भाइयों और बहनों, मैं देश नहीं बिकने दूँगा!
बस एयरपोर्ट, बैंक, रेलवे, PSU और सरकारी संपत्तियाँ बेचकर देश को आत्मनिर्भर बना दूँगा! 🤡
वाह रे देशभक्ति! नारा देश बचाने का, और काम बेचने का!
लो IDBI भी गया,हम IDBI बैंक का निजीकरण का विरोध करते हैं।
#Privatisation#SavePSUs
@Pramod_Shinde09@nilesh_pawar15 Immediate Implement 5-day banking immediately.
Bankers deserve a healthier work-life balance. Reducing the working week can help lower stress and improve productivity,without compromising essential banking services.
5 days banking now!
#5DayBankingNow
Delays in implementing a 5-day compliance reinforce the perception of bank workers being overlooked, which is unacceptable. #5DayWeekandFairPLI#AIBOC@PMOIndia
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की रिपोर्ट बताती है कि Public Sector Banks की efficiency 93% बढ़ी है।
यह उपलब्धि किसकी मेहनत से आई?
फिर उसी बैंक के Scale-I से Scale-III के 82% अधिकारियों को बैंक की profitability में उनका उचित हिस्सा क्यों नहीं?
यह कैसी विडंबना है?
यह कैसा न्याय है?
और यह कैसी PLI है?
जब मेहनत हमारी, तब हिस्सा भी हमारा
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इस दोषपूर्ण PLI व्यवस्था से यदि सबसे अधिक नुकसान किसी को हुआ है तो Scale-IV एवं उससे ऊपर के वो 20% अधिकारी जिन्होंने पूरी मेहनत, जिम्मेदारी और समर्पण के साथ बैंक के उत्थान में अपना योगदान दिया लेकिन उन्हें न तो Settlement वाली PLI मिली और न ही दोषपूर्ण PLI
ये साबित करता है कि ये PLI कितनी ज़्यादा दोषपूर्ण है। उन्हें कम से कम Settlement के अनुसार PLI मिलनी ही चाहिए।
यह केवल PLI की बात नहीं है, बल्कि बैंक के समृद्धि में उनकी हिस्सेदारी की बात है।
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एक सज्जन ने पूछा “काला बिल्ला क्यों लगाए हो?”
हमने शांत स्वर में कहा “हम आपको कम ब्याज देंगे और आपके पड़ोसी को ज़्यादा”
सज्जन भड़क उठे “यह तो सरासर अन्याय है”
हमने जवाब दिया “ठीक यही अन्याय आज हमारे साथ हो रहा है, इसीलिए यह काला बिल्ला है।”
हम असंवैधानिक PLI स्कीम का विरोध करते हैं।
यह सिर्फ विरोध नहीं यह न्याय और समानता की लड़ाई है।
वित्त मंत्री महोदया ने mis-selling पर जो कहा, वही ज़मीनी सच्चाई है।
शाखाओं में कोर बिजनेस, कस्टमर सर्विस, कम्प्लायंस और NPA वसूली प्राथमिकता में नहीं हैं…लेकिन शीर्ष प्रबंधन की प्राथमिकता है बीमा के लिए लॉगिन डे, महालॉगिन डे, परम लॉगिन डे। Miss selling के कारण अच्छे ग्राहक सरकारी बैंकों से बचकर दूर भाग रहे हैं।
जब बैंकिंग को miss selling का अड्डा बना दिया जाएगा तो सेवा नहीं प्रेशर पैदा होगाऔर उसी प्रेशर से mis-selling जन्म लेती है।
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आदरणीय मैडम,
थोड़ी जानकारी सुधारना ज़रूरी है, हड़ताल हमारा संवैधानिक अधिकार है।
जब हमारे प्रमोटर (भारत सरकार) शनिवार को अवकाश पर रहते हैं
जब हमारे रेगुलेटर (RBI) शनिवार को अवकाश पर रहते हैं
तो हम बैंककर्मी क्यों नहीं?
5 डे बैंकिंग कोई मांग नहीं, हमारा जायज़ हक़ है।
इसे संघर्ष से हासिल करेंगे।
संघर्ष के आगे विजय है।
27 जनवरी हड़ताल तय है।
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झूठ से बैंक कर्मचारियों को बदनाम करना बंद कीजिए।
SBI सोनारी ब्रांच के घटना की रिपोर्टिंग और सच्चाई बिल्कुल अलग है।
झूठ:
SBI सोनारी ब्रांच द्वारा वृद्धा की खाते से पैसे नहीं देने के कारण इलाज नहीं हो सका जिसके कारण वृद्धा की मृत्यु हो गई
तथ्य:
1️⃣ 30 दिसंबर को ग्राहक सुश्री अंजलि बोस स्वयं न चल पाने की स्थिति में थीं। बैंक ने चेक प्रोसेस किया और कैश इन-चार्ज बाहर जाकर खुद ₹52,000 उन्हें सौंपकर आईं।
2️⃣ उनकी शारीरिक स्थिति देखते हुए बैंक ने नॉमिनेशन जोड़ने व संयुक्त खाता खोलने की सलाह दी, पर ग्राहक ने साफ मना किया।
3️⃣ 3 जनवरी को बिना चेक, बिना पासबुक और बिना संबंध प्रमाण के एक महिला ने पैसा माँगा।
बैंक ने प्रक्रिया समझाई और विनम्रतापूर्वक मना किया, क्योंकि नियम इसकी अनुमति नहीं देते।
4️⃣ मानवीय आधार पर बैंक स्टाफ ने ग्राहक के घर तक जाकर चेक पर हस्ताक्षर कराने का प्रयास किया।
5️⃣ घर पहुँचने पर रिश्तेदारों में पैसे को लेकर अनबन शुरू हो गई, और ग्राहक ने चेक पर हस्ताक्षर से इनकार कर दिया।
6️⃣ ग्राहक ने बार-बार स्पष्ट कर दिया कि वह
• किसी को joint holder नहीं बनाना चाहती
• कोई nomination नहीं करना चाहती
• न ही अपने रिश्तेदारों को खाते से पैसा देना चाहती
ऐसी स्थिति में बैंक बिना ग्राहक की अनुमति एक रुपये भी नहीं दे सकता। यह RBI नियम है।
फिर भी बैंक कर्मियों ने ड्यूटी से बढ़कर कर्तव्य निभाया, खाता धारक के घर जाकर स्थिति समझी और सहायता की।
बैंक ने यह विकल्प तक दिया कि आप इनका इलाज बड़े अस्पताल में करवाइए, बैंक द्वारा राशि सीधे अस्पताल को दे दी जाएगी लेकिन इसका भी लाभ परिजनों द्वारा नहीं लिया गया।
अब वही बैंक कर्मचारी झूठी खबरों के आधार पर ‘बलि का बकरा’ बनाए जा रहे हैं।
यह समाज के लिए चेतावनी है।
जब ग्राहक खुद निर्णय लेते हैं, उसकी जिम्मेदारी बैंक पर मत डालिए।
बैंक कर्मचारी अपराधी नहीं हैं।
उन्होंने कानून, प्रक्रिया और इंसानियत—तीनों का पालन किया है।
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सरकारी मदद के बिना भी अपनी क्षमता के दम पर भरोसे का आधार बने हमारे Public Sector Banks.
2022 से एक भी रुपया कैपिटल इन्फ्यूज़न नहीं, फिर भी मज़बूत तरक्की और मार्केट से ₹1.79 लाख करोड़ की सफल पूँजी जुटान। इसका पूरा श्रेय जाता है पब्लिक सेक्टर बैंक कर्मचारियों को।
सरकारी बैंकों ने फिर साबित किया "जब लक्ष्य सेवा हो और संकल्प जनता का, तो हर संकट उपलब्धि में बदल जाता है।"
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अमेरिका निजी बैंकों को खरीद रहा है, हम सरकारी बैंकों को बेचने का प्रयास कर रहे हैं।
अमेरिका जैसे विकसित देश का ऐसा कदम साबित करता है कि बैंकों का निजीकरण एक ध्वस्त फॉर्मूला है जो कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचा सकता है लेकिन आज जनता को नहीं।
सरकारी बैंक ज़िंदाबाद
सरकारी बैंकर ज़िंदाबाद
निजीकरण मुर्दाबाद
बैंक बचाओ देश बचाओ
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बैंकर आत्महत्या क्यों करता है?
एक कठोर सच्चाई जिसे समझना ज़रूरी है
बैंक कर्मचारी लगातार बढ़ते कार्यभार, अजीबोगरीब टार्गेट, ऑडिट प्रेशर और स्टाफ की भारी कमी के बीच काम करता है। बाहर से यह नौकरी सुरक्षित दिखती है, लेकिन भीतर से यह मानसिक, शारीरिक और पारिवारिक संघर्षों का एक अंतहीन चक्र बन चुकी है।
नीचे कुछ कारण हैं जो एक बैंकर को आत्महत्या तक मजबूर कर देते हैं:
1. असंभव टार्गेट और स्टाफ की कमी
नियमित रूप से 10–12 घंटे का काम, थर्ड पार्टी की बिक्री का दबाव, छुट्टियाँ न मिलना।
2. ऑडिट, मेमो, चार्जशीट का भय
छोटी गलती भी करियर पर भारी पड़ती है। यह मानसिक संतुलन बिगाड़ देता है।
3. असहयोगी और अपमानजनक नेतृत्व,
खराब वर्कप्लेस, गाली-गलौज, धमकी, प्रताड़ना सब कुछ “परफॉरमेंस मैनेजमेंट” के नाम पर।
4. ट्रांसफर और परिवार से दूरी
अचानक ट्रांसफर, दूर दूर की शाखाओं में लगातार पोस्टिंग, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी इन हालातों में उठाना।
5. आर्थिक और सामाजिक दबाव, भविष्य की अनिश्चितता।
6. मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी
काउंसलिंग, हेल्पलाइन और सपोर्ट सिस्टम का लगभग अभाव। कर्मचारी अपनी पीड़ा व्यक्त करने से डरता है।
7. शिकायत निवारण की कमजोरी
कर्मचारी की सुनवाई नहीं होती, उल्टा एक्शन का डर रहता है।
यह सिर्फ एक व्यक्तिगत समस्या नहीं—यह एक सिस्टमेटिक फेलियर है।
समय आ गया है कि हम पूछें:
क्या टार्गेट जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?
क्या बैंकिंग सेक्टर में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना अब भी मना है?
क्या सिस्टम को बदलने की जिम्मेदारी किसी का इंतजार कर रही है?
बदलाव की मांग करें।
बैंकर भी इंसान है, मशीन नहीं।
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1969: किसान आत्महत्या करता था क़र्ज़ के बोझ से
2025: बैंकर आत्महत्या कर रहा है फ़र्ज़ के बोझ से।
जिन शाखाओं में ऑफिस टाइम के बाद कैरम खेलकर ज़िंदगी जिया जाता था, वहां आज फांसी के फंदे लटक रहे हैं। पता नहीं हम किस ओर जा रहे हैं।
बैंकों को गरीब, किसान, मजदूर के लिए राष्ट्रीयकृत किया गया था, लेकिन आज ये अड्डा बन गए हैं शीर्ष प्रबंधन की नाकामी, लालच और अहंकार का।
क्रेडिट क्वालिटी, डिपॉज़िट और एथिकल बैंकिंग को पीछे धकेल दिया है उस भ्रष्ट लाइफ इंश्योरेंस के धंधे ने जिसमें सिर्फ विदेश यात्रा, सोने का सिक्का और गिफ्ट कार्ड छुपे हैं।
बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। 🙏
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