जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET के छात्र अपने अधिकारों और न्याय के लिए धरना दे रहे थे, तब कुणाल प्रताप ने देश के प्रधानम���त्री और गृहमंत्री को टैग करके छात्रों का पिछवाड़ा लाल और हरा करने कहा था।
आज वही व्यक्ति झारखंड में युवाओं का शुभचिंतक बनने का ढोंग कर रहा है। सच्चाई यह है कि इनका कोई जनहित या छात्रहित से लेना-देना नहीं है।
इनका एकमात्र एजेंडा QR कोड से चंदा लेना, छात्रों के आंदोलन की आड़ लेकर हेमंत सरकार की लोकप्रिय छवि को धूमिल करना और राज्य के शासन-प्रशासन में बाधा उत्पन्न करना है।
जो इंसान कल तक छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने की वकालत कर रहा था, वह आज झारखंड के युवाओं का हितैषी कैसे हो सकता है?
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कैमरे के सामने एक बुजुर्ग महिला (संजीत की माँ) चेहरे पर उम्र की लकीरें, लेकिन आंखों में आज भी उम्मीद। वहीं दूसरी ओर संजीत (ASO), जो अपने भविष्य और अपने अधिकारों को लेकर सवाल ख��़े कर रहा है।
मैं आप लोगों से पूछना चाहता हूँ, क्या एक लड़का जिसके सिर से पिता का साया तक नहीं है। अपने परिवार को 10 वर्ष के उम्र से पाल रहा है, उसपर 35-40 लाख दे कर नौकरी पाना कितना सही कितना गलत।
अपनी राय कमेंट के जरिए साझा करें।
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