1/10 Our paper is out today in Science!
During artificial hibernation, hippocampal firing rates fell by ~70% and synapse density fell by more than half—yet mice retained memories formed beforehand.
How can memory survive such extensive brain remodeling?
https://t.co/sYRsrjFWU2
@AnilAgarwal_Ved क्या बेसिक साइंस के लिए कोई रिसर्च इंस्टिट्यूट खोलने का प्लान आपका है स्पेशली नार्थ पार्ट ऑफ़ इंडिया (दिल्ली एनसीआर छोड़कर)में, क्योंकि साउथ इंडिया में हमारे पास ठीक ठाक रिसर्च इंस्टिट्यूट है। जैसे टाटा ने खोल रखा है वैसा आपका कोई प्लान है।
An incredibly packed room for our morning speakers Nathan Frey @nc_frey from Anthropic and Vivek Natarajan @vivnat from Google DeepMind at the AI Scientist Summer Workshop.
We still have lots of fantastic speakers throughout the day!
Checkout the schedule at https://t.co/smR0OUshPp
Dear Indian Academicians, candidates prepare for months, often sacrificing nights, to perform well in interviews. Yet they are asked, "Why do you want to come back to India? You're already living a great life abroad." Evaluate candidates on their research, teaching, and vision not on having to justify their decision to return and contribute.
Scientists have created the first comprehensive map of the human vagus nerve, tracing thousands of individual nerve fibers stretching from the lower brain stem to all major organs.
The map might help scientists and doctors more precisely stimulate the nerve as a potential treatment for conditions such as epilepsy, stroke, and inflammatory diseases.
Learn more: https://t.co/KsjHgaVLK6
@theliverdoc So, by your logic of citations and the h-index, you are admitting that Acharya Balkrishna from Patanjali Research Center is scientifically superior to you and is a better scientist than you.
@theliverdoc So, by your logic of citations and the h-index, you are admitting that Acharya Balkrishna from Patanjali Research Center is scientifically superior to you and is a better scientist than you.
माननीय विधायक जी, लगभग 4.7 लाख आबादी वाले रामपुर कारखाना विधानसभा क्षेत्र में आज तक नियमित स्नातक एवं स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए एक भी सरकारी डिग्री कॉलेज नहीं है। उच्च शिक्षा प्रत्येक छात्र का मूल अधिकार है। कृपया क्षेत्र के लाखों युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक राजकीय महाविद्यालय की स्थापना कराने की कृपा करें।
@mlasurendra@BJP4India@BJP4UP After verifying AISHE, UGC, the UP Higher Education Department, and affiliated college records, Rampur Karkhana Vidhan Sabha has no Government Degree College offering regular UG/PG education.
माननीय विधायक जी, लगभग 4.7 लाख आबादी वाले रामपुर कारखाना विधानसभा क्षेत्र में आज तक नियमित स्नातक एवं स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए एक भी सरकारी डिग्री कॉलेज नहीं है। उच्च शिक्षा प्रत्येक छात्र का मूल अधिकार है। कृपया क्षेत्र के लाखों युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक राजकीय महाविद्यालय की स्थापना कराने की कृपा करें।
यूजीसी को अगर समय रहते गंभीरता से लिया होता, तो शायद आज यह स्थिति नहीं होती।
लेकिन तथाकथित "सेल्फ-प्रोक्लेम्ड राइट विंग" की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति से ग्रस्त दिखाई देते हैं, जिसे Rejection Dependence या Severe Approval-Seeking Schema कहा जाता है। हर किसी की स्वीकृति पाने की यह प्रवृत्ति अंततः वैचारिक स्पष्टता को कमजोर कर देती है।
यह सोच कि सामान्य वर्ग, राष्ट्रवादी और थोड़ा-बहुत दक्षिणपंथी विचार रखने वाले लोग किसी के बंधुआ समर्थक और मानसिक ग़ुलाम हैं, अंततः नुकसान ही पहुंचाएगी।
वामपंथी और दक्षिणपंथी झुकाव वाले सामान्य बुद्धिजीवियों में मूलभूत अंतर होता है। वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग प्रायः अपने एजेंडे और संगठन के प्रति अधिक लॉयल रहते हैं, और उनकी पार्टियां भी उनके साथ उसी प्रकार खड़ी दिखाई देती हैं।
वहीं, दक्षिणपंथी या मध्यमार्गी विचार रखने वाला सामान्य बुद्धिजीवी प्रायः किसी व्यक्ति या दल का अंध-समर्थक नहीं होता। उसकी निष्ठा अपने स्वतंत्र विचारों, सिद्धांतों और मुद्दों के प्रति होती है, न कि किसी की मानसिक गुलामी के प्रति। वह सवाल भी करता है, असहमति भी जताता है और समर्थन भी उसी आधार पर देता है।
यही अंतर समझने में जितनी देर होगी, उतनी ही वैचारिक और राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
यूजीसी को अगर समय रहते गंभीरता से लिया होता, तो शायद आज यह स्थिति नहीं होती।
लेकिन तथाकथित "सेल्फ-प्रोक्लेम्ड राइट विंग" की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति से ग्रस्त दिखाई देते हैं, जिसे Rejection Dependence या Severe Approval-Seeking Schema कहा जाता है। हर किसी की स्वीकृति पाने की यह प्रवृत्ति अंततः वैचारिक स्पष्टता को कमजोर कर देती है।
यह सोच कि सामान्य वर्ग, राष्ट्रवादी और थोड़ा-बहुत दक्षिणपंथी विचार रखने वाले लोग किसी के बंधुआ समर्थक और मानसिक ग़ुलाम हैं, अंततः नुकसान ही पहुंचाएगी।
वामपंथी और दक्षिणपंथी झुकाव वाले सामान्य बुद्धिजीवियों में मूलभूत अंतर होता है। वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग प्रायः अपने एजेंडे और संगठन के प्रति अधिक लॉयल रहते हैं, और उनकी पार्टियां भी उनके साथ उसी प्रकार खड़ी दिखाई देती हैं।
वहीं, दक्षिणपंथी या मध्यमार्गी विचार रखने वाला सामान्य बुद्धिजीवी प्रायः किसी व्यक्ति या दल का अंध-समर्थक नहीं होता। उसकी निष्ठा अपने स्वतंत्र विचारों, सिद्धांतों और मुद्दों के प्रति होती है, न कि किसी की मानसिक गुलामी के प्रति। वह सवाल भी करता है, असहमति भी जताता है और समर्थन भी उसी आधार पर देता है।
यही अंतर समझने में जितनी देर होगी, उतनी ही वैचारिक और राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
यूजीसी को अगर समय रहते गंभीरता से लिया होता, तो शायद आज यह स्थिति नहीं होती।
लेकिन तथाकथित "सेल्फ-प्रोक्लेम्ड राइट विंग" की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति से ग्रस्त दिखाई देते हैं, जिसे Rejection Dependence या Severe Approval-Seeking Schema कहा जाता है। हर किसी की स्वीकृति पाने की यह प्रवृत्ति अंततः वैचारिक स्पष्टता को कमजोर कर देती है।
यह सोच कि सामान्य वर्ग, राष्ट्रवादी और थोड़ा-बहुत दक्षिणपंथी विचार रखने वाले लोग किसी के बंधुआ समर्थक और मानसिक ग़ुलाम हैं, अंततः नुकसान ही पहुंचाएगी।
वामपंथी और दक्षिणपंथी झुकाव वाले सामान्य बुद्धिजीवियों में मूलभूत अंतर होता है। वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग प्रायः अपने एजेंडे और संगठन के प्रति अधिक लॉयल रहते हैं, और उनकी पार्टियां भी उनके साथ उसी प्रकार खड़ी दिखाई देती हैं।
वहीं, दक्षिणपंथी या मध्यमार्गी विचार रखने वाला सामान्य बुद्धिजीवी प्रायः किसी व्यक्ति या दल का अंध-समर्थक नहीं होता। उसकी निष्ठा अपने स्वतंत्र विचारों, सिद्धांतों और मुद्दों के प्रति होती है, न कि किसी की मानसिक गुलामी के प्रति। वह सवाल भी करता है, असहमति भी जताता है और समर्थन भी उसी आधार पर देता है।
यही अंतर समझने में जितनी देर होगी, उतनी ही वैचारिक और राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
@chetan_bhagat University academic courses me padhane se ban kiya tha, baki student apne course ke liye to use kar hi skate hai isliye sales jo tha skyrocketed ho gya tha.