Teachers from Aspirational districts in UP schools are working since 2014-15without opportunity of getting transfer. Family life is disturbed of most of the teachers. Old parents without care and teachers serving 500-600 kms away from home. Requesting for a chance…
दिल्ली की BJP सरकार के एक मंत्री वीडियो में एक नौजवान को थप्पड़ मारते दिख रहे हैं।
उसका गुनाह? वो वीडियो बना रहा था।
मंत्री के सामने सड़क खोदकर दिखाई जा रही थी, और उसके हाथ में कैमरा था।
ये उस सत्ता का चेहरा है जिसे अब वोटर से डर लगना बंद हो गया है।
सड़क पर सवाल पूछो - थप्पड़।
पेपर लीक पर सवाल पूछो - लाठी।
संसद में सवाल पूछो - माइक बंद।
ये लोग ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि इन्हें अब ये डर ही नहीं कि चुनाव इन्हें हटा सकता है। वोट चोरी यही ख़रीदती है - सिर्फ़ नतीजा नहीं, उसके बाद आने वाला अहंकार भी।
जो सरकार जीत को पक्का मान लेती है, उसे आपकी रज़ामंदी नहीं चाहिए - आपकी ख़ामोशी और अंधभक्ति चाहिए।
On Tuesday, the Election Commission said all was well:
The 14 objections by two of its three members were "suggestions," every decision was "unanimous."
With in 48 hours, on Saturday, it issued NINE decisions. Read them against the 14 notes. It's a U-TURN, not in what it says, but in what it does.
And it still leaves some hard Qs unanswered.
Stay with me.
(1/10) 🧵
सेवा में
जिलाधिकारी महोदय
कल से लगातार हो रही बारिस,बारिस के कारण विद्यालय परिसर में जलभराव और कल तक वारिस होने की मौसम विभाग की चेतावनी को देखते हुए छात्र व शिक्षक की सुरक्षा के दृष्टिगत कल दिनांक 26सितम्बर का अवकाश घोषित करने का कष्ट करें@DMBahraich@BahraichBsa@BAHRAICH_BSA
The vote is the foundation of Indian democracy.
From the vote flows the power of our Constitution, the authority of our laws, and the legitimacy of our public institutions - this chain defines modern India.
Today this chain is broken, and this has never happened in India before. By destroying the vote, this government and the Election Commission have attacked the expression of every single Indian.
Everything this government has done on the strength of stolen votes is illegal. An MP elected through vote chori holds an illegitimate seat, and every law passed with that MP's support is an illegitimate law.
@myogiadityanath Teachers from Aspirational districts are waiting for their transfer since 2015. They are working away from home and loved ones. They are working tirelessly and now they are mentally under pressure. Please look into this matter urgently.
@basicshiksha_up
सोचिए, ऐसा क्या गुनाह किया था इन बच्चों ने कि इन्हें गोली मार दी गई?
इन्होंने सरकार से सिर्फ़ तीन चीज़ें माँगी थीं - शिक्षा, रोज़गार, और जवाबदेही।
एक छात्र के पैर की हड्डी AK 47 की गोली से टूट गई। सेना में जाकर देश की सेवा करने का उसका सपना भी उसी के साथ चला गया। दो और छात्रों के कंधों को गोली चीरती हुई निकल गई।
ये अपराधी नहीं थे। ये ग़रीब घरों के वो बच्चे थे जो अपने परिवार के सपने लेकर पढ़ने निकले थे - किसी को अच्छी नौकरी चाहिए थी, किसी को अपने घर के हालात बदलने थे।
गोली के घाव भर जाएंगे - पर जो डर इन बच्चों के भीतर बैठ गया है, उसका इलाज किस अस्पताल में होता है?
प्रधानमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी - इनकी टूटी हड्डी तो जुड़ जाएगी। क्या इनका टूटा हुआ सपना आप लौटा सकते हैं?
प्रकाश झा की मूवी आयी थी- “अपहरण”
एक गाँधीवादी फ्रीडम फाइटर का बेटा अपराधी बन जाता है। सबसे बड़ा गैंग्स्टर, मगर अब कानून पीछे है। संरक्षक हाथ खींच चुके हैं। मौत सर पर है।
औऱ सदा कठोर दिखने वाला पिता,
आज बरसो बाद, बेटे से मिलने आता है।
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-बाबूजी, आप ?
-हाँ बेटा, तुम्हारी याद आ रही थी
-बेटा विव्हल हो जाता है- कितना देर कर दिये बाबूजी.. आप पहले कभी..??
-गलती हो गयी न बेटा, उसी की तो सजा भुगत रहे हैं।
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अहंकार के बांध टूट चुके हैं।
दोनों की आँखों से शुद्ध प्रेम का झरना बह रहा है।
अब बेटा बाप का हाथ पकड़ लेता है- "मगर हम का करें बाबूजी??कौन सा सजा भुगत लें, कि सारा किया मिट जाये हमारा?? साफ हो जाये जिन्दगी का सलेट बाबूजी??
आंसू पोंछता है- एक बार हमको अहसास दिया होता .. तो इतना दूर थोड़ी न आते हम ..”
बैठकर जार जार रोने लगता है- हम का करें??
हम का करेंsss ???
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ऊत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, कभी राजनैतिक चेतना और नेतृत्व का गढ़ थे। क्रांति और प्रतिरोध की भूमि के युवा, जिस दौर में दाउद और छोटा राजन के गैंग के गुर्गे बन रहे थे। जब श्रीप्रकाश शुक्ला, मुन्ना बजरंगी अपने सुनहरे दौर में थे..
उस दौर को दिखाती इस फिल्म का ये सीन रुला देता है। लेकिन युवाओ के भटकाव का दौर, अब भी खत्म नही हुआ है।
अपहरण बंद नही हुआ है।
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दरअसल हिंदी पट्टी के युवा के भविष्य का अपहरण हो चुका है। भटके, गरीब, कुंठित, बेरोजगार, और वर्थलेस होने की हीनता से ग्रस्त लोगो ने धर्म और देश की पताका थाम रखी है।
तमाम बेवकूफियो को सडको पर फैलाते हैं।थोकबन्द वोट करते हैं। वे देश को बचाने निकले हैं - पाकिस्तान से, मुसलमान से, जेहनी नक्सल से। सत्ता का संरक्षण, इन्हें ताकत का नशीला अहसास दे रहा है।
इस नशे मे, उसने देश का अपहरण कर लिया है।
"मूढ़ता से सत्ता,और सत्ता से मूढ़ता"- के प्रयोग की लेबोरेट्री मे, चूहा बन चुके हिंदी पट्टी के अधिकांश युवा, हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत की जड़े कुतर रहे हैं।
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ये भयभीत रहने और नफरत करने के इतने ट्रेंड हो गये हैं, कि प्रतिक्रिया के अग्रिम हमले के लिए सदा उतारू रहते हैं। वे मध्ययुग के कबायली लड़ाको की तरह, नींद में भी हथियार तानकर सोते हैं।
नशा और एड्रीनेलिन फटने पर सिवाय विनाश और पछतावे के, इन्हें कुछ नही मिलेगा। मगर अपहृत हिंदुस्तान भी इनके साथ बर्बाद होगा।
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रोकने वाला कौन है?
समाज, पुलिस, सरकार ..?
नही सम्भव नही है। संसद में बहुमत का आधा इन अभिशप्त राज्यों से आता है। यह नशा उन्हें मुफीद है। औऱ फिर जिन्हें उनके बापों ने नहीं रोका...
जिनकी माताओं ने धर्म और जात का सैनिक बनने को प्रोत्साहित किया। माथे पर तिलक लगाकर, कुर्बानी का जोश दिया, तो किसी और की जिम्मेदारी क्यों मानी जाये??
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“गलती हो गयी न बेटा, उसी की तो सजा भुगत रहे हैं “
बाबूजी जार जार रोते बेटे के आंसू पोंछते है “ कोई बात नहीं बेटा, तू जैसा भी है , मेरा है। और सुन.. पश्चाताप मत कर, हो सके तो प्रायश्चित कर"।
बेटा बात गांठ बांध लेता है.
जाकर अपने पोलिटिकल बॉस को मार देता है।
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पुलिस बेटे को गोली मार देती है।
बाप की पहनाई शाल, उड़कर बेटे पर गिरती है,
कफ़न हो जाती है।
अंतिम सीन में बाप मुर्दाघर में दस्तखत करता है। बेटे की लाश की रिलीज लेनी है। वो लाश के माथे पर हाथ फेरता है। रोता नही, मगर उसकी शक्ल देखकर मै रो पड़ता हूँ.
अगले फ्रेम में जलती हुई चिता है ..
और अकेला बाप
फिल्म खत्म होती है।
🙏