श्री सुभाष चंद्रा जी,
कल आपका इमोशनल बयान देखा! आपके अपने चैनल पर जिसके आप मालिक हैं! सुना,आप कितने दुखी हैं की किस तरह एक चैनल ने आपके बारे रिपोर्ट कर दी जिससे आप आहत हो गए हैं! आपके रेपुटेशन पर हमला हो गया है!
आपकी बात सही है! किसी भी मीडिया को किसी भी व्यक्ति के खिलाफ दायरे पार कर हमला नहीं करना चाहिए! मर्यादा नहीं लांघना चाहिए!
चूँकि आप इन सालों में अपने लोन के "सेटलमेंट" में लगे थे तो बस आपको एक जानकारी दे दूँ की जिस चैनल पर आप बैठकर यह बात कह रहे थे उसी चैनल पर इन सालों में विपक्ष और हर वह आवाज जिसने किसी मुद्दों पर लोकतान्त्रिक रूप से असहमति की आवाज उठाई,उसे किस तरह बदनाम किया गया! उनपर हमला किया गया वह एक मीडिया का काला अध्याय बन गया है! कई रिपोर्ट को लेकर कोर्ट तक को कहना परा की अपने हर सीमा पार कर दी! अगर आप कहेंगे तो इसकी पूरी लिस्ट भेज सकता हूँ सर!
आपने रिपोर्टिंग से आहत होकर मुकेश अम्बानी को चिठ्टी तो लिख दी,लेकिन अगर आपके चैनल से आहत हुए लोग आपको चिट्ठी लिखने लगे तो इतना कबाड़ आपके पास जमा हो जाएगा की उसे बेचकर आप करोड़ो कमा सकते हैं!
आपके साथ जो दूसरे चैनल पर हुआ आपके हिसाब से उसे साइंस की भाषा में इसे "लॉ ऑफ़ एवरेज" कहते हैं! जीवन दर्शन की भाषा में कर्मा!
खैर अब जबकि आपको एकतरफा-टारगेट करने वाली रिपोर्ट से किस तरह किसी को आहत किया जाता है,इसका अहसास हो गया है,उम्मीद करते हैं की अब कम से कम आगे से आपका चैनल एक आदर्श कायम करेगा!
बीती ताहि बिसार दे!
अब आगे से अपने चैनल को एक आदर्श चैनल के रूप में स्थापित करने की कोशिश कीजिये सुभाष जी!
एक आम नागरिक
सोनिया गांधी की आत्मकथा के विवाद में मेरे हिसाब से चूक सोनिया गांधी और उनके टीम की तरफ से हुई है। प्रकाशक चुनने में। क्योंकि पेंगुइन इंडिया की हिंदी इकाई पेंगुइन स्वदेश ही इस पुस्तक की प्रकाशक है।
मुझे याद है कि एक या दो साल पहले इस प्रकाशन ने गांधी की जयंती पर एक ऑनलाइन आयोजन किया और विजेता को इस किताब का इनाम देने की घोषणा की।
इस प्रकाशन की वैचारिक समझदारी इसी से जाहिर है। सोनिया गांधी की टीम को जांच परखकर प्रकाशक चुनना चाहिए था। अभी पेंगुइन इंडिया फैक्टचेक की बात कर रहा है, क्या उसने इस किताब का फैक्ट चेक किया था?
पेंगुइन इंडिया का सोनिया गांधी की आत्मकथा Belonging: A Journey of Love से पीछे हटना सामान्य घटना नहीं है। ये बताता है कि मौजूदा राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कितनी तरह की पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं और प्रकाशन उद्योग कितने दबाव में काम कर रहा है।
पेंगुइन के अमेरिकी प्रकाशक नॉफ ने घोषणा की थी कि पहली छपाई एक लाख प्रतियों की होगी और इसे 10 नवंबर को रिलीज़ किया जाएगा। भारत में इसे पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ही लाने वाली थी। लेकिन अब वह पीछे हट गई है।
सूत्रों के मुताबिक प्रकाशक ने पांडुलिपि के एक हिस्से में संपादकीय बदलाव और कुछ अंश हटाने को कहा मगर सोनिया गाँधी ने इनकार कर दिया। इसके बाद ख़बर है कि हार्परकॉलिन्स इसके राइट्स लेने के करीब है। न तो प्रकाशक ने बताया कि कौन-सा हिस्सा आपत्तिजनक था, न ही सोनिया गाँधी ने कुछ कहा है।
यह घटना अकेली नहीं है। हाल के महीनों में पेंगुइन इंडिया जो सैको की मुजफ्फरनगर दंगों वाली किताब और जनरल नरवणे के संस्मरणों को लेकर भी पीछे हट चुकी है। एक ही घराने की ये बार-बार की वापसी एक पैटर्न दिखाती है: कानूनी जांच, मानहानि का डर, नक्शे-सीमा जैसे ‘संवेदनशील’ बिंदु, या सत्ता-विपक्ष दोनों तरफ से संभावित प्रतिक्रिया।
प्रकाशन एक कारोबार है; मुकदमे और राजनीतिक दबाव उसके लिए महंगे साबित होते हैं। लेकिन जब एक ही प्रकाशक बार-बार ‘बदलाव के लिए कहे और लेखक तैयार न हो तो वह प्रकाशन से हट जाए, तो सवाल उठता है—संपादन कहाँ खत्म होता है और आत्म-सेंसरशिप कहाँ शुरू होती है।
सोनिया गांधी का मामला और पेचीदा है। नेहरू-गांधी परिवार की निजी आत्मकथा अपने आप में राजनीतिक दस्तावेज है। ऐसे पाठ में किसी भी कटौती का मतलब इतिहास के एक संस्करण को काटना हो सकता है। लेखिका का इनकार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आत्मकथा का मूल्य उसकी अपूर्णता और असुविधा में होता है, साफ-सुथरी आधिकारिक कथा में नहीं।
अंत में किताब छपेगी ही—अगर भारत में नहीं तो बाहर, अगर पेंगुइन से नहीं तो किसी और से। असली सवाल प्रकाशन का नहीं, विश्वास का है। क्या भारतीय पाठक को बिना काटे-छाँटे राजनीतिक आत्मकथा पढ़ने का हक है? और क्या बड़े प्रकाशक अब केवल वही छापेंगे जो विवाद से बचा रहे? Belonging का विवाद इन्हीं दो प्रश्नों को खुला छोड़ जाता है।
लेकिन आज की तारीख़ में सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या ये सरकार विपक्ष की एक महत्वपूर्ण नेता की अभिव्यक्ति को कुचलने की हद तक जा सकती है या उसने ऐसा वातावरण बना दिया है जिसमें वह संभव ही नहीं है?
NCLT - “नेता-कंपनी लूट ट्रिब्यूनल”
किसान 50 हज़ार न चुकाए तो ज़मीन नीलाम हो जाती है। Salaried एक EMI न भर पाएं तो घर पर बैंक के गुंडे पहुंच जाते हैं। गरीब छात्रों को तो शिक्षा तक के लिए लोन नहीं मिलता।
मगर, चुनिंदा "मित्रों" के लिए बैंक का पैसा निजी संपत्ति है - कितना भी निकालो, जो मर्ज़ी चुकाओ।
मोदी सरकार ने देश में दो व्यवस्थाएं बना रखी हैं - एक चंद अरबपतियों के लिए, दूसरी बाक़ी सबके लिए।
𝐁𝐢𝐡𝐚𝐫'𝐬 𝐃𝐢𝐦𝐚𝐠𝐢 𝐍𝐚𝐱𝐚𝐥❓
The police are detaining and taking the child away.
𝐓𝐡𝐞 𝐂𝐡𝐢𝐥𝐝'𝐬 𝐂𝐫𝐢𝐦𝐞: This Child participated in the Patna Student Protest and demanded that the Government Resign. The Child was Holding a Poster.
That is Why This Child has been Considered the Most Dangerous by the Tyrannical Government.
#Patna #MissionRojgar
Wasn't Netaji Subhas Anti-National? Just 8 points.🙏🏾
🔵 Netaji Subhas deliberately chose Tagore's Jana Gana Mana over Bankim's Vande Mataram for his multinational army.
🔵 Netaji on Sept 26, 1943 at last Mughal Emperor Bahadur Shah's tomb in Rangoon said this -
"We Indians, regardless of religious faiths, cherish the memory of Bahadur Shah, not because he was the man who gave the clarion call to his countrymen to fight the enemy from without, but because he was the man under whose flag fought Indians from all provinces, Indians professing different religious faiths, the man under whose sacred flag freedom-loving Hindus, Muslims and Sikhs fought side by side in the war that has been dubbed by English historians as the sepoy mutiny, but which we Indians call the first war of independence.
That spirit of dynamic faith-inspired unity, not listless secular uniformity, was what he wanted to see emulated in the - last war of independence."
Today's Hero of Hatred and his gang, who are running after the Mughals with hammer and tongs, erasing that period from schools and colleges, are also the ones who distribute certificates of nationalism. So, isn't Netaji an anti-national according to them by default?
🔵 His Azad Hind Government chose - Jai Hind (Victory to India) as the common greeting, instead of invoking any word that inclined towards any religion.
Wasn't it Tukde Tukde move?
🔵 Hindustani, a mixture of Hindi and Urdu written in the Roman script, became the national language.
But keeping the sentiment of south Indian presence, translation into Tamil was provided at all public meetings.
Even the proclamation of the Azad Hind government was read in Hindustani, Tamil, and English.
The RSS and BJP whose foundation slogan is Hindi, Hindu, Hindutva - wasn't it a Dimagi Naxali programme by their IQ parameters?
🔵 A leaping tiger, symbolising Tipu Sultan’s brave resistance against the British, was used as the emblem on the tricolour shoulder badges of INA uniforms.
Isn't it anti-national to the likes of Amit Shah and his gang?
🔵 Gandhi’s charkha continued to adorn the center of the tricolor flags that INA soldiers were to carry on their march toward Delhi.
The first division of INA, some 10K soldiers under the command of Md Zaman Kiani was divided into three regiments
1. Gandhi Brigade.
2. Nehru Brigade.
3. Azad Brigade (attributing - Maulana Azad).
Those who worship Godse, despise Nehru, and abuse Maulana Azad - shouldn't they Netaji Subhas a traitor?
🔵 Three Urdu words -
Itmad (Faith),
Ittefaq (Unity),
Kurbani (Sacrifice)
They encapsulated the motto of the Azad Hind movement.
Those who are deliberately running an official campaign to Sanskritise popular Hindi by excluding Urdu words, for those people, Urdu is an enemy language. Shouldn't they consider Netaji an enemy?
🔵 A rosary of beads and a small copy of Gita were Netaji's forever companions, but with a distinction from today's political buffoons. He never made public display of his regiousity.
Netaji's colleague S. A. Ayer wrote "He never even once spoke his God in public. He lived him."
Isn't this approach deplorable to today's religious clowns who are using their religion for their political purpose?
So, I demand declare Netaji Subhas an Anti-National, Dimagi Naxal, Urban Naxal, Tukde Tukde etc etc.
मोदी और साय ने मिलकर हसदेव को अदानी के हाथ में बेच दिया है । राजस्थान को कोयला की जरूरत ही नहीं है बावजूद इसके जबरन लोगों के विरोध को कुचलकर, समृद्ध जंगल को बर्बाद करके खदान खोली जा रही है ।
आधे से ज़्यादा कोयला adani के तिल्दा, रायगढ़ और मध्यप्रदेश में पॉवर प्लांटों में खपाया जा रहा है । किसी जाँच एजेंसी में दम नहीं है कि इस हज़ारो करोड़ के भ्रष्टाचार पर कार्यवाही करे ।
साहिल की FIR दर्ज हुई। यह न्याय की तरफ़ पहला क़दम है।
पर सोचिए - एक FIR लिखने की इजाज़त तक गृह मंत्रालय से आनी पड़ी। अब समझ आया कि न्याय पर लगाम किसने लगा रखी है।
उत्तराखंड की किच्छा विधानसभा सीट पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए 4,857 आपत्तियां दर्ज हुईं. इनमें से 4,855 आपत्तियां अकेले BJP के बूथ लेवल एजेंट राजेश तिवारी ने दर्ज कराईं है. सभी मतदाता मुस्लिम हैं.
ऐसा ही दूसरी जगहों पर भी हुआ है.
https://t.co/JLkeoVN1gU
@ajitanjum पहला जेपीएससी अध्यक्ष दिलीप प्रसाद इसका सबसे खास आदमी था। इसीलिए उसको अध्यक्ष बनाया था।
जेपीएससी में भ्रष्टाचार की नीव यही महाशय ने डाला है। आज सबसे बड़ा छात्र हितेषी बना फिर रहा है अगर शर्म होती तो चुल्लू भर पानी में डूब जाता।
इसमें अर्जुन मुंडा को भी जोड़ लीजिए।
बाकी जोहार
मरांडी जी ,
झारखंड बनने के बाद आपके मुख्यमंत्रित्व काल में JPSC में जो धांधली हुई थी , उसके लिए क्या कहेंगे?
सीबीआई जांच भी हुई थी . पता नहीं उसका क्या हुआ लेकिन सब आज भी नौकरी कर रहे हैं . अब तो रिटायर होने के रास्ते पर होंगे.
तो बेईमानी और धांधली की बुनियाद तो आपके कार्यकाल से ही रखी गई थी .
उस पर कुछ प्रकाश डालें.
मैं रांची गया था तो बहुत से लड़के आपके कार्यकाल में हुए घपले का भी जिक्र कर रहे थे . आपके परिवार से JPSC में चयन हुआ था , उसका भी जिक्र कर रहे थे .
आपकी बात 100% सही है,लेकिन कौन समझाए।
हेमंत सोरेन जी जिन लोगों से घिरे हुए हैं उनमें से कोई भी झारखंडी हितैषी नहीं है। और ऐसे लोग ही लुटिया डुबोते हैं।
बाकी तो जोहार रहेगा।
2015 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं Jadavpur University पहुँचीं और hunger strike कर रहे छात्रों से मिलीं.उसी दिन Vice-Chancellor के इस्तीफे की घोषणा हुई.
2025 में ओडिशा में OUAT के MSc और PhD scholars stipend की मांग को लेकर hunger strike पर बैठे। छात्रों ने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से मिलने का आग्रह किया. मुख्यमंत्री से उनकी सीधे मुलाकात हुई. उन्हें आश्वासन मिला और छात्रों ने hunger strike suspend कर दी.
दोनों घटनाओं में परिस्थितियाँ और मांगें अलग थीं.
लेकिन एक बात समान रही - आंदोलनरत छात्रों से सीधे संवाद.
लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं है।
छात्रों का आंदोलन भी लोकतंत्र की आवाज है.
अगर मा हेमन्त सोरेन मेरी सलाह लेते तो मैं उन्हें स्वतंत्रता दिवस के दिन JPSC -JSSC छात्र मोर्चा और छात्र Devendra Nath Mahto से मिलने की सलाह देता.
देवेंद्र समेत सभी छात्रों की अन्य मांगों के साथ ये भी मांग है कि वार्ता सीधे मुख्यमंत्री से हो.
बहरहाल, हो सकता तो तिरंगा यात्रा की शुरुआत भी उन्हीं को मैं करने बोलता. आप उधर से गुजरे भी. अपने 26 साल पुरानी system से लड़ रहे छात्र आपके विरोध में हैं - ये आपको कौन समझा रहा है?
जब आपकी मंशा साफ है कि हमें दागियों को पकड़ना है. छात्र हित में फैसले लेने है तो फिर सोचना क्या!.
इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि झारखण्ड के बच्चे पहाड़ जैसी जिंदगी में दो बून्द पानी की तलाश में हैं, जो उन्हें वर्षों से नहीं मिला.. उम्र सीमा ख़त्म होते ही आप प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए expire कर जाते हैं.. तो उन्होने सत्ता के हाथों बिन पानी पिए मरने के बजाय खुद आमरण का रस्ता चुन लिया है.
बहरहाल,मैं हेमंत दा को याद दिलाता कि protocol सिर्फ मुख्यमंत्री के लिए जरूरी होता है . जननायक के लिए नहीं.
राष्ट्रीय पर्व सही मौका था अनशन तोड़ने देने का. आप मोराबादी में थे ही.. भाषण आपका प्रभावशाली था ही.. चले आते सिर्फ 5 मिनट.Co-optation का सही मौका था.
Co-optation तो आपने नहीं ही किया. साथ ही साथ, देवेंद्र को इज़ाज़त न देकर ventillation भी नहीं दिया.
लेकिन पता नहीं क्यों, ऐसा लग रहा है उन्होंने शायद...देर कर दी.
दिन -ब - दिन मेरी चिंता देवेंद्र, हबीबा और उनके साथियों के स्वास्थ्य की है. मुख्यमंत्री आवास से 2 km की दूरी तय कर पहुंचने की यह यात्रा इतनी लम्बी क्यों होती जा रही!
@JLKMJHARKHAND@Tigerjairam@JairamTiger@KotwalMeena@HemantSorenJMM@abhayminz@DevendraNathMa9
कांग्रेस बेकार है हमेशा बड़ी गलती करती है उसने तो इतनी गलती की है कि उसकी सरकार में हम मजे से पत्रकारिता कर पाते थे। हम खुलकर प्रधानमंत्री से सवाल कर पाते थे।
बीजेपी बहुत सही है इतनी सही है कि उसकी सरकार में हमारा चैनल, नौकरी सब छीन लिया जाता है। हम उसके गलत को ग़लत नहीं बोल पाते हमें व्यंग्य में अपनी बात कहनी पड़ती है।
फिर भी हमारी नज़र में कांग्रेस बीजेपी एक बराबर हैं क्योंकि हम निष्पक्ष हैं और इतने निष्पक्ष हैं कि हमारे सामने आईना रखने वाले को ब्लॉक कर देते हैं।
🚨Friends, Mr. Manan Kumar Mishra’s Bar Council of India spent 14 CRORES on meetings and conferences in just one year.
Today, he had to withdraw a portion of his outrageous order on NALSAR students within 1 hour. So where and how is this 14 crores being spent?
12 crores was also spent on travel and accommodation.
But what has been the result? If Mr. Mishra is capable of issuing such a draconian order against young students, then what welfare has he been doing for young lawyers and law schools? He’s been in the position since 2012 and will be till 2030.
Time’s up, Mr. Mishra!
#LegalCockroachesUnite and hold him accountable.
@Cockroachisback
The BJP has already unleashed its worst over past 13 years. It's just that they are aghast at tasting the same medicine's first bitter dose. A bully is always stunned when replied to in same language. Trump also is, and Modi also will be. Nature's cycle of balance.
लोकसभा में खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 पारित हुई जिसका दुष्परिणाम ये होगा कि हमारा राज्य झारखंड भी अपने खनिज पर सेस नहीं ले पाएगा। ये एक अधिकार छीनने जैसा प्रतीत हो रहा है। झारखंड जैसा प्रदेश जो अपने खर्चे के लिए बहुत हद तक खनिज पर निर्भर है, आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
40% खनिज वाला प्रदेश आज भी आर्थिक संकटों के दौर से गुजर रहा है। केंद्र सरकार रॉयल्टी रोक रही है और राज्य सरकार अवैध खनिज उत्खनन पर रोक नहीं लगा पा रही है।
इसका सीधा सीधा ख़ामियाज़ा राज्य की जनता पर पड़ेगा। केंद्र सरकार इस नियम को वापस ले और राज्य सरकार अवैध खनिज कर कारोबार को बंद करे। यही राज्य की जनता के लिए हितकारी होगा
केंद्र की नीति एवं अवैध खनन पर लगाम लगाने में राज्य सरकार की विफलता का खामियाजा राज्य की जनता भुगत रही है। सरकार की निष्क्रियता के बीच माफिया बेखौफ हैं और आम जनता पीसी जा रही है.
झारखंड की जनता ने जमीन दी, बदले में उन्हें मिला प्रदूषण, विस्थापन और बेरोजगारी...
जीपीएससी को बर्बाद करने में दो आदिवासी नेता मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा।
और अभी हेमंत सोरेन को भी दोस दूंगा। हर सरकार अपने लोगों को एडजस्ट करती है
लेकिन जेपीएससी जैसा बदनाम संस्था में अपराजिता भट्टाचार्य को नियुक्त करना कहीं से भी जायज नहीं थी।
जेपीएससी-जेएसएससी का मकड़जाल: नींव मजबूत होती तो आज छात्रों को सड़क पर नहीं उतरना पड़ता,झारखंड गठन के बाद से ही जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाएं विवादों, अनियमितताओं और सवालों के मकड़जाल में उलझती चली गईं। राज्य में सरकारें बदलती रहीं, चेहरे बदलते रहे, लेकिन भर्ती व्यवस्था को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की स्थायी कोशिश नजर नहीं आई।
अगर शुरुआत से ही आयोगों की व्यवस्था के पिलर मजबूत किए गए होते, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित की गई होती और गड़बड़ियों पर तत्काल कठोर कार्रवाई होती, तो शायद आज झारखंड के युवाओं को अपने भविष्य के लिए आंदोलन, धरना और अनशन का रास्ता नहीं चुनना पड़ता।
मुद्दा सिर्फ किसी एक परीक्षा का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जिसकी नींव वर्षों से कमजोर छोड़ी गई और जिसका खामियाजा आज झारखंड का युवा भुगत रहा है।