मैं किसी की पहली पसंद नहीं हूँ, न कभी था, न शायद कभी बन पाऊँगा,जब सैलाब में शहर डूबा, तो नदी ने भी मुझे किनारे थूक दिया,जब महामारी फैली तो मौत ने भी मुझे चुनने से इंकार कर दिया,बचपन से बुढ़ापे तक बस एक ही टीस साथ चलेगी काश! किसी एक जगह, किसी एक पल,मैं भी किसी की पहली पसंद होता...
@chaigaliyara मैंने उत्सवों से नहीं, मनुष्य की सतही प्रसन्नताओं से विरक्ति चुनी है,
अब भीड़ में नहीं, अपने भीतर के मौन में मनुष्य को खोजता हूँ।
प्रतीक्षा है उस क्षण की, जब अहंकार से परे करुणा जन्म लेगी,
और मनुष्य, पहली बार, केवल जीवित नहीं बल्कि सचमुच मनुष्य होगा।
मैंने त्याग दिया है,
उत्सवों में शामिल होना, भीड़ में समय बिताना या व्यक्तिगत संवादों में तल्लीन रहना,,
मैं आजीवन प्रतीक्षारत रहूँगा
मनुष्य के मनुष्य हो जाने तक...
एक वक़्त वो था जब चाहे कितना ही काम हो पर तुमसे बात करने का समय निकाल ही लेता था,और वो समय आज भी निकालता हु पर अब तुम्हारी जगह शराब ने ले ली,खैर!... एक वक़्त के बाद किसी के होने ना होने से फर्क नही पड़ता...!
30Aug2026
शाम 19:34
अजीब है ना, कभी कभी इंसान स्वयं को लेकर इतना आसक्त हो जाता है कि उसे कुछ करने की वजह ही नहीं मिलती। फिर वह अपने ही ख्यालों में उलझा हुआ घंटों उसी छत को देखता रहता है जहां वो पिछली कई रातों से रह रहा होता है। वक्त सामने से गुजरता रहता है और उसे देखते रहने के
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इस जीवन में
कोई उत्सव शेष नहीं ,
तुम्हारे वियोग ने
मुझे ऐसा श्मशान बना दिया है |
जहाँ प्रतिदिन
प्रेम की शवयात्रा
निकलती है |
और प्रत्येक संध्या
स्मृतियों की चिता प्रज्वलित होती है |
_अ|जे|य🕊️
हम साधारण इंसान हैं,अक्सर हम किसी भी चीज की अहमियत उसके खो जाने के बाद ही समझते है,अक्सर जब चीजें हमारे सम्मुख होती हैं तब हम उन्हें तुच्छ समझते रहते हैं,ठीक इसी भांति हमने अनेक अमूल्य वस्तुओं को खोया है...!
अगर मेरी कमी खलने लगे
किसी तन्हा रात में ,
मेरी तस्वीर से
दो बातें करके सो जाना |
कभी सावन में भीगोगी ,
कभी पतझड़ सताएगा ,
मेरे साथ बिताए हुए मौसम को
ज़रा याद कर जाना |
_अ|जे|य🕊️
किसी व्यक्ति के मन मे आपके प्रति स्वयं से या किसी के भड़काने से घृणा पैदा हो गयी तो आप कितना भी अच्छा क्यों ना कर लो फिर भी आप का उसके लिए किया गया कुछ भी यहाँ तक कि प्रेम भी मायने नही रखता...!
हे समय !
उसकी स्मृतियों के महाभारत का
एक शांत उपसंहार लिख दो |
मेरे भीतर जो अभिमन्यु
प्रेम के चक्रव्यूह में लड़ रहा है,
उसे विश्राम दे दो |
मेरे नेत्रों में
जो गंगा वर्षों से उमड़ रही है ,
उसे अंततः सागर तक पहुँचने दो |
_अ|जे|य🕊️
बेशक मलाल रहेगा मुझे…
तुमने सबकुछ होने दिया
कभी ये नहीं कहा की “चलो शुरू से शुरू करते हैं
जो बिखरा हैं,
उसे साथ मिलकर समेटते हैं ;
जो हम दोनों में टूटा हैं
उसे इकबार फिर से जोड़कर देखते हैं…
/बैराग
कभी कभी सोचता हूं कि अगर मैं अचानक गायब हो जाऊँ, तो इस दुनिया का क्या बिगड़ेगा? सूरज वैसे ही उगेगा,गाड़ियाँ वैसे ही दौड़ेंगी,लोग अपनी-अपनी चाय की चुस्कियों में उलझे रहेंगे.. कुछ दिन शायद दो-चार लोग याद कर लें, पर फिर मेरी जगह कोई और ले लेगा...!!!
यदि कभी मेरी समस्त स्मृतियाँ एक साथ मेरे सम्मुख उपस्थित हों...तो मैं सबसे पहले तुम्हारी स्मृति को प्रणाम करूँगा...क्योंकि उसी ने मुझे यह सिखाया है...कि प्रेम का सर्वोच्च रूप अधिकार नहीं...आशीर्वाद होता है...और विरह का सर्वोच्च स्वरूप अश्रु नहीं...स्वीकार है |
_अ|जे|य🕊️
शराब छोड़ भी दू पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम जैसे नीरस और अंतर्मुखी लोग फिर हमेशा समझदारी,शर्म लिहाज वगेरह में फंसे रह जाते है,बहुत कुछ होता है मन मे कहने को मगर कह नही पाते,खैर!...शराब समय-समय कम से कम नकारात्मकता को बाहर तो निकाल देती है...!
जिन रास्तो से मैं गुजरा हु उस रास्ते से गुजरने की इजाजत मैं किसी को नही देता,जो मैंने भोगा है जो मेरे अनुभव है कोई भी इस दर्द का हकदार नहीं है,और मैं खयाल रखता हूं कि मेरे आसपास का कोई भी,इन हालातो से न गुजरे....!
लंबे समय से संग रहना...बातें करना और एक दूसरे की भावनाओं को समझना...और फ़िर इक पल में ही इस खूबसूरत रिश्ते का ख़तम हो जाना...
"संसार में इस से बड़ी ना तो कोई विपदा है और ना कोई दुर्घटना"
कहते हैं जीवन में बदलाव बहुत जरूरी होता है,, लेकिन कुछ घाव हृदय में नासूर जख्म की तरह होते हैं जो घड़ी घड़ी बस टीसते रहते हैं। खैर,,,, उसकी यादों से भागते भागते शहर आ पहुंचा हूं पर ये हृदय है कि वही लगा रहता है। मैं भी कभी कभी बदलाव की सोचता हूं पर
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