कैलाश यात्रा का छोटा रास्ता, बड़े सवाल
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कल नेपाल में हुए हादसे में जिन 400 से अधिक यात्रियों के लापता होने की बात कही जा रही है, उनमें 77 ईशा फाउंडेशन के सेक्रेड वॉक से जुड़े यात्री थे. जग्गी वासुदेव ने खुद ट्वीट करके यह जानकारी दी है. इनमें 53 भारतीय यात्री थे और शेष 19 देशों के लोग थे. इन तमाम यात्रियों ने कैलाश मानसरोवर के दो पारंपरिक रास्तों के बदले इस छोटे, मगर जोखिम भरे रास्ते को ईशा सेक्रेड वॉक के भरोसे चुना. आज इन 77 यात्रियों का कोई अता-पता नहीं है. सवाल यह भी है कि जिस रास्ते में पिछले साल दो-दो हादसे हो गये थे, उस रास्ते को ईशा फाउंडेशन ने क्यों चुना?
तमिलनाडु की संस्था ईशा फाउंडेशन जिसे जग्गी बासुदेव चलाते हैं, वह अपना परिचय एक आध्यात्मिक संस्था के रूप में देती है. इसके अलावा उसका कहना है कि वह पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों पर भी काम करती है. मगर हमने देखा है कि इस संस्था की व्यावसायिक गतिविधियों में भी रुचि है. एक गैर लाभकारी संस्था के रूप में वह कैसे टूर ऑपरेटर वाला काम करती है, यह देखने वाली बात होगी.
मगर जो जानकारी मिल रही है, उसके मुताबिक वह 2006 से ही लोगों से पैसे लेकर उन्हें कैलाश मानसरोवर की यात्रा कराती है.
भारत से कैलाश मानसरोवर जाने के दो प्रचलित रास्ते हैं. भारत सरकार अपने यात्रियों को उत्तराखंड के लिपुलेखा के रास्ते से यात्रा कराती है, जो सस्ता है, मगर उसमें पैदल काफी चलना पड़ता है और लगभग 22 दिन लग जाते हैं. हाल के दिनों में सिक्किम के पास नाथुला बार्डर से भारतीय यात्रियों को जाने की इजाजत चीन ने दी है. इस रास्ते में ज्यादातर गाड़ियों से पहुंचा जा सकता है. हालांकि यह थोड़ा महंगा है.
मगर ईशा फाउंडेशन के ईशा सेक्रेड वॉक ने अपने यात्रियों के लिए उस रास्ते को चुना जिससे नेपाल के यात्री कैलाश मानसरोवर जाते हैं. काठमांडू–रसुवागढ़ी–केरुंग/ग्यिरोंग होकर. इसकी एक ही खासियत है कि इसमें वक्त कम लगता है. यात्री 14 दिन में पहुंच जाते हैं.
मगर यह रास्ता खतरों भरा है. इससे पहले जुलाई 2025 में भी रसुवागढ़ी क्षेत्र में भीषण बाढ़ ने नेपाल-चीन सीमा के पुल, सड़क और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया था. इसके महज तीन सप्ताह बाद, 30 जुलाई 2025 को इसी रूट पर फिर भोट कोसी में बाढ़ आई और सड़क दोबारा बंद हो गई. यानी एक ही मानसून में यह करिडोर दो बड़ी बाढ़ों की चपेट में आया था. इसके बाद भी यह रास्ता पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं हुआ 2026 में सड़क के कई हिस्सों पर निर्माण और सुधार का काम चल रहा था.
इसके बावजूद ईशा फाउंडेशन ने अपने यात्रियों को इस रास्ते से ले जाने का रिस्क लिया. जानकारी यह भी है कि ईशा फाउंडेशन इस यात्रा में नेपाल के एक टूर ऑपरेटर की भी मदद लेता है. क्या यह सब भारत सरकार को पता है?
असली सवाल है कि 2025 में इसी करिडोर में हुई दो बड़ी बाढ़ों के बाद 2026 की यात्राओं के लिये क्या खतरों का आकलन किया गया था? क्या फाउंडेशन ने अपने यात्रियों को इस करिडोर के पिछले वर्ष के हादसों के बारे में बताया था? क्या नेपाल और चीन के स्थानीय अधिकारियों से कोई आपदा बचान प्रोटोकॉल तय था? खास तौर पर यह देखते हुए कि इस यात्रा में तीन देशों की भागीदारी थी. इस रूट की सुरक्षा सुनिश्चित करने में उसकी जिम्मेदारी की सीमा क्या थी?
यह भी ध्यान रखना होगा कि ईशा खुद को पारंपरिक अर्थ में टूर कंपनी नहीं बताता, लेकिन उसका ईशा सेक्रेड वॉक कार्यक्रम यात्रियों को कैलाश यात्रा के लिए निबंधित करता है और यात्रा का आयोजन करता है. इसलिए फाउंडेशन की कानूनी भूमिका और व्यावहारिक भूमिका में अंतर की जांच जरूरी है.
कैलाश की यात्रा आस्था की यात्रा है, लेकिन जिस भूगोल से होकर यह यात्रा गुजरती है, वह हिमालय के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है. लिपुलेख और नाथू ला के मुकाबले नेपाल का रास्ता समय बचाता है; लेकिन 2025 की दो बाढ़ों और 2026 की इस त्रासदी ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि समय की इस बचत के साथ यात्रियों ने कितना अतिरिक्त प्राकृतिक जोखिम लिया. और अब सबसे जरूरी सवाल उन 77 यात्रियों के परिवारों का है—वे कहां हैं, सुरक्षित हैं या नहीं, और उन्हें खोजने में इतनी देर क्यों लग रही है?
वीडियो में दिख रहे थानेदार दरभंगा शहर के बेंता #थाना प्रभारी हरेंद्र कुमार हैं, ऐसा बताया गया है. गुस्से में लाल दिख रहे हैं. एक डॉक्टर साहिबा गूगल मैप को फॉलो करते हुए वनवे में घुस गई. मैडम ने कहा गलती हो गई तो आप फाइन काट दो, ऐसे बात मत करो!
@bihar_police@DarbhangaPolice
It's fascinating that three of the most important developments in Indian science happened not in a laboratory or lecture hall, but in the most unlikely of places, on board a ship on an ocean voyage.
The first was in 1893, on a voyage from Yokohama to Vancouver, when Swami Vivekananda met Jamsetji Tata & inspired him to create an institute that merged the humanism of the east with the science and Technology of the west. That's how the Indian Institute of Science started.
In 1930, Subrahmanyan Chandrasekhar won a scholarship to study at Cambridge & while aboard the ship to England did the bulk of the work on the Chandrashekhar Limit for stars, for which he would later be awarded a Nobel Prize. This was, amazingly, before his 20th birthday.
And in 1921, 9 years earlier, CV Raman, returning home from Oxford on a sea voyage was dazzled by the deep blue of the Mediterranean and decided to study the scattering of Light. The 'Raman Effect' won him a Nobel Prize in 1930.
Raman was so confident of getting the Nobel Prize after missing out in 1928 and 1929 that he booked his ocean voyage tickets to Sweden months before he knew he had won.
137th birth anniversary of CV Raman today.
मेरे एक करीबी मित्र ने 3 एकड़ पर समस्तीपुर में केला लगाया है... एकदम उम्दा G9 वैरायटी। कोई खरीदार नहीं मिल रहा जो सही दाम दे। आप दिलवाएंगे?
चुनाव पूर्व और मंत्री बनने से पहले आप बिहार में खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में अनंत संभावनाएं देख रहे थे... टीवी पर आपके वक्तव्य हैं।
आप अभी केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हैं। समझ से परे है कि एक केंद्रीय मंत्री की - जिसका नारा "बिहार फर्स्ट , बिहारी फर्स्ट" है - क्या जिम्मेदारी है?
Devastating news from Rajouri. We have lost a dedicated officer of the J&K Administration Services. Just yesterday he was accompanying the Deputy CM around the district & attended the online meeting I chaired. Today the residence of the officer was hit by Pak shelling as they targeted Rajouri town killing our Additional District Development Commissioner Sh Raj Kumar Thappa. I’ve no words to express my shock & sadness at this terrible loss of life. May his soul rest in peace.
It's not that we intentionally wait for the last day to fill the form, we do have some financial and other certificate related issues.
Please understand this. Also server was down 👎 for last three days
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