इसमें कोई शक नहीं है कि आरक्षण पर चर्चा होनी चाहिए। किसी विषय-वस्तु पर चर्चा भी न होने देना उसका पैगम्बरीकरण है। भारत में किसी भी व्यक्ति या विषय का पैगंबीकरण स्वीकार्य नहीं हो सकता।
जो लोग आरक्षण हटाने की माँग लेकर जंतर-मंतर पर जुटे हैं, उन्हें सुनिए। सुनने का साहस होना चाहिए। उन्हें ख़ारिज कर देने या उनका मज़ाक़ बना देने से किसी भी प्रकार के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी, ये तो अबतक सत्ता-प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के मस्तिष्क में भी स्पष्ट हो गया होगा। अगर नहीं हुआ है, तो फिर भगवान ही मालिक है।
किसी को आरक्षण मिल रहा है तो वो उसका अधिकारी है, चलो मान लिया। लेकिन, सबसे बड़ा व गंभीर प्रश्न यह है कि जिन्हें आरक्षण नहीं मिल रहा उन्होंने कौन सी ग़लती की है? मूल भेद अमीर-ग़रीब का है। हर देश व काल में यही सबसे बड़ी भेद रहा है। राजा और रंक से बड़ा भेद कोई नहीं है। धन ही समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिलाता है। जिसके पास संपत्ति है, उसी की धाक होती है। वही समाज के झगड़ों का भी निपटारा करता है क्योंकि उसका कहा कोई नहीं टालता। अनंतकाल से, पृथ्वी के हर हिस्से में - धनवान ही समाज को नचाता है। ऐसे में जाति, मजहब या वर्ग के आधार पर आरक्षण कबतक जारी रहे, उसकी व्यवस्था कैसी रहे और ये व्यवस्था संविधान निर्माताओं की सोच से वो मेल कैसे खाए - इसपर बहस होनी चाहिए, इसकी बृहद समीक्षा होनी चाहिए, इसपर पुनर्विचार होना चाहिए।
बहस से भागने का अर्थ है कि आप लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते। गृहयुद्ध की धमकियाँ आती हैं, लेकिन अन्याय से बेहतर कुरुक्षेत्र में महाभारत का हो जाना ही होता है। धरा की लाली के बाद ही युधिष्ठिर-राज्य स्थापित हो पाया। अगर अमेरिका से आंबेडकर की तस्वीर लहराते हुए भारत-भूमि पर उतरकर कोई सनकी देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले सकता है, फिर आरक्षण पर भी बहस होनी ही चाहिए।
सरकार ने किसानों से बात की, किसान आंदोलन पर क़दम वापस खींचे। प्रधानमंत्री ने TV पर आकर तीनों कृषि क़ानून वापस लेने की घोषणा की। CJP के प्रतिनिधियों से सरकार के दो-दो शक्तिशाली मंत्रियों ने बातचीत की, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ और प्रधानमंत्री को कई बार इंस्टाग्राम पर आकर सफाई देनी पड़ी। फिर, जंतर-मंतर पर आज जुटी भीड़ अपराधी तो नहीं है कि आप उनकी नहीं सुनेंगे?
अगर आरक्षण सही है तो सबको दीजिए, ग़लत है तो किसी को नहीं। अगर 'अफ़र्मेटिव एक्शन' पर चलना ही है तो हर आरक्षित व्यक्ति के पास प्रमाण हो कि उसके साथ जातिगत भेदभाव हुआ है। अगर किसी ब्राह्मण के साथ कहीं जातिगत भेदभाव हो गया, तो उसे भी आरक्षित की श्रेणी में डाल दीजिए।
देश ने देख लिया है कि भीड़तंत्र अराजकता के जरिए सरकार से अपनी बात मनवा ले रहा है। अभी तक ग़ैर-आरक्षित वर्ग ने ये तरीका नहीं आज़माया है। ये उनका बड़प्पन है।
पूरा का पूरा बेसिक का सिस्टम ही अंदर से सड़ा हुआ, जहां देखो वहीं घूसखोरी चाहें ट्रांसफर हो, सीसीएल की छुट्टी हो, ऑनलाइन छुट्टी का आवेदन हो या एमडीएम हो हर जगह दिखता है तो केवल भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार,दीमक की तरह बेसिक को उच्च अधिकारियों ने अंदर ही अंदर से खा लिया है।
सीतापुर:
बीएसए/प्रधानाध्यापक प्रकरण में बीएसए और प्रधानाध्यापक के बीच वार्तालाप की ऑडियो क्लिप वायरल। मामले की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच के लिए शिक्षक संगठनों को आगे आना चाहिए।
@DrDCSHARMAUPPSS
ऑडियो क्लिप साभार:
सोशल मीडिया (फेसबुक)
His father was a Chief Minister, then his mother also became Chief Minister, and yet he failed Class 9.
He hasn’t studied beyond Class 8.
But today, he’s claiming that if any student is weak in studies, he will arrange for teachers to go to their homes and teach them. 😂😂😂
"From Classroom to Victory Podium: Celebrating Students' Triumphs in Olympiad Exams!" Kudos to 🏅 Medal winners of PM SHRI KV OF CHANDA @KvsMumbai@KVS_HQ
जो भी अगली सरकार बने, किसी भी पार्टी की बने, वह अपने पहले सौ दिन में जामिया और अलीगढ़ में मुस्लिम आरक्षण बंद करे और इन यूनिवर्सिटी में संविधान के तहत दिए जाने वाले एससी, एसटी, ओबीसी और ईब्ल्यूएस आरक्षण को लागू करे. ओबीसी, एसटी और EWS में मुसलमानों को भी हिस्सा मिल जाएगा.
या फिर इन यूनिवर्सिटी को बजट देना बंद करे. या यूनिवर्सिटी को अपने कब्जे में ले ले.
सरकार यूनिवर्सिटी स्थापित करे. सरकार पैसे दे तो नियम संविधान और सरकार का ही चलेगा.
इस बारे में मैंने बहुत पहले ही एक लेख लिखा है कि मुगलों का पूरा फोकस शादी करने, युद्ध लड़ने, शिकार करने, मुजरा सुनने और अपने घर और मकबरे बनाने पर था. ठीक इसी दौर में, 1500 से 1800 के बीच यूरोप ने विज्ञान और उद्योग की क्रांति कर ली. मुगल काल भारत का अंधकार युग है. इससे पहले हम दुनिया में बराबरी पर थे.
आपकी स्थिति में मै भी था कुछ कुछ महीनों पहले बस अपना अनुभव साझा करना चाहूंगा कि प्राइवेट जॉब से बेहतर है आप बच्चों को ट्यूशन पढ़ाएं क्योंकि उससे आपकी मानसिक शांति तो बनी रहेगी जो सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए एक अनिवार्य मापदंड है