सभी ध्यान दें । केदार कड़वी (कुटकी जड) नामक औषधीय जड़ी बूटी वाले जल का सेवन रोजाना करें । एक महीने में सुगर नार्मल । ऑनलाइन भी उपलब्ध है । कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं अंग्रेज़ी दवा की तरह ।
Diabetes is not permanent.
Diabetes is reversible.
02/3/2025 HbA1c 6.4%
18/8/2025 HbA1c 5%
Without Medication.
With just Diet And lifestyle.
I Will post detailed journey tomorrow.#Diabetes
कुछ समय पहले, यह ज्ञात हुआ कि कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, श्री मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके साथ अन्य वरिष्ठ नेता, जैसे कि श्री राहुल गांधी, श्रीमती प्रियंका गांधी इत्यादि अकस्मात ही अकबर रोड़ के समीप एक स्थान पर अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठ गयेहैं। सरकार ने इस वरिष्ठ दल की गरिमा के दृष्टिगत, मुझे स्वंय और मेरे साथ केंद्रीय गृह सचिव, श्री गोविंद मोहन को इन वरिष्ठ नेताओं से वार्ता करने हेतु मौके पर भेजा। श्री राहुल गांधी से अनुरोध किया गया कि वे अपना धरना समाप्त करें, क्योंकि यह स्थल धरने का स्थल नहीं है, और यहां पर धरना करने से जनसाधारण को काफी असुविधा भी पहुंच रही है। श्री राहुल गांधी जी ने यह मांग रखी कि यदि सरकार संसद में NEET और उससे संबंधित आंदोलन के साथ जुड़े सभी विषयों पर चर्चा करने के लिए मान जाती है, तो वह अपना धरना तुरंत समाप्त कर देगें। कुछ ही क्षणों में सरकार के शीर्ष नेत्रत्व की अनुमति लेने के बाद, श्री राहुल गांधी को यह आश्वसान दिया गया कि उनकी मांग को मान लिया गया है, तथा सरकार NEET और उससे संबंधित आंदोलन के साथ जुड़े सभी विषयों पर संसद में चर्चा करने को तैयार है।
श्री राहुल गांधी जी को जब यह सूचना पहुंचाई गई तो उन्होंने कहा कि वह इतने पर ही नहीं मानेंगे अपितु उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का भी आश्वसान चाहा। उन्होंने कहा कि अब मेरी दो मांगे हैं: संसद में चर्चा एवं केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा। जब उनको याद दिलाया गया कि पहले उन्होने केवल चर्चा की ही मांग की थी, तब उन्होंने कहा कि अब मेरी मांगें बदल गयी हैं। जब उनकों विनम्रता से ये समझाने का प्रयास किया गया कि उनके जैसे वरिष्ठ नेता को इतनी जल्दी अपनी बात से मुकर जाना शोभा नहीं देता, तो उन्होंने कहा कि यह उनकी मर्जी है। जब गृह सचिव ने यह समझाने का प्रयास किया कि यह स्थल धरने के लिए अनुकूल नही हैं तो उनका उत्तर था कि ये भी उनकी मर्जी है वे जहां बैठें।
श्री राहुल गांधी जैसे वरिष्ठ नेता एवं नेता प्रतिपक्ष काअपनी बात से मुकर जाना दुर्भाग्यपूर्ण है और लोकंतंत्र की हर मर्यादा के विपरीत है। सरकार NEET और उससे संबंधित आंदोलन के साथ जुड़े सभी विषयों पर संसद में चर्चा करने के लिए तैयार है। इसके विपरीत, कांग्रेस पार्टी ने आज तक इस गंभीर विषय पर नियमानुसार औपचारिक चर्चा करने का कोई नोटिस नहीं दिया है। श्री राहुल गांधी का व्यवहार लोकतंत्र के ऊसूलों से मेल नहीं खाता है।
भारतीय दर्शन ईसाई और इस्लामिक अर्थात अब्राहमिक परंपराओं से श्रेष्ठ कैसे हैं? मनुष्य और प्रकृति के संबंधों की तीनों की अलग मान्यताएं देखें।
- अथर्ववेद 12.1.12
"पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।"
ऋग्वेद 10.75 (नदी सूक्त)
"हे गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री, परुष्णी आदि नदियो, मेरी प्रार्थना सुनो।"
- बाइबिल
उत्पत्ति (Genesis) 1:26–28
"तब परमेश्वर ने कहा, “अब हम मनुष्य बनाएं। हम मनुष्य को अपने स्वरूप जैसा बनाएगे। मनुष्य हमारी तरह होगा। वह समुद्र की सारी मछलियों पर और आकाश के पक्षियों पर राज करेगा।"
- कुरान
सूरह अल-बकरह 2:29
"वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हारे लिये जमीन की सारी चीजें पैदा की"
सूरह अल-जासिया 45:13
"अल्लाह ने आकाश और पृथ्वी की सभी चीज़ों को मनुष्य के लाभ के लिए अपने नियम के अधीन कर दिया है।"
- बाइबिल
उत्पत्ति (Genesis) 9:2–3
"पृथ्वी के सब पशुओं और आकाश के सब पक्षियों में तुम्हारा भय और आतंक रहेगा... वे सब तुम्हारे हाथ में सौंपे गए हैं।"
"हर चलने-फिरने वाला जीव तुम्हारा भोजन होगा।"
- दिलीप मंडल
पश्चिमी दुनिया में यह विचार प्रभावशाली रहा कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी है और प्रकृति उसके उपयोग के लिए बनाई गई है। इस सोच ने आधुनिक औद्योगिक विकास को गति दी, लेकिन इसी ने संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को भी वैचारिक आधार दिया।
जंगल लकड़ी के स्रोत बन गए, नदियाँ जल संसाधन और पहाड़ खनिज भंडार। इस दृष्टि के सूत्र बाइबिल की उस व्याख्या में मिलती हैं, जो मनुष्य को सृष्टि पर विशेष अधिकार देती है।
इसलिए जब पश्चिमी ईसाई देश औद्योगिकीकरण की शुरुआती सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे, तब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का प्रश्न नहीं उठा।
इस्लाम समेत अन्य अब्राहमिक परंपराओं में भी मनुष्य को सृष्टि में विशेष स्थान प्राप्त है। इसलिए वहाँ भी प्रकृति के उपयोग को लेकर वैसी दार्शनिक दुविधा नहीं दिखाई देती, जैसी भारतीय परंपराओं में मिलती है।
भारतीय परंपरा प्रकृति को निर्जीव वस्तु नहीं मानती। यहाँ नदियाँ माता हैं, दिशाएं, अग्नि, वायु, समुद्र, पर्वत सब पूजनीय हैं, वृक्षों का धार्मिक महत्व है और जीव-जंतु-पेड़-घास सब सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं। भारतीय चिंतन मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक अंग मानता है।
ऋग्वेद का मूल स्वर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और सह-अस्तित्व का है। भारतीय परंपरा में प्रकृति पर विजय का नहीं, उसके साथ सामंजस्य का आदर्श मिलता है।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता से लेकर आज तक भारत ने नगर बसाए, समुद्री व्यापार किया, कृषि का विस्तार किया और बड़े निर्माण कार्य किए। भारतीय समाज ने प्रकृति का सम्मान भी किया और उसका उपयोग भी।
एक वामपंथी कवि की पंक्ति है कि ‘बीच का रास्ता नहीं होता।’ जबकि भारतीय सभ्यता और संस्कृति हमेशा मध्यमार्गी रही है।
बौद्ध धम्म का मध्यम मार्ग भारत का दार्शनिक लैंप पोस्ट है। न प्रकृति सबसे ऊपर है, न मनुष्य। न विकास हर कीमत पर उचित है, न उसका पूर्ण निषेध। प्रश्न यह है कि अधिकतम लोककल्याण कैसे हो और नुकसान को न्यूनतम कैसे रखा जाए।
यदि कोई परियोजना करोड़ों लोगों के हित में है, तो उसे केवल पर्यावरणीय प्रभावों के आधार पर नहीं रोका जाना चाहिए। साथ ही, पर्यावरण को बचाना भी आवश्यक है।
द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवा शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः
सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
बहस इस बात पर हो रही है, #आजम_खान के बनाए विश्वविद्यालय के 40 में से 38 भवन क्यों तोड़े जा रहे हैं? अच्छा हो, सरकार अधिगृहित कर ले।
बहस इस बात पर नहीं हो रही है, राजनीतिक पदों पर काबिज रहे लोग कैसे अपने वक्त समाज के #संसाधनों पर कब्जा करते हैं? कैसे व्यवस्था को तोड़ा-मरोड़ा, निचोड़ा जाता है।
संशोधन #व्यक्ति का नहीं, संशोधन #व्यवस्था का होना जरूरी है।
यदि व्यवस्था का संशोधन नही हुआ तो ऐसा बार-बार होता रहेगा। और नागरिक समाज व्यक्तियों में उलझा रहेगा।
अंतिम बात, सड़क का ढाबा हो, मंदिर हो या मस्जिद, चर्च या निजी विश्वविद्यालय या फिर मजार.. जो भी गैरकानूनी तरीके से समाज, समुदाय के स्वामित्व को बेदखल कर बना, उसको ध्वस्त करना ही नागरिक समाज का पहला दायित्व है।
#सत्ता नहीं, सर्वोपरि है #समाज। समाज के हित में हम सबका हित है। कल्याण है।
@narendramodi@myogiadityanath@yadavakhilesh
संभवतः आगरा की घटना है, किसी के घर की फ्रिज के फ्रीजर में #शिवलिंग आकार में बर्फ जम गई। आसपास के लोग, विशेषकर महिलाएं पूजा-अर्चना करने लगीं। इस पर बौद्धिकों ने खासकर शहरी शिक्षित हिंदुओं ने मजाक उड़ाना आरम्भ कर दिया।
अफसोस होता है इन शिक्षितों की जड़बुद्धि पर। हिंदुत्व कोई #इस्लाम नहीं है जो #किबला यानी डायरेक्शन या दिशा हो।
हिंदुत्व #ओरिएंटेशन है। एक भदेसी हिन्दू भली-भांति जानता है, नदी, नाले, तालाब या पहाड़ को नहीं पूज रहा है, बल्कि इनके #माध्यम से परम पिता परमेश्वर तक अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहा है। ये सिर्फ माध्यम हैं।
अंतिम सत्य तो #ब्रह्म हैं। राम और कृष्ण भी ईश्वर के #मायारूप हैं।
मेरा अब मानना है, इस्लाम या इसाईत्व से हिंदुत्व के लिए बड़ा खतरा #शिक्षित_हिन्दू है।
सोनिया जी,
भारत का विकास करना, पोर्ट-एयरपोर्ट-बिजली बनाना कोई "क्रिमिनल एक्टिविटी" नहीं है!
वैसे भी अंडमान निकोबार में 94 परसेंट वन हैं। प्रोजेक्ट सिर्फ 2 परसेंट क्षेत्र में बन रहा है। हर कटे हुए 1 पेड़ के बदले 4 पेड़ लगाए जाएंगे।
आज 'दैनिक हिंदुस्तान' में मेरा आलेख
🚨 SHOCKING! RAILWAYS LAND UNDER ENCROACHMENT EQUALS 42 NARENDRA MODI STADIUMS! 🤯
1,068.54 hectares of Railway land illegally occupied as of March 2025.
This is equivalent to ~1,496 FIFA football pitches!
In last 5 years, only 98.02 hectares reclaimed.
Urgent need for massive anti-encroachment drive to protect national assets.
Thoughts? 🇮🇳
हिंदूत्व के लिए कोई #अंतिम_परिभाषा संभव नहीं। कालचक्र में सनातन को बांध पाना असंभव है। आज एक बार फिर इस सत्य का अनुभव हुआ।
आज #गया_जी में इस पड़ाव का अंतिम दिवस है। स्थानीय मित्र बृजेन्द्र चौबे के निर्देश पर #उमेश_ठाकुर जी फाल्गु नदी तट पर #विष्णुपद_मंदिर ले गए। दर्शन कराने। उमेश ठाकुर जी #नाऊ_ठाकुर समाज से हैं।
रास्ते में उन्होंने "विष्णुपद मंदिर" की कथा सुनाई। अब तक के जीवन में पहली बार आज पता चला, गया जी नगर का नाम एक #राक्षस के नाम पर पड़ा। #गयासुर_राक्षस। संभव है, इस्लाम या इसाइत्व में #शैतान के नाम किसी नगर की स्थापना?
हैरान होने का अंत यही नहीं हुआ, ऐसा नगर, जो एक हिन्दू के लिए मृत्युपरांत जीवन को #बंधनमुक्त करने की सबसे पवित्र नगरी। और नगर समर्पित है एक #राक्षस को? नामकरण हुआ #गयाजी। जैसे देवघरजी! काशी जी! प्रयागजी! अजोध्याजी!
फाल्गु नदी और निरंजनी नदी, दोनों #शापित नदी है। मां सीता के शाप को भोगती हुईं। मां का शाप है, "बहोगी जरूर पर दिखोगी नहीं।"
फाल्गु तट पर काले पत्थरों से बना "विष्णु पदचिन्ह मंदिर" इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर जी ने सन 1783 में बनवाया। शिखर पर 50 किलो सोने का कलश और गुंबद है। ये जो वामपंथी बताते है, भारत के राजाओं ने शोषण किया, कभी रानी मां अहिल्याबाई जी के जीवन कार्य का अध्ययन कर लें। एक रानी मां ही पर्याप्त हैं।
संभव है, यह सब आपको पहले से पता हो। लेकिन फिर भी कहना होगा, अपनी शक्ति को अस्त्र बनाना आपको आज भी नहीं आता।
जब कभी इस्लाम, वामपंथी या ईसाई #हिंन्दुत्व पर कटाक्ष करे, तुरन्त #तुलनात्मक हो जाएं। निसंकोच। दोनों पैर इतना फैला दें कि सामने वाले कि आस्था के दो टुकड़े हो जाएं।