@kaykaymenon02 अरे सर् बड़ी मुश्किल से आपका एकाउंट x पर ख़ैर पहले ये बताईये पाठक जी ने आपसे कहा कि नही हिम्मत सिंह मुझे कितने पसन्द आये और अब शेखर होम बाबू एक ही तो दिल है सर् कितनी बार जीतेंगे एक्टिंग लग ही नही रही थी लगा रियल घट रहा सब next क्या है बताइएगा जरूर इंतजार रहेगा
बहती हुई नदियों ने कभी मुझे अशांत नहीं किया, पहाड़ों ने मुझे कभी कठोर नहीं बनाया, पतझड़ के बाद ठूंठ हो चुके पेड़ ने कभी मुझे सूखने को नहीं कहा
प्रेम में असफल हुए एक प्रेमी ने कभी मुझसे नहीं कहा कि प्रेम मत करना
अतः मेरे पास जीवन में कोई भी ऐसा उदाहरण नहीं है जो इस बात के लिए प्रेरित कर सके कि हारने के बाद ख़त्म कर देना चाहिए आदमी को अपना संघर्ष।
पत्र, 16 अगस्त 2025
प्रिय,
तुम्हारे मोह से कभी निकल पाऊंगा या नहीं, यह नहीं पता, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूं कि सदैव तुम्हें सहेज कर रखूंगा। मेरी बातों में मत आना, मैं झूठा हूं और बेवजह बड़ी-बड़ी बातें करता हूं। मैं जानता हूं, बड़ी-बड़ी बातें करने से पहले इंसान को एक सफल इंसान बनना पड़ता है, अपनी एक हस्ती बनानी होती है। मेरी तो अभी बुनियाद ही साफ नहीं है। मैं तो अभी उसी दौर में हूं, जहाँ हमेशा से था। मुझमें आगे बढ़ने की हिम्मत कभी नहीं आई, हमेशा अपनी कमजोरी को पकड़ कर बैठा रहा, कभी उसे पार पाने की कोशिश नहीं की।
मैं चाहता तो तुम्हें पा सकता था।
मैं चाहता तो तुमसे अपना दुःख साझा कर सकता था।
पर मेरी महान बनने की जुर्रत ने मुझे तुमसे दूर कर दिया।
मैं बेहद खुश हूं, ऐसा तुम्हें लगना चाहिए ताकि तुम्हारा अस्तित्व हमेशा प्रसन्नचित्त बना रहे। तुम्हारी लड़ाई बेहद गहरी और बड़ी है, मेरी लड़ाई बेहद सतही और छोटी है। मेरी लड़ाई जीवन की छोटी कमियां हैं जैसे नौकरी, पैसे, ज़िम्मेदारियां। और तुम्हारी लड़ाई सीधे अस्तित्व से है, ईश्वर से है और होने से है।
मेरा इंतज़ार मत करना, मेरी जड़ों को मत देखना, मेरी कमियां मत गिनना, मेरी ओर मत देखना।
मैं तुम्हें सहेजना जानता हूं, पर कभी सहेज नहीं पाऊंगा।
मैं तुम्हें अपना मानता हूं, पर कभी अपना नहीं पाऊंगा।
मैं तुम्हें चाहता हूं, पर कभी चाहत दे नहीं पाऊंगा।
मैं बात-बात पर रो जाता हूं, पर मैं तुम्हें रुला नहीं पाऊंगा।
बहुत कुछ है जो मैं तुम्हें कह सकता हूं, पर कभी सुना नहीं पाऊंगा।
मैं घुट रहा हूं, लेकिन इसी घुटन में मेरी अस्तित्व की पुकार है।
मेरी वीरानी में ही मेरी सहूलियत है और मेरा अस्तित्व हमेशा तुम्हारे आकाश से जुड़ा रहेगा।
हमारा जहां अलग हो सकता है, पर आकाश वही रहेगा।
| बेख्याली |
स्त्रियों का मन संवेदनशीलता और शक्ति का संगम है. उनकी सहज आदतें परिवार को सुरक्षा और व्यवस्था के धागों में पिरोती हैं, वहीं उनकी सोच अपनों की ख़ुशहाली, सम्मान और भविष्य की स्थिरता के इर्द-गिर्द घूमती है. वे त्याग और आत्म-सम्मान के संतुलन से रिश्तों को सँवारती हैं...🤍:)
किसी पर एक उंगली उठाने से पहले हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी बाकी चार उंगलियाँ हमारी ही ओर इशारा कर रही होती हैं। दूसरों की कमियाँ देखना और उन्हें कठघरे में खड़ा करना बहुत आसान है, लेकिन अपने भीतर झाँककर अपनी गलतियों को स्वीकार करना उतना ही कठिन। अक्सर हम दूसरों के व्यवहार का फैसला उनके एक पल को देखकर कर देते हैं, जबकि अपने जीवन की गलतियों के लिए परिस्थितियों और मजबूरियों का सहारा लेते हैं। इसलिए किसी को दोष देने से पहले स्वयं से पूछ लेना चाहिए कि क्या हम हर उस कसौटी पर खरे उतरते हैं, जिस पर दूसरे को परख रहे हैं।
जीवन की सुंदरता दूसरों में दोष खोजने में नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने में है। जो व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानना सीख जाता है, उसके भीतर दूसरों के प्रति कठोरता कम और समझ अधिक पैदा होती है। उंगली उठाने के बजाय यदि हम वही हाथ किसी को संभालने के लिए बढ़ा दें, तो रिश्ते भी बचेंगे और मन की शांति भी बनी रहेगी। हम सब अपूर्ण हैं; इसलिए दूसरों को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना ही समझदारी है।
पुरुष के लिए समय पर मिली सफलता सिर्फ़ एक उपलब्धि नहीं होती, वह उसका सम्मान होती है, उसकी पहचान होती है, उसके सपनों का प्रमाण होती है।
उसी के सहारे लोग उसकी काबिलियत मापते हैं, उसी से रिश्तों का लहजा बदल जाता है, उसी से घरवालों की आँखों में उम्मीद लौटती है, और उसी से उसके अपने भी उस पर गर्व करते हैं।
लेकिन जब वही सफलता देर से मिलती है, तो अक्सर वह बहुत कुछ खो चुका होता है, कुछ अपने, कुछ रिश्ते, कुछ अधूरे ख़्वाब, और सबसे ज़्यादा... अपने भीतर का वह इंसान, जो कभी बिना शर्त मुस्कुराया करता था।
रोहित
मैचुरिटी व्हेन यू रियलाइज कि अब किसी को कुछ भी समझाने की जरूरत नहीं, क्यों ही एक्सप्लेन करना किसी को कुछ ,अब प्रेम का भी इंतजार नहीं अब चीजें सरल रख के जीवन जीना ही सही ,एक अपना कंफर्ट जोन और हम सब उसके आदि ,बाकी जैसे हालात वैसे ही मजबूत हम ... ❤️
वर्तमान पीढ़ी को परफेक्ट जिंदगी जीने के लिए तैयार किया गया है। कमियों, नाकामियों, नाकाम रिश्तों, सामाजिक शर्मिंदगी, माता पिता की नाराजगी, असफलता का सामना करने में असमर्थ है ये।
(अमर उजला में छपे अद्वैत काला के लेख से)
कोई नहीं देखता है घर से दूर बिताये गये साल, लाइब्रेरी में बिताये घंटे, Notes और Exam के लिए जगी हुई रातें, आपके अलग-अलग शहरों की परीक्षा के लिए यात्रा, लोग देखते हैं सिर्फ परिणाम, अगर तुम सफल हो तो तुम पढ़े लिखे और असफल रहे तो तुम रद्दी हो, तुम्हारी योग्यता शून्य है, परिणामों से योग्यता नापने वाला ये समाज और लोग हमारी उदासीनता और निराशा का सबसे बड़ा कारण है❤️🙂
@Sunil_Merta2311
किसी की मृत्यु के तुरंत बाद उसके कर्मों का मूल्यांकन करने से बचना चाहिए।
इस धरा पर सब भोगने ही तो आये हैं। शास्त्र के नियम दूसरों पर नहीं , स्वयं को सुधारने में लगाने चाहिए। जो चला गया ,प्रभु जानें। आप ऊल जलूल लिखकर खराब कर्म नहीं कर रहे हैं? 🙏
मैं जान गई हूँ सबके पास दुःखों की अपनी पोटली है। कोई हल्की लिए घूम रहा है, कोई मेरी सोच से कहीं भारी। मेरे बोल देने से किसी का दुःख कम नहीं होगा, बस उसका वज़न बढ़ेगा और मैं यह अपराध नहीं करना चाहती। हाँ, मैं सुनती हूँ। ध्यान से बिना सलाह दिए बिना तुलना किए
क्योंकि दुःख बाँटना हमेशा बोलना नहीं होता, कभी-कभी किसी का दुःख सुन लेना भी बाँट लेना ही है। शायद यही मेरा स्वार्थ है कि मैं किसी को और दुखी न करूँ...🙏
यूं तो हम ख़ुश पैदा नहीं होते पर ज़िंदगी हमें हालातों और उनकी स्वीकार्यता से आख़िर ख़ुश रहना सिखा ही देती है ! जैसे अभी चाय बनाकर ख़ुश हो ही रहा था पर पीते ही पता चला कि इसमें शक्कर ही नहीं डाली ! फ़िर मन को समझाया कि दुनियां में शक्कर है ही नहीं ! अब इसी चाय में आनंद आ रहा हैं !
आज मेरा जन्मदिन है।
कितना विचित्र है न मनुष्य का मन।
जिस तिथि की प्रतीक्षा में कभी पूरा वर्ष बीत जाया करता था, वही तिथि जब सचमुच सामने आकर खड़ी हो जाती है तो न जाने क्यों भीतर का सारा उत्साह धीरे-धीरे कहीं विलीन हो जाता है। बचपन में जन्मदिन का अर्थ नए कपड़े थे, केक था, मोमबत्तियाँ थीं, ढेर सारी शुभकामनियाँ थीं, उपहारों की उत्सुकता थी और रात भर नींद न आने वाली वह मासूम बेचैनी थी कि बस सुबह हो जाए।
लेकिन समय बहुत कुछ बदल देता है।
अब वर्षों से देख रहा हूँ कि जैसे-जैसे ये दिन निकट आता है, मेरे भीतर का शोर कम होने लगता है। मैं किसी उत्सव की तैयारी नहीं करता। कोई सूची नहीं बनाता कि कौन याद रखेगा और कौन भूल जाएगा। अब ये दिन मुझे भीड़ में खड़ा होकर मुस्कुराने से अधिक, स्वयं के सामने बैठकर मौन रहने की इच्छा देता है।
सच कहूँ तो अब मुझे अपने जन्मदिन का उत्साह नहीं होता।
ऐसा नहीं कि जीवन से शिकायत है, ऐसा भी नहीं कि लोगों के प्रेम का मूल्य नहीं समझता। बस अब ये दिन मेरे लिए बाहरी उत्सव से अधिक भीतर की यात्रा बन गया है। जैसे कोई साधु वर्षों बाद अपने ही मन के प्राचीन मंदिर में लौटकर दीपक जलाता हो, वैसे ही मैं इस दिन अपने भीतर लौटना चाहता हूँ।
कभी-कभी मन करता है कि इस दिन कोई मुझे खोजे भी नहीं। न कोई फ़ोन बजे, न कोई औपचारिक संदेश आए, न किसी को ये बताना पड़े कि आज मेरा जन्मदिन है। मैं बस कहीं खो जाना चाहता हूँ, किसी शांत कमरे में, जहाँ केवल एक खिड़की हो, उससे आती हुई हल्की हवा हो, बाहर कहीं पेड़ों की पत्तियाँ धीमे-धीमे हिल रही हों, और भीतर मेरी डायरी खुली हो।
मैं घंटों लिखता रहूँ बिना ये सोचे कि कौन पढ़ेगा। बिना ये सोचे कि शब्द कितने सुंदर बन रहे हैं। बस लिखता रहूँ...अपने उन हिस्सों के बारे में जिन्हें मैंने पूरे वर्ष दुनिया से छिपाकर रखा। उन मुस्कानों के बारे में जिनके पीछे थकान थी। उन मौनों के बारे में जिनमें असंख्य अधूरे संवाद दबे रह गए। उन सपनों के बारे में जो अभी भी मेरी मेज़ की किसी दराज़ में धूल ओढ़े पड़े हैं। उन लोगों के बारे में जिन्हें मैंने खोया नहीं, बल्कि समय ने धीरे-धीरे मुझसे दूर कर दिया, और उन लोगों के लिए भी कुछ लिखूँ जो आज भी मेरे जीवन में हैं, पर शायद उन्हें कभी बताया ही नहीं कि उनकी उपस्थिति ने कितनी बार मुझे टूटने से बचाया।
जन्मदिन शायद उम्र बढ़ने का उत्सव नहीं है।
ये उन सभी वर्षों के प्रति कृतज्ञ होने का दिन है जिन्होंने हमें धीरे-धीरे बदल दिया। जिन्होंने हमारे भीतर के अहंकार को थोड़ा कम किया, हमारी अपेक्षाओं को थोड़ा छोटा किया और हमारी समझ को थोड़ा बड़ा कर दिया।
पहले लगता था कि जीवन हमें बहुत कुछ देगा। अब समझ आता है कि जीवन हमें बहुत कुछ छीनकर भी बहुत कुछ सिखाता है। पहले इच्छाएँ अधिक थीं, अब शांति अधिक प्रिय लगती है। पहले लोग अधिक महत्वपूर्ण थे, अब संबंधों की सच्चाई अधिक महत्वपूर्ण लगती है। पहले शोर अच्छा लगता था, अब मौन सबसे विश्वसनीय साथी लगता है।
शायद यही उम्र का सबसे सुंदर परिवर्तन है कि धीरे-धीरे मन बाहर की तालियों से लौटकर भीतर की स्वीकृति खोजने लगता है। अब किसी से यह प्रमाण नहीं चाहिए कि मैं अच्छा हूँ। अब किसी उत्सव की भी आवश्यकता नहीं कि मैं अपने होने का अर्थ महसूस कर सकूँ। अब बस इतना पर्याप्त लगता है कि रात को सोने से पहले आईने में स्वयं की आँखों में देखकर कह सकूँ "आज भी तुमने अपने हिस्से की ईमानदारी निभाई।"
आज जब मैं अपने जीवन के अब तक के सफ़र को देखता हूँ तो पाता हूँ कि जितनी खुशियाँ मिलीं, उनसे कहीं अधिक सीखें मिलीं। जितने अपने मिले, उतनी ही विदाइयाँ भी मिलीं। जितनी उम्मीदें थीं, उतने ही भ्रम भी टूटे। लेकिन यदि ये सब न हुआ होता तो शायद आज मैं वह व्यक्ति भी न होता जो इस शांत रात में बैठकर यह सब लिख पा रहा है।
कभी-कभी लगता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा उत्सव वही है जब वह स्वयं से मिलने लगे, और मेरा जन्मदिन अब शायद वही दिन बन गया है।
मैं इस दिन मोमबत्तियाँ नहीं गिनना चाहता, बल्कि उन अंधेरों को याद करना चाहता हूँ जिन्हें पार करके यहाँ तक पहुँचा हूँ। मैं केक काटने से अधिक उन संबंधों को जोड़ना चाहता हूँ जो कहीं भीतर टूट गए थे। मैं उपहारों से अधिक उन अनुभवों को खोलकर देखना चाहता हूँ जिन्हें जीवन ने बिना किसी रिबन के मेरे हाथों में रख दिया।
आज यदि ईश्वर से कुछ माँगना हो तो शायद धन, प्रसिद्धि या लंबी आयु भी नहीं माँगूँगा। बस इतना माँगूँगा कि मेरे भीतर की संवेदनाएँ जीवित रहें। किसी का दुःख देखकर मेरा हृदय कठोर न हो। मेरे शब्द किसी थके हुए मन को थोड़ी-सी आशा दे सकें। मेरी कलम कभी असत्य की चापलूसी न करे और जब भी मैं अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखूँ तो मुझे अपने निर्णयों पर पछतावे से अधिक संतोष मिले।
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जब हम जीवन में असफल होते हैं, तो लोग आपकी मेहनत, नीयत और ज्ञान तीनों पर सवाल उठाने लगते हैं. वे आपकी परिस्थितियाँ नहीं, केवल परिणाम देखते हैं. इसलिए अपनी बेबसी नहीं, अपनी मेहनत को बोलने दीजिए; क्योंकि यह दुनिया कहानियों से कम, सफलता से ज़्यादा प्रभावित होती है…🤍:)