टीचर फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ दिनेश चन्द्र शर्मा जी द्वारा मा प्रधानमंत्री जी को ज्ञापन के माध्यम से अपील कि एनसीटीई द्वारा 23 अगस्त 2010को निर्धारित मिनिमम योग्यता के पैरा 4 को संसद में विधेयक लाकर पारित कराकर 25 लाख शिक्षको को टीईटी से राहत देने का कार्य करें।
माननीय प्रधानमंत्री जी को संसद का विशेष सत्र बुलाकर इस महत्वपूर्ण विषय पर क़ानून बनाकर देश भर के 25 लाख शिक्षकों एवं उनके परिवार को न्याय दिलाना चाहिए🙏🏻
#NoTetBeforeRteAct
जो व्यवस्था देश के किसी कर्मचारी,अधिकारी या न्यायाधीश पर लागू नहीं है वो देश के बेसिक शिक्षकों पर लागू करना देश के 25 लाख शिक्षकों एवं उनके करोड़ों परिजनों के साथ अन्याय है ।
#NoTetBeforeRteAct
जो व्यवस्था देश के किसी कर्मचारी,अधिकारी या न्यायाधीश पर लागू नहीं है वो देश के बेसिक शिक्षकों पर लागू करना देश के 25 लाख शिक्षकों एवं उनके करोड़ों परिजनों के साथ अन्याय है ।
@DrDCSHARMAUPPSS जब पूर्व में नियुक्त शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा अनिवार्य बताई जा रही है तो प्रत्येक सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी को भी पात्रता परीक्षा अनिवार्य रूप से उत्तीर्ण करने पर ही उनको पद पर बना रहना चाहिए अन्यथा उनको भी अनिवार्य सेवानिवृत्त कर देना चाहिए।
@DrDCSHARMAUPPSS बिल्कुल न्याय तो लोकतंत्र में समान रूप से मिलना चाहिये।
देश के सीमा पर जान देने वाले सैनिकों को पुरानी पेंशन नहीं मिलेगा और जज साहब लोग पुरानी पेंशन के हकदार।क्यों???
#NoTETbeforeRTEact
*IAS, IPS, IFS ,IRS,IES की exam यूपीएससी के माध्यम से भारत में आयोजित होती है। तो IMS (Indian Medical Services) के साथ-साथ IJS (Indian Judiciary Services) या IAS(J) की परीक्षा भी होनी चाहिए। जिससे सभी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ एक समान न्याय भी मिलें। और जो पूर्व से नियुक्त अधिकारीगण/ न्यायधीश इन परीक्षाओं को पास किए बिना नियुक्त हैं। उन्हें भी 2 वर्ष के भीतर इस परीक्षाओं को पास करना चाहिए। अन्यथा उन्हें भी शिक्षकों की भाँति अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जाएगी क्या?
@narendramodi@AmitShah@rajnathsingh@dpradhanbjp@myogiadityanath@RahulGandhi@yadavakhilesh@priyankagandhi@Aamitabh2@bstvlive
बिना किसी परीक्षा के मा सुप्रीम कोर्ट में 5 नये जज नियुक्त कर दिए गए हैं ।
Law के क्षेत्र में प्रोफेशनल डिग्री LLB लेकर वकील बनते हैं ।इसी प्रकार स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में प्रोफेशनल डिग्री बी एड या बीटीसी लेकर शिक्षक बनते हैं ।
simple एलएलबी की डिग्री लेकर बने अधिवक्ता बिना किसी परीक्षा के केवल अनुभव के आधार पर हाईकोर्ट के माननीय जस्टिस ,फिर चीफ जस्टिस ,सुप्रीम कोर्ट के मा जस्टिस और फिर सुप्रीम कोर्ट के chief justice तक बन सकते हैं।
लेकिन बी एड या बीटीसी की डिग्री या डिप्लोमा लेकर बने शिक्षक को नियुक्ति के 25-30 वर्षों बाद प्रमोशन तो दूर नौकरी में बने रहने के लिए भी नई परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी और सफल न होने पर नौकरी से निकाल दिये जाएँगे ।क्या यह न्याय है?
हम माननीय प्रधानमन्त्री जी से अनुरोध करेंगे कि देश के 25 लाख शिक्षकों के साथ हो रहे इस अन्याय का संज्ञान लें और एनसीटीई द्वारा 23 August 2010 में निर्धारित योग्यता को आरटीई में सम्मिलित करने की कृपा करें ।🙏
@narendramodi@AmitShah@rajnathsingh@RahulGandhi@dpradhanbjp@myogiadityanath
"बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी "
देश की न्याय व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था, दोनों ही संविधान की भावना को मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। दोनों क्षेत्रों में प्रवेश के लिए प्रोफेशनल योग्यता आवश्यक है—विधि के क्षेत्र में एलएलबी और शिक्षा के क्षेत्र में बी.एड./बीटीसी जैसी मान्यता प्राप्त शिक्षक प्रशिक्षण योग्यताएँ।
वर्ष 2010 में (एनसीटीई) ने शिक्षक बनने हेतु आवश्यक न्यूनतम योग्यताएँ निर्धारित की थीं। इन्हीं योग्यताओं के आधार पर देश के लाखों अभ्यर्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया, चयन प्रक्रियाओं में भाग लिया और विद्यालयों में नियुक्त होकर वर्षों तक विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण का दायित्व निभाया।
आज स्थिति यह है कि अनेक शिक्षक, जिन्होंने 20 से 30 वर्ष तक सेवा दी है, स्वयं को पुनः योग्यता सिद्ध करने की चुनौती के सामने खड़ा पा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि गुणवत्ता और उत्कृष्टता आवश्यक हैं या नहीं—निस्संदेह हैं। प्रश्न यह है कि जिन लोगों ने उस समय लागू नियमों और निर्धारित योग्यताओं के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की, क्या दशकों बाद उनके पूरे सेवाकाल को नई कसौटी पर परखा जाना न्यायोचित माना जा सकता है?
यदि किसी व्यक्ति की नियुक्ति उस समय की वैध एवं निर्धारित योग्यता के आधार पर हुई थी, यदि उसने वर्षों तक सफलतापूर्वक अध्यापन कार्य किया है, यदि उसके विद्यार्थियों की उपलब्धियाँ उसकी क्षमता का प्रमाण हैं, तो उसके अनुभव, सेवा और योगदान का मूल्यांकन भी उतनी ही गंभीरता से होना चाहिए।
हम न्यायपालिका का पूर्ण सम्मान करते हैं और न्यायिक निर्णयों की मर्यादा को स्वीकार करते हैं। साथ ही, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि सरकार उन परिस्थितियों पर संवेदनशीलता से विचार करे जिनसे लाखों परिवार प्रभावित हो रहे हों।
अतः माननीय प्रधानमंत्री जी से विनम्र अनुरोध है कि देश के लगभग 25 लाख शिक्षकों की इस चिंता का संज्ञान लें तथा 23 अगस्त 2010 को एनसीटीई द्वारा निर्धारित शिक्षक योग्यताओं को आरटीई के प्रावधानों के साथ समुचित रूप से समाहित करने हेतु आवश्यक पहल करें, जिससे वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के सम्मान, विश्वास और सेवा सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते, वे पीढ़ियाँ गढ़ते हैं। राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान और अनुभव का सम्मान होना चाहिए।