिक प्रक्रियाएं मांझी परगना/ नायके/ पाहन/ मानकी/ मुंडा/ पड़हा राजा आदि पूरी करवाते हैं। जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर हम जाहेरस्थान/ सरना स्थल/ देशाउली/ मांझी थान जाकर मरांग बुरु/ सिंगबोंगा की पूजा करते हैं।
हजारों सालों के इस सामाजिक सह-अस्तित्व में हम लोग एक-दूसरे के हर सुख-दुख के साथी बने, यथासंभव सहयोग किया, लेकिन उन्होंने कभी हमें हमारी आस्था या जीवनशैली बदलने के लिए मजबूर नहीं किया। अभी धर्मांतरण की रफ्तार देख कर लगता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो शायद हमारी संस्कृति बहुत पहले खत्म हो गई होती।
हजारों सालों के हमारे इतिहास में, आपको ऐसा कोई भी मूलवासी/ सनातनी नहीं मिलेगा, जिसने किसी मदद, सहायता या सहयोग के बदले, अथवा हमें लालच/ धमकी देकर हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की हो। वे कभी स्वयं को आदिवासी नहीं बताते। वे लोग आरक्षण समेत हमारे समाज को मिले अन्य अधिकारों को छीनने अथवा उसमें अतिक्रमण करने भी प्रयास नहीं करते, तो फिर उनसे कैसा बैर?
दूसरी तरफ, इस क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों ने 1845 में धर्म प्रचार शुरू किया, लेकिन मात्र 180 वर्षों में इन्होंने हमारी परंपराओं एवं धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचाई, आरक्षण पर कब्जा किया, भाषाओं/ लिपियों का विरोध किया तथा हमारे अस्तित्व को मिटाने की हर संभव कोशिश की। हमारे लाखों लोगों का धर्मांतरण कर के इन्होंने ऐसे हालात बना दिये हैं कि सिमडेगा समेत झारखंड के कई हिस्सों में हमारे जाहेरस्थानों/ सरना स्थलों पर ताला लग चुका है, क्योंकि वहाँ धर्मांतरण की वजह से पूजा करने वाला कोई नहीं बचा।
आदिवासी समाज की पहचान पारंपरिक जीवनशैली, विशिष्ट संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज एवं रूढ़िजन्य परम्पराओं से है, लेकिन ये लोग उसे मिटाने में लगे हुए हैं। ये लोग DNA की बात करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि इन्हीं मिशनरियों की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में आदिवासी संस्कृति विलुप्त हो गई।
लैटिन अमेरिका की अयोरेओ जनजाति, केन्या की संबुरु जनजाति, ब्राजील की वाई वाई जनजाति, फिजी और पैसिफिक आइलैंड्स की जनजातियां धर्मांतरण के बाद अपनी मूल संस्कृति को भूल चुकी हैं। उनके पारंपरिक रीति-रिवाज, त्योहार, भाषा, नृत्य, पूजा-पाठ और सामाजिक संरचनाएं खत्म कर दिए गए। आप खुल कर क्यों नहीं कहते कि भारत में भी आपका असली मकसद यही है?
धर्मांतरण कोई राजनैतिक मुद्दा नहीं, बल्कि हमारे समाज के अस्तित्व से जुड़ा मामला है। अगर धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, वीर सिदो कान्हू, वीर पोटो हो, वीर टाना भगत, वीर तेलंगा खड़िया एवं अन्य मार्गदर्शकों के दिखाए राह पर चलते हुए अगर हम लोग अपनी परंपराओं को नहीं बचाएंगे तो भविष्य में हमारे जाहेरस्थानों, सरना स्थलों, देशाउली आदि में पूजा करने वाला कोई नहीं बचेगा। हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। (Part 1/2)
एक घर तो डाकण भी छोड़ देवे,
हे, नेताओं, ठेकेदारों, अफसरों सरकारी स्कूल की छत तो छोड़ देते...😡
खैर अगर सरकार को स्कूल की छत ठीक करनी होती तो पैसा स्कूल के खाते में डालते तो वहाँ के लोग छत को ठीक करते, उसे मजबूत भी बनाते।
लेकिन सरकार ने स्थानीय स्तर के पास पैसा नहीं भेजा और ठेकेदार को भेजा 🤨
छोटे-मोटे हजार कर्मचारी घोटाला करते हैं
उससे भी कोई हजारों,लाखों गुणा बड़ा घोटाला-
एक जयपुर, दिल्ली का अफसर,
एक मोटा ठेकेदार,
एक सफेदपोश नेता कर देता है।
जबकि जनता इन बाबू टाइप छोटे-मोटे कर्मचारीयों की आलोचना करती है।
जनता की जुबां पर केवल ये हजार-पांच सो डकारने वाले सरकारी कारिंदे ही होते हैं।
भ्रष्टाचार करने पर ACB वाले भी इनको ही ट्रैप करते हैं।
जबकि हाथी-छाप मोटे भ्रष्टाचारी जब आपके मोहल्ले में आते हैं तब आप जनता हाथ में माला, गुलदस्ते, जिंदाबाद के नारे बुलंद करने लग जाते हो। फोटो सेशन तो चलता ही है।🤷
अब देखो एक स्कूल की छत की मरम्मत के 2 लाख
हजारों स्कूलों के लिए ठेके किए
काम दो कौड़ी का किया नहीं
और उठा लिए करोड़ों 😱
मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार को खत्म करना है तो इसकी शुरूआत ऊपर से होनी चाहिए।