मिलावटी खाना भारत में गिरते सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी वजह बनता जा रहा है-लगभग हाहाकार जैसी स्थिति है।
शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो जब मिलावट से जुड़ी कोई खबर सामने न आती हो। और शायद ही कोई ऐसा सप्ताह होता हो जब इस तरह की कोई बड़ी घटना न होती हो।
दूध, दही, पनीर, घी, मिठाइयाँ-दूध से बनने वाली लगभग हर चीज में भयानक स्तर की मिलावट की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
कुछ मामले इसलिए खबर बन जाते हैं क्योंकि लोग अचानक बीमार पड़ जाते हैं या जान चली जाती है। लेकिन उससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि बहुत सी मिलावट स्लो डेथ की तरह काम कर रही है-धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुँचा रही है।
कैंसर सहित अनगिनत लाईलाज बीमारियों के फैलने के पीछे मिलावटी खाद्य पदार्थों की भूमिका को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सीधे-सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला है।
अब बात सिर्फ Right to Food का नहीं रहा, बल्कि उससे आगे Right to Pure Food का हो गया है। लोगों को सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि शुद्ध और सुरक्षित खाना मिलना भी उनका बुनियादी अधिकार होना चाहिए।
सरकार इस समस्या को आपातकाल जैसी गंभीरता से क्यों नहीं ले रही है?
જે અધિકારીઓ પોતાના સ્વાર્થ, ફાયદો, અને ઘમંડ સંતોષવા અને ખાસ કરીને એક કંપની ને લાભ કરાવી મલાઈ ખાટવા વિદ્યાર્થીઓના સપનાઓ સાથે રમત રમી રહ્યા છે તે ચેતી જજો. તમારા લાભ માટે ઉમેદવારોની બલી ન ચડાવો.
#NO_CBRT_IN_GUJRAT
ગુજરાતના પરીક્ષાર્થીઓ 'ગિનીપિગ' નથી, કારકિર્દીના સપનાઓ છે!
જેમને હજુ પણ #CBRT (Computer Based Recruitment Test) ના ઓવારણાં લેવા ગમે છે, એમણે કદાચ ભૂતકાળના '#ઘાતક_પ્રયોગો' પર નજર નાખવાની તરસદી લીધી નથી. ફોરેસ્ટ બીટગાર્ડ અને CCE_2024 ના જે હાલ થયા છે, એ જોયા પછી પણ જો તમે CBRT ના આગ્રહી હોવ, તો યાદ રાખજો કે આ પરીક્ષા પદ્ધતિ નથી, પણ ઉમેદવારોના ભવિષ્ય સાથે રમાતી 'ડકવર્થ-લુઈસ' જેવી જુગારની રમત છે !
⚠️ CBRT ગુજરાતના વિદ્યાર્થીઓ માટે 'ઘાતક ઘા'
🚫૧. નોર્મલાઈઝેશન કે માર્કસનો 'ચકડોળ'? 🎡
કોઈના માર્ક્સ 27 વધે ને કોઈના 52 ઘટે! આ કેવું ગણિત? જ્યારે લાખો ઉમેદવારો હોય ત્યારે મલ્ટી-શિફ્ટ પરીક્ષામાં નોર્મલાઈઝેશન એ પારદર્શિતા નહીં, પણ ઉમેદવારોનો 'ભોગ' લેવાની પદ્ધતિ સાબિત થઈ છે.
🚫૨. 'ગોપનીયતા' કે 'ગોટાળા'ની બારી? 🫣
તમારા અસલ (Raw) માર્કસ કેટલા? એ તો રામ જાણે! એજન્સી 'ગોપનીયતા'ના નામે જે પીરસે એ સ્વીકારી લેવાનું? જ્યાં ટ્રાન્સપરન્સી નથી, ત્યાં વિશ્વાસ ક્યાંથી હોય?
🚫૩. ૩૦ કરોડનો ધુમાડો અને ટેકનિકલ ઠેંગો! 💸
TCS જેવી મોટી એજન્સીઓને કરોડો ચૂકવ્યા પછી પણ જો સર્વર ડાઉન થાય, કોમ્પ્યુટર હેંગ થાય અને ChatGPT થી બેઠું ભાષાંતર કરી ભૂલો પીરસવામાં આવે, તો આ પ્રજાના પૈસાનો વ્યય નથી તો શું છે ?
🚫૪. પરીક્ષા કે ગૂગલ ટ્રાન્સલેટનું પ્રદર્શન? 🤖
પ્રશ્નોમાં અસંખ્ય ભૂલો, ભાષાંતરના ઠેકાણા નહીં અને પ્રશ્નોનું પુનરાવર્તન... શું આટલી મોટી ભરતી પ્રક્રિયા કોઈ ગંભીરતા વગર ચાલે છે?
🚫૫. એક શિફ્ટ, એક પેપર - એ જ સાચો ન્યાય! ✅
તાજેતરમાં ગૌણ સેવા પસંદગી મંડળે રેવેન્યુ તલાટીની પરીક્ષા ઓફલાઈન લઈને સાબિત કરી દીધું કે '#સિંગલ_પેપર' કૌભાંડ વગર લઈ શકાય છે અને તે જ શ્રેષ્ઠ છે. તો પછી ફરીથી CBRT ના નામે ઉમેદવારોને 'પ્રયોગશાળાના ઉંદર' કેમ બનાવવામાં આવે છે?
અત્યારે જે અધિકારીઓ #CBRT ના ગુણગાન ગાય છે, તેને વધારે શિફ્ટમાં લેવામાં આવેલ ફોરેસ્ટ બીટ ગાર્ડ અને CCE 2024નું #નોર્મલાઈઝેશન જોઈ લેવું જોઈએ અને વિચારવું જોઈએ કે જો તમારી પરીક્ષામાં આવું #નોર્મોલાઇઝેશન થયું હોત તો ?
#NO_CBRT_IN_GUJRAT #CCE2026 #JusticeForCandidates #GSSSB #GujaratModel #CancelCBRT #OfflineExamOnly
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🌳 ગ્રીન ગુજરાત તરફ વધુ એક કદમ
ડીસા તાલુકાના ડાવસ ગામે આશરે 13 એકર વિસ્તારમાં ₹3.5 કરોડના ખર્ચે અદ્યતન હાઇટેક નર્સરીનું નિર્માણ થશે. અહીં દર વર્ષે 10 લાખથી વધુ રોપાઓનું ઉત્પાદન થશે, સાથે જ સીડ બેંક, પ્રોસેસિંગ યુનિટ અને વર્મી કમ્પોસ્ટિંગ દ્વારા વનીકરણને નવો વેગ મળશે.
વિદ્યાર્થીઓ, ખેડૂતો અને પર્યાવરણપ્રેમીઓ માટે નર્સરી ઇન્ફોર્મેશન સેન્ટર પણ કાર્યરત રહેશે, જે પર્યાવરણ જાગૃતિને વધુ મજબૂત બનાવશે. 🌳🌱
जब टीम खुरपेंच ने यह वीडियो सवालों के साथ पोस्ट किया , तो लाखों लोगों ने इसे शेयर किया। सैकड़ों लोगों ने अपनी आपबीती लिखी क्लेम रिजेक्ट , घंटों इंतज़ार , अस्पष्ट कारण, एजेंट का रूखा व्यवहार।
लेकिन सच्चाई यह है कि
कुछ दिन ट्रेंड होने के बाद सब फिर शांत नहीं हो जाएगा।
बीमा कंपनियों पर कोई वास्तविक कार्रवाई नहीं होगी?
ऐसे ही क्लेम “टेक्निकल कारणों” से रोके जाते रहेंगे।
किसी भी रिजेक्ट क्लेम का सार्वजनिक ऑडिट नहीं होगा।
अब कुछ सवाल 👇
IRDAI कितने मामलों में स्वतः संज्ञान लेता है?
कितने अधिकारियों पर जवाबदेही तय होती है?
अगर लाखों शिकायतों के बाद भी सिस्टम नहीं बदलता, तो क्या यह संगठित शोषण नहीं?
पॉलिसी धारक आखिर न्याय के लिए कहाँ जाए?
जब देश का हर नागरिक आयकर, जीएसटी, सेस, पेट्रोल-डीजल टैक्स, रोड टैक्स और न जाने कितने अप्रत्यक्ष कर देता है, तो क्या बदले में उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुलभ स्वास्थ्य सेवा नहीं मिलनी चाहिए? अगर टैक्स के बाद भी इलाज और पढ़ाई के लिए अलग से लाखों रुपये खर्च करने पड़ें, तो फिर कर व्यवस्था का असली उद्देश्य क्या है?
क्यों सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा आम बात है? क्यों सरकारी स्कूलों पर भरोसा कम होता जा रहा है और मध्यम वर्ग निजी संस्थानों पर निर्भर होने को मजबूर है? क्या राज्य की जिम्मेदारी धीरे-धीरे नागरिक से निजी क्षेत्र की ओर धकेली जा रही है?
जब हेल्थ इंश्योरेंस सुरक्षा की जगह “अनिवार्य खर्च” बन जाए, क्लेम के समय असमंजस और अस्वीकृति का डर रहे, तो क्या यह व्यवस्था जनहित में है या मुनाफे के लिए? स्वास्थ्य और शिक्षा अधिकार हैं या बाजार में बिकने वाले उत्पाद?
@nikhilk2212@Lawyer_Kalpana@StarHealthIns Immediately Rethink otherwise whenever claim they deny definitely.
My claim reject no reason. I goes ombudsman after a year payment 👍
एक महिला ने स्टार हेल्थ इंश्योरेंस से पॉलिसी ली।
किडनी इन्फेक्शन हुआ , तेज बुखार में कंपकंपी छूटने लगी , हालत बिगड़ी तो अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
लेकिन जब क्लेम लगाया गया तो जवाब मिला
आप तो दवा से ठीक हो सकती थीं , एडमिट क्यों हुईं?
अब सवाल ये है कि 👇
क्या बीमा कंपनी अब डॉक्टर भी बन गई है?
क्या मरीज की हालत अस्पताल तय करेगा या इंश्योरेंस ऑफिस?
क्या ICU में जाने से पहले कंपनी से अनुमति लेनी होगी कि “सर, क्या मैं सच में बीमार हूं?”
पॉलिसी बेचते समय कहते हैं “कैशलेस, टेंशन फ्री।”
और क्लेम के समय कहते हैं “आपको तो सिर्फ गोली खानी चाहिए थी।”
तो फिर इंश्योरेंस किस बात का है?
बीमारी कवर करने का या क्लेम रिजेक्ट करने का?
हेल्थ इंश्योरेंस का 'Exclusion' स्कैम: जब कंपनियां खुद को डॉक्टर से बड़ा समझने लगें!
आज भारत में हेल्थ इंश्योरेंस के नाम पर एक सुनियोजित खेल चल रहा है। कंपनियां 'सस्ते प्रीमियम' और 'कैशलेस' के बड़े-बड़े विज्ञापनों से ग्राहकों को लुभाती हैं, लेकिन जब अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मरीज क्लेम मांगता है, तो उसे थमा दिया जाता है 'रिजेक्शन लेटर'। बहाना होता है 'Exclusions' (बाहरी शर्तें) और तर्क दिया जाता है कि "यह इलाज तो घर पर या OPD में हो सकता था, भर्ती होने की क्या जरूरत थी?"
डॉक्टर के विवेक पर कंपनी का 'कब्जा'
सबसे बड़ा विवाद तब पैदा होता है जब एक विशेषज्ञ (Specialist) डॉक्टर मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे अस्पताल में भर्ती करता है। लेकिन, बीमा कंपनी के दफ्तर में बैठा एक क्लर्क या मैनेजर, जिसने मरीज को देखा तक नहीं, वह अपनी पॉलिसी के 'Exclusions' (वर्जित शर्तों) का हवाला देकर उसे 'Non-Medical Necessity' कहकर खारिज कर देता है।
यह न केवल मरीज के साथ धोखा है, बल्कि संपूर्ण चिकित्सा पद्धति का अपमान है। क्या अब बीमा कंपनियां तय करेंगी कि डॉक्टर को मरीज का इलाज कैसे करना चाहिए?
हाई कोर्ट के आदेशों की सरेआम धज्जियां
विभिन्न माननीय हाई कोर्ट्स (जैसे सुलभा प्रकाश बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस) ने अपने ऐतिहासिक फैसलों में बार-बार कहा है कि: "बीमा कंपनी के पास कोई मेडिकल विशेषज्ञता नहीं है कि वह डॉक्टर के विवेक को चुनौती दे सके। यदि डॉक्टर ने भर्ती करने का फैसला लिया है, तो वही अंतिम सत्य है।"
दुर्भाग्य की बात यह है कि बीमा कंपनियां इन अदालती आदेशों को रद्दी की टोकरी में डाल देती हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि हर ग्राहक कोर्ट जाने की हिम्मत या साधन नहीं रखता।
IRDAI: 'चोरी के बाद आने वाली पुलिस'
बीमा नियामक (IRDAI) की भूमिका आज उस पुलिस जैसी हो गई है जो चोरी होने के बाद रिपोर्ट लिखने आती है, लेकिन चोरी रोकने के लिए गश्त नहीं लगाती। IRDAI के पास शिकायत (Bima Bharosa) करने पर समाधान तो मिलता है, लेकिन वह कंपनियों पर ऐसा भारी जुर्माना नहीं लगा पा रही जिससे उनकी यह मनमानी हमेशा के लिए बंद हो जाए।
बड़े नाम, खोखले दावे:
बाजार में Star Health और Care Health जैसी कंपनियों का बड़ा नाम है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि क्लेम रिजेक्शन की सबसे ज्यादा गूंज इन्हीं के खिलाफ सुनाई देती है। कंपनियां 'कॉन्ट्रैक्ट' की भाषा को इतना उलझा देती हैं कि आम आदमी को समझ ही न आए कि उसने बीमा लिया है या खुद के लिए नई मुसीबत खरीदी है।
#Note: ऊपर में 2 कंपनी का नाम इसलिए लिखा है क्योंकि इरडा के लिस्ट में ये उपर हैं, इसका कतई ये मतलब नहीं है कि बाकी कंपनिया दूध की धुली है। सभी इस नियम के आड़ में मनमानी कर रही हैं, बस तुलना इतनी है की “मेरा दाग तेरे दाग से हल्के हैं”😊
मेरी मांगें और सुझाव (IRDAI के लिए):
Section/Exclusion की मनमानी खत्म हो:
पॉलिसी में छिपे हुए उन क्लॉज को हटाया जाए जो कंपनी को डॉक्टर के निर्णय को ओवररूल (Overrule) करने की ताकत देते हैं।
'Preventive' रेगुलेशन:
चोरी होने का इंतज़ार न करें। अगर कोई कंपनी बार-बार 'OPD Basis' कहकर क्लेम रिजेक्ट कर रही है, तो उसके लाइसेंस पर कार्रवाई हो।
क्लेम अप्रूवल की समय सीमा:
भर्ती के 1 घंटे के भीतर कंपनी को स्पष्ट करना होगा कि क्लेम मिलेगा या नहीं। डिस्चार्ज के वक्त नया बहाना बनाना 'क्रिमिनल ऑफेंस' माना जाए।
सफलता की 100% गारंटी: क्लेम न मिले तो ये 'ब्रह्मास्त्र' चलाएं
अगर आपका क्लेम 'Exclusion' या 'OPD' के नाम पर रिजेक्ट हुआ है, तो यह आपकी जीत का पक्का रास्ता है:
Rebuttal Letter (विरोध पत्र):
सबसे पहले कंपनी को एक सख्त ईमेल लिखें। उसमें डॉक्टर का 'Justification' लगाएं कि अस्पताल की मशीनरी और स्टाफ के बिना इलाज संभव नहीं था।
Legal Precedents:
अपने पत्र में हाई कोर्ट के फैसलों का जिक्र करें। कंपनियों को पता चलना चाहिए कि ग्राहक अपने अधिकारों के प्रति सजग है।
बीमा लोकपाल (Ombudsman) -
सबसे बड़ा हथियार: लोकपाल कंपनियों की इन 'बनावटी' शर्तों को नहीं मानता। यहाँ 90% से ज्यादा फैसले ग्राहकों के पक्ष में होते हैं क्योंकि लोकपाल भी 'मेडिकल जरूरत' को 'कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों' से ऊपर रखता है।
सोशल मीडिया का दबाव:
Threads, X (Twitter) पर कंपनियों और IRDAI को टैग करें। जब बात पब्लिक होती है, तो कंपनियां तुरंत सेटलमेंट के लिए फोन करती हैं।
बीमा कंपनियों ने इसे व्यापार बना लिया है, जबकि यह एक सेवा है। जब तक आप चुप रहेंगे, आपकी मेहनत की कमाई लूटी जाएगी।
जागरूक बनिए, सवाल पूछिए और अपने हक के लिए लड़िए क्योंकि आपकी चुप्पी ही इन कंपनियों की ताकत है।
धन्यवाद
Bablu Kummar Singh, CFP®
@Khurpenchhealth@NivaBupaSupport After A above month no reply only raise unnecessary documents demand.. @Khurpenchhealth ji Aap ko evidence de raha hu .. bas Aap Aam logo k questions uthate rahena.