बैंकर सिर्फ एक बैंकर नहीं होता…
वह किसी का बेटा-बेटी, माँ-बाप, भाई-बहन और जीवनसाथी भी होता है।
उसके भी बूढ़े माता-पिता हैं, उसका भी परिवार है और उनकी जिम्मेदारियाँ हैं।
लगातार बढ़ते वर्क प्रेशर और जिम्मेदारियों के बीच वह बैंक भी संभालता है और परिवार भी।
इसीलिए 5 Days Banking कोई विलासिता नहीं—Work-Life Balance की जरूरत है।
हमें यह अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपनों के लिए चाहिए।
और जब बैंक की सफलता पूरी टीम की मेहनत से बनती है,
तो PLI का लाभ चुनिंदा बड़े अधिकारियों तक ही क्यों?
मेहनत सबकी—तो सम्मान और PLI में समानता भी सबकी!
✊ 5 Days Banking हमारा हक़
⚖️ Uniform & Fair PLI हमारा हक़
#5DayWeekandFairPLI
@idesibanda@bhaveshbharti@sanjeetKumaRavi@sanjaybpi@aiboc_in@fboioa_india
आदरणीय 🙏@PMOIndia@FinMinIndia
लोकतांत्रिक सरकार का काम Employees को बाँटना नहीं, उनके साथ न्याय करना है। सरकार को अपने किए वादे निभाने चाहिए, न कि फूट डालो और राज करो की नीति अपनानी चाहिए। 5-Day Banking और PLI पर अब न्यायपूर्ण फैसला होना ही चाहिए।
#5DayWeekandFairPLI#FBOIOA
@DrLaxman_Yadav भारत की 1000 बड़ी कंपनियों के कॉरपोरेट बोर्ड में 93% तथाकथित ऊंची जाति वालों का कब्ज़ा है।
ये किस तरह से अपनी बिरादरी वालों को प्रोमोट करते होंगे ये बताने की जरूरत नहीं।
इस ओवर रिप्रेजेंटेशन की बीमारी का एक ही इलाज है। :- प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण।
प्रधानमंत्री जी, नक्सली कौन है इसकी कानूनी परिभाषा और उसके अपराध का आधार हमारे कानून में हो सकता है। लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ कौन है? इसकी सीमा कौन तय करेगा?
लेकिन अगर इसकी सीमा बढ़ते-बढ़ते सरकार की आलोचना करने वाला, आंदोलन करने वाला, पेपर लीक पर सवाल करने वाला, भ्रष्टाचार उजागर करने वाला, पत्रकार, शिक्षक या छात्र तक पहुँच जाए-
प्रधानमंत्री जी @narendramodi पहले देश को स्पष्ट बताइए- दिमागी नक्सल की परिभाषा क्या है? हिंसा भड़काने वाला और सरकार से सवाल पूछने वाला, दोनों एक कैसे हो सकते हैं?
कैसी पत्रकारिता है ये? पहली बात, झारखंड में जो छात्र आंदोलन कर रहे हैं, उनमें ज़्यादातर ग्रेजुएट हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि अगर ज़रा-सी भी बात बिगड़ी, FIR हो गई, तो सरकारी नौकरी का सपना हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। इसलिए उनका संयम उनकी समझदारी भी है और उनकी मजबूरी भी।
दूसरी बात, आप लोग बार-बार जंतर-मंतर और झारखंड की तुलना में ही क्यों उलझे हुए हैं? मान लीजिए जंतर-मंतर का आंदोलन आपको बिल्कुल पसंद नहीं था, बहुत खराब था... उससे क्या बदल जाएगा? असली सवाल तो यह है कि उसका नतीजा क्या निकला- शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा हो गया। उस आंदोलन के बाद संसद में चर्चा हुई, कानून आया, सरकार को जवाब देना पड़ा।
और अगर झारखंड का आंदोलन आपको इतना ही अच्छा लग रहा है, तो स्टूडियो में बैठकर तारीफ करने से क्या होगा? जाइए, सरकार और छात्रों के बीच संवाद कराइए। यही तो पत्रकारिता का काम है- समाधान तक पहुँचने की कोशिश करना।
भूख सिर्फ़ पेट की नहीं होती, कभी न्याय की भी होती है।
जिस दौर में अपनी ज़िंदगी जीने से ही फुर्सत न हो...
उस दौर में कुछ लोग आने वाली पीढ़ियों की ज़िंदगी संवारने के लिए अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगा दे रहे हैं।
Bank employees power India’s financial stability, inclusion, and growth—often at the cost of their own well-being. A 5-day work week is not a concession; it’s a long-pending reform. The commitment is on record. It must be implemented.
#BankersDemand5DayWeek#AIBOC@fboioa_india
Progress without people is not progress.We reject the culture of endless work. Policy makers must understand that Five days banking is not anti-work, it is pro-human. So, implement #5DayBankingNow