कविता है मगर
ग़ज़ल कहती है
सागर बहता है सीने में
नदी बन कर मगर वो बहती है
हर मोड़ पे एक नई रौशनी
हर लहर में एक नई आहट रहती है
ख़्वाब और ख़याल
साथ-साथ महकते हैं
जब वो डूबकर
ख़यालों में कोई नया ख़्वाब बुनती है
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जज़्बात भी पिघलते हैं
वक़्त की कड़ी धूप में
जब वो लफ़्ज़ों का लिबास ओढ़कर
धीरे से काग़ज़ पर उतरती है
क्या ख़ुशी क्या ग़म
क्या हक़ीक़त क्या फ़साना
क्या रंज-ओ-ग़म-ए-मोहब्बत
क्या रंज-ओ-ग़म-ए-ज़माना
हर एहसास की सूरत सँवरती है
तस्वीर हर शेर में मुकम्मल उतरती है
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मीर जी दो अलग जगह दो अलग तरह से:
होगा किसू दीवार के साये में पड़ा 'मीर'
क्या काम महब्बत से उस आराम तलब को
-दीवान ए मीर (by अली सरदार जाफ़री)
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होगा किसू दीवार के साए में पड़ा 'मीर'
क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को
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वो ज़ेर-ए-आब कहाँ था जो सतह-ए-आब पे था
मेरा यक़ीन तो जैसे किसी हबाब पे था
नज़र को खूब ख़बर थी कि इक सराब है वो
मगर नज़र को भरोसा इसी सराब पे था
उतारा दिल के वरक़ पे तो कितना पछताया
वो इंतिसाब जो पहले बस इक किताब पे था
इंतिसाब = समर्पण / Dedication
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ऐसे तब्दीली-ए-हालात नहीं हो सकती,
यूँ बैठे-बैठे ये करामात नहीं हो सकती।
दिल में ग़ैरत जो सलामत है तो फिर दामन में
ख़ाक हो सकती है, ख़ैरात नहीं हो सकती।
हाल दिल का न सुनाना किसी बेहिस को कभी,
संग में नरमी-ए-जज़्बात नहीं हो सकती।
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मौत अपना पता नहीं देती
सुकूँ कोई फ़ज़ा नहीं देती
ज़ख़्म खा कर भी मुस्कुराता हूँ
ज़िन्दगी कुछ सिवा नहीं देती
हर नज़र में है तीरगी का सफ़र
चाँदनी भी *जिया नहीं देती
(*चमक)
कहती है बेवफ़ा मुझे लेकिन
जाने क्यूँ बद-दुआ नहीं देती
#अमित_सिंह@__amitsingh
अपनी औलाद के हक़ में जो दुआ माँ कर दे,
उससे बेहतर कोई सौग़ात नहीं हो सकती।
मेहर-ए-उम्मीद है रोशन यहाँ जब तक, ऐ दिल,
तेरी दुनिया में कभी रात नहीं हो सकती।
रब जो चाहे तो हर एक बात है मुमकिन, यारो,
और न चाहे तो कोई बात नहीं हो सकती।
-बशर @basharsays
चाहिए नक़्द-ए-अमल ख़ातिर-ए-मिहमान के लिए,
सिर्फ़ बातों से मुदारात नहीं हो सकती।
ये दिया फ़ैसला मुंसिफ़ ने बहुत वक़्त के बाद,
हम से तस्दीक़-ए-बयानाात नहीं हो सकती।
जान से आन जिन्हें अपनी ज़ियादा हो अज़ीज़,
उन जियालों को कभी मात नहीं हो सकती।
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