पूज्य चंपत राय जी, सादर प्रणाम।
आपका पत्र पढ़ा। जिस धैर्य, आत्मविश्वास और संगठन के प्रति निष्ठा के साथ आपने लिखा कि “सत्य सामने आ जाएगा” वह आपके व्यक्तित्व का ही परिचय है।
मुझे आज भी वह दिन स्पष्ट स्मरण है जब मैं लखनऊ के “विश्व हिन्दू परिषद” कार्यालय में आपके दर्शन को पहुचा था। उस समय आप माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निमंत्रण हेतु लखनऊ आए हुए थे। अगले दिन प्रातः आपको मुख्यमंत्री जी से भेंट करनी थी।
मंदिर निर्माण के प्रारम्भिक दिनों में आपसे कई बार मिलने का सौभाग्य मिला था। उसके बहुत समय बाद यह भेंट हुई थी। जब मैं “विहिप” कार्यालय पहुँचा तो देखा कि एक अत्यंत साधारण से कमरे में, एक सामान्य-सी चौकी पर एक गद्दे पर आप बैठकर दूध-रोटी जैसा अत्यंत सादा भोजन कर रहे थे।
उस क्षण मेरे मन में एक ही विचार आया “संघ का स्वयंसेवक जीवन क्या होता है, चरित्र क्या होता है, व्यक्तित्व क्या होता है और सादगी किसे कहते हैं”
जिस व्यक्ति के कंधों पर विश्व के सबसे भव्य मंदिरों के निर्माण का दायित्व हो, जो करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र का निर्माण देख रहा हो, वह व्यक्ति इतनी सहजता और सादगी से एक छोटे से कमरे में बैठकर भोजन कर रहा था। न कोई विशेष व्यवस्था, न कोई सुरक्षा घेरा, न कोई दिखावा। वहाँ केवल कुछ सामान्य कार्यकर्ता थे।
उसी समय आपके एक सहयोगी ने पूछा “कल सुबह मुख्यमंत्री जी से मिलने कौन-सा कुर्ता पहनेंगे?” आपने सहज भाव से कहा। “वही , जो अयोध्या से पहनकर आया हूँ।” मैंने देखा पास की एक कुंडी पर आपका कुर्ता टँगा था। अगले दिन हमने देखा जब आपने उसी कुर्ते में माननीय मुख्यमंत्री जी को निमंत्रण दिया, तब हम सबने उसका चित्र देखा। उस दृश्य ने मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ी।
ऐसा जीवन अभिनय से नहीं जिया जा सकता। यह 40 वर्षों की साधना, तपस्या और स्वयंसेवक संस्कारों का परिणाम होता है।
इसीलिए आज जब आपके ऊपर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, तब मेरा विश्वास तनिक भी नहीं डिगा है। जिन लोगों ने आपको केवल समाचारों में देखा है, वे भ्रमित हो सकते हैं; किन्तु जिन्होंने आपके जीवन की सादगी, पारदर्शिता और तप को निकट से देखा है, उनके मन में संशय का कोई स्थान नहीं हो सकता।
मेरे लिए आप केवल श्रीराम मंदिर निर्माण के एक प्रमुख दायित्वधारी नहीं हैं, बल्कि यह प्रमाण हैं कि ईमानदारी, सादगी और राष्ट्रकार्य का जीवन आज भी संभव है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वे आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और इस कठिन समय में अडिग धैर्य प्रदान करें। सत्य अवश्य विजयी होगा।
सादर चरणस्पर्श।
दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी ११०० रुपए वाले, सिंधी भाई जिन्होंने सिक्के दिए, कोई पूर्व सचिव जी जिन्होंने सोने की रामायण दी।
चूँकि वो राशि और वे वस्तुएँ सभी अयोध्या मन्दिर या व्यवस्था परिसर में सुरक्षित हैं।
इसलिए ऐसे जितने भी दानदाता अपने दान का रोना रो रहे हैं
मेरा थोड़ा भी वश चलता तो मैं ऐसे सभी लोगों को अयोध्या बुलाकर उन सभी के दान की राशि और वस्तुएँ वापस करवा देता।
बाद में राशि-वस्तु वापस किए जाने का वीडियो मीडिया में प्रसारित करवाता।
ऐसे धूर्त,मूर्ख दानदाताओं की राशि-वस्तु मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के निकट या निमित्त रखना भी पाप है।
यदि @ShriRamTeerth श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ न्यास ऐसा निर्णय करे तो करोड़ों हिन्दू श्रद्धालु अति प्रसन्न होंगे।
गर्भ गृह क्या म्यूजियम होता है? मंदिर एग्जीबिशन होता है ?
मंदिर में हर कोई अपनी अपनी श्रद्धानुसार दान करता है, भौतिक जगत में उसके मूल्य में सौ, हजार, लाख, करोड़, अरब का अंतर हो सकता है, लेकिन मंदिर के देव के लिए तो सबका दान एक ही श्रेणी में होता है ना!
क्योंकि हर किसी का दान उसकी क्षमतानुसार होता है। खरब पती द्वारा दान किये गए 5 किलो सोने और मजदूर द्वारा चढ़ाये पुष्प, दौनों का भक्ति भाव तो बिलकुल बराबर ही होता है।
किसी भक्त द्वारा चढ़ाये गए पुष्प जब सुबह से शाम तक गर्भ गृह से हटा दिए जाते हैं। तो धनिक ये अपेक्षा क्यों करे कि उसके द्वारा चढ़ाये सौने के हार, चांदी के कागभूषण्ड, सोने चांदी की चरण पादुका, रामचरितमानस गर्भ गृह में स्थायी रूप से सजा दी जाएं ??
बड़े दानदाताओं का श्वान विलाप व्यर्थ है कि उनके द्वारा दी गयी वस्तुएँ गर्भ गृह में क्यों नहीं है।
मंदिर वालों ने कीमती उपहार मांगे तो थे नहीं, ये तो मंदिर के प्रबंधन और पुजारीयों के ऊपर निर्भर है कि दान और चढ़ावे की वस्तुओं का उपयोग कहां और कैसे करें! आखिर मंदिर और गर्भगृह कोई म्यूजियम कबाड़खाना नहीं है कि सब वस्तुएं वहीं भर दी जाएं।
वहां भगवान श्री रामलला विराजमान के दर्शन करने हैं या इन औनी पौनी चीजों के ?
तिरुपति और पद्मनाभस्वामी मंदिर का सारा खजाना क्या गर्भगृह में रखा रहता है कि हर कोई हर समय देखता रहे उन्हें ?
वह मंदिर है कि संग्रहालय? गृहसचिव की चैट पढ़ें, हर रोज मंदिर को कह रहे हैं मेरी रामचरितमानस यहां रखो, वहां रखो, इतने दिन उधर रखो, यहां दिख नहीं रही, कहाँ रख दी, अलमारी के पीछे छिप रही है! और न जाने क्या क्या। जबकि इन्हें कहा गया था कि 8 दिन नवरात्रि में पूजित होगी मंदिर में फिर लॉकर में रहेगी। जो हुआ भी, अनेक महीनों तक दर्शन के लिए रखी गयी।
पर क्या हर चीज ऐसे सजाकर रख दी जा सकती है?
हर रोज हर दानदाता ऐसे मंदिर को फोन करता रहे कि मेरी चीज इधर रखो, उधर रखो तो मन्दिर व्यवस्था का क्या होगा ?
देश के किसी भी मंदिर में ऐसा नहीं होता है।
किसी भी मंदिर में दानदाता का ऐसा स्वार्थी लोभी व्यवहार कोई नहीं मान सकता।
अधिकारी हो गए तो राजा हो गए ?
मंदिर 500 साल संघर्ष से श्रीरामलला की सेवा पूजा के लिए बना था या हर किसी के दान की निजी प्रदर्शनी लगाने के लिए।
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चढ़ावा चोरी कोई अनोखी घटना नहीं थी। ये कैश गणना वालों की ऐसी लोभ वृत्ति थी जो अनेक जगह होती रहती है। वह पकड़ी गई, रिकवरी हुई, कड़ी कार्यवाही हुई, मामला इतना ही था।
पर घमंडी दान दाताओं ने ना केवल व्यर्थ में ही राममंदिर को बदनाम कर दिया वरन सम्पूर्ण हिन्दू समाज की व्यवस्था और ढांचे पर ही प्रश्न खड़े कर दिए। अपने दो कौड़ी के स्वार्थी दान के लिए पूरे विश्व में हिंदुओं और मन्दिर को बदनाम किया। केवल अपने निजी घमण्ड की तुष्टि के लिए। जैसे इन्होंने मन्दिर को कुछ रुपयों में खरीद लिया हो।
पता नहीं इसके लिए भगवान राम इन पापी कपटी दान दाताओं और इनको प्रचार देने वाले टीवी पत्रकार, यूट्यूबर्स और फेसबुकियों को क्षमा कर पाएंगे या कि नहीं!
― @Girdharilalgoyl@VHPDigital@ChampatRaiVHP@vinod_bansal@VijayVst0502@AlokKumarLIVE@chidswami@irakeshpanday@Vhpinnews@vhpsocialmedia@ivivekbansal@Abhishek_Mshra@meashishmishra@shriramteerth@sanjeev_vhp@Vipul_ban@MuditUpdates
@OfficialGescom In Swastik Nagar, Near Khadge Petrol Pump electricity supply is not there since 4 AM. Incidence of no electricity supply for 7-8 hour has happened 2 times in last 15 days. Pathetic approach of working.
स्टेज पर जाकर गाली देना कूल नहीं है।
ड्रग्स को लेकर ऐसे दिखाना कि ड्रग लेने से काफ़ी मज़ा आता है, ये कूल नहीं है।
बस आपकी माताजी ही प्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं हैं, हर माँ अपने बच्चे को उतना ही प्यार करती है, जितना आपकी माँ आपको करती हैं।
आप इमोशनल और विक्टिम कार्ड ज़रूर खेल सकते हैं। उससे व्यूज़ और पैसे भी कमा सकते हैं, लेकिन उससे वो गंदगी नहीं धुलेगी जो कंटेंट के नाम पर आप जैसे लोग समाज में फैला रहे हैं।
और मुझ पर यकीन न हो, तो अपने घर में ही पूछिएगा कि जो सवाल आपके शो में आपके गेस्ट पूछते हैं, उनका जवाब आपके घर वाले देने में कितने सहज होंगे।
आप ये दिखाते हैं कि ड्रग्स एकदम आम दिनचर्या का हिस्सा है।
बच्चों को लगता है कि इतने बड़े-बड़े सेलिब्रिटी लेते हैं, ये आम है। सब लेते हैं।
आप तो यूट्यूब पर व्यूज़ लेकर पैसे कमा लेते हो,
वो बच्चे रह जाते हैं ड्रग्स के चंगुल में।
और कोई 10–12 बच्चे नहीं, लाखों-करोड़ों की संख्या में।
ऐसा नहीं है कि ऐसे स्टैंडअप कॉमेडियन्स के आने से पहले ड्रग का कल्चर नहीं था।
था, लेकिन आपने और सिनेमा वालों ने उसे सोशल रिकग्निशन दे दिया।
आप लोग आते हैं, कुछ जोक्स करते हैं कि कितना मज़ा आ गया ड्रग्स लेकर, गंदी गालियाँ देकर।
लोग वहाँ हँसते हैं, चले जाते हैं।
आप टिकट और व्यूज़ से पैसे कमाकर निकल जाते हैं,
और फँसे रह जाते हैं कच्ची उम्र के लाखों बच्चे, जो उसे सच मान लेते हैं,
जिन्हें लगता है यही दुनिया है, यही तो असल कूलनेस है।
और चले जाते हैं ऐसे व्यूह में, जिसमें फँसकर करोड़ों बच्चे और उनका परिवार बर्बाद हो रहा है।
आप हज़ारों तर्क दे सकते हैं, इस चीज़ की ज़िम्मेदारी एजेंसियों पर डाल सकते हैं,
लेकिन आपकी ज़िम्मेदारी क्या है?
आपकी ज़िम्मेदारी शून्य है, क्योंकि आप बस समाज के वो पैरासाइट हैं, जो पैसे कमाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
कन्फ्यूशियस ने एक बार चेतावनी दी थी:
"बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहना, हैरानी की बात है कि उन्हें आपसे दूर कर सकता है!"
यह कहानी ढाई हजार साल पुरानी है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे यह आज के दौर, हमारे माता-पिता और हमारी औलाद के लिए ही लिखी गई हो !
यह किस्सा ली वेई नाम के एक बूढ़े आदमी का है, जो महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस के पास एक सवाल लेकर गया, जो आज भी बहुत से बुज़ुर्गों को परेशान करता है:
"अपनी पूरी ज़िंदगी औलाद के लिए लगा देने के बाद भी, हम बुढ़ापे में खुद को अकेला क्यों महसूस करते हैं ?"
वह प्याला जो कभी नहीं भरता...
ली वेई कोई बुरा पिता नहीं था ! बल्कि उसने अपनी औलाद के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया ! उसने बहुत मेहनत की ताकि उन्हें कभी किसी चीज़ की कमी न हो ! जब बच्चे बड़े हो गए, अपने घर बसा लिए और अपनी ज़िंदगी जीने लगे, तो ली वेई ने सोचा अब आराम का समय है ! उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के पास रहने चला गया, यह सोचकर कि अब वह प्यार और अपनापन पाएगा !
लेकिन उसे वह खुशी नहीं मिली जिसकी उसे उम्मीद थी ! घर भरा हुआ था, लेकिन उसका दिल खाली था !
सब लोग दिन भर व्यस्त रहते, शाम को थक कर आते और सुकून चाहते ! वे उसकी बातें आधे मन से सुनते, उसके सुझावों से चिढ़ जाते और उसकी मौजूदगी को बोझ समझने लगे !
वह जितना करीब आने की कोशिश करता, वे उतना ही दूर होते गए !
ली वेई ने कन्फ्यूशियस से कहा:
"गुरुजी! मैंने अपनी ज़िंदगी बच्चों के लिए दे दी ! सोचा था उनके साथ रहकर सुकून मिलेगा, लेकिन मैं खुद को उनके बीच नापसंद महसूस करता हूँ ! ऐसा क्यों ?"
कन्फ्यूशियस ने उसे तीन आसान सबक़ सिखाए !
पहला सबक: पानी का बर्तन
उन्होंने एक बर्तन को पानी से भर दिया और पूछा:
"अगर इसमें और पानी डालूँ तो क्या होगा ?"
ली वेई ने कहा: "यह छलक जाएगा!"
कन्फ्यूशियस बोले:
"बिल्कुल, रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं ! जब हम खुद को ज़बरदस्ती किसी ऐसी जगह डालते हैं जो पहले से भरी हो, तो संतुलन बिगड़ जाता है ! तुम अपने बच्चों के घर में फिर से केंद्र बनना चाहते हो, लेकिन अब उनकी ज़िंदगी और उनके बच्चे ही उनका केंद्र हैं !"
दूसरा सबक: दो पेड़
उन्होंने पास के दो पेड़ों की ओर इशारा किया !
"जब पेड़ बहुत पास-पास होते हैं तो क्या होता है ?"
ली वेई ने कहा: "वे एक-दूसरे को रोकते हैं और कमजोर हो जाते हैं!"
कन्फ्यूशियस ने कहा:
"ज़िंदगी में भी यही होता है ! ज़्यादा नज़दीकी भी समस्या बन जाती है ! बढ़ने के लिए जगह ज़रूरी है!"
तीसरा सबक: मुट्ठी भर रेत
कन्फ्यूशियस ने रेत को कसकर मुट्ठी में पकड़ा !
"अब क्या होगा ?"
ली वेई ने कहा: "रेत फिसल जाएगी!"
कन्फ्यूशियस बोले:
"रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं ! प्यार दबाव से नहीं टिकता ! जितना तुम पकड़ने की कोशिश करोगे, वह उतना दूर जाएगा ! आज़ादी दो, तो वह खुद तुम्हारे पास रहेगा!"
कन्फ्यूशियस ने पूछा:
"जब तुम पेड़ लगाते हो, क्या यह सोचते हो कि वह तुम्हें छाया देगा ?"
ली वेई ने कहा: "नहीं, मैं उसे बढ़ने के लिए लगाता हूँ ! छाया तो एक तोहफा होती है!"
कन्फ्यूशियस ने कहा:
"तो अपनी औलाद से अलग उम्मीद क्यों रखते हो ? तुमने उन्हें अपने लिए नहीं, दुनिया के लिए पाला है!"
ली वेई को सच्चाई समझ आ गई !
कन्फ्यूशियस ने कहा:
"अभी भी तुम नई शुरुआत कर सकते हो ! प्यार मांगो मत, बल्कि ऐसा काम करो जिससे तुम्हें खुशी मिले!"
ली वेई अपने शहर वापस गया, एक छोटा सा घर लिया और बच्चों की मदद करने लगा ! वह कहानियाँ सुनाता, पेड़ लगाता और लोगों के काम आता ! लोग उसे "मास्टर ली" कहने लगे !
वह जितना कम दबाव डालता, लोग उसे उतना ही ज़्यादा मान देते !
वह जितनी कम ध्यान की मांग करता, उसे उतना ही सच्चा प्यार मिलता !
एक दिन उसे अपने बेटे का खत मिला:
"बाबा, हमें आपकी याद आती है ! बच्चे आपके बारे में पूछते हैं ! आइए, हमारे साथ कुछ समय बिताइए!"
जब ली वेई वहाँ पहुँचा, तो उसका गर्मजोशी से स्वागत हुआ ! उसे पहली बार लगा कि वह बोझ नहीं, बल्कि एक प्यारा मेहमान है !
उसे समझ आ गया:
जब उसने प्यार की उम्मीद करना छोड़ दी, तो प्यार खुद उसके पास आ गया !
बुढ़ापे में औलाद के साथ रहना माँ बाप से ज़्यादा औलाद की ख़ुशनसीबी है, लेकिन सच्ची नज़दीकी आज़ादी से आती है, ज़बरदस्ती से नहीं !
जब हम रिश्तों पर दबाव डालते हैं, तो वे कमजोर हो जाते हैं !
जब हम आज़ादी देते हैं, तो लोग हमें दिल से चुनते हैं !
PRIVATE HOSPITAL - INSURANCE COMPANY LOOT 🚨
एक तरफ़ अस्पताल आपकी insurance policy के हिसाब से मोटा बिल बनाता है, वहीं insurance कंपनी बिना कारण Claim reject कर देती हैं। अस्पताल Dead Body तक नहीं देता, लोग अस्पताल के बाहर घर के गहने लेके खड़े होते हैं।
इस Hospital- Insurance Company के Nexus के बीच आम इंसान टेनिस बॉल बन जाता है। Ads में बड़े बड़े celebrity को लेते हैं और दिखाते हैं Claim लेना कितना आसान है, जबकि असलियत में लोगों की चप्पल घिस जाती है अपना ही पैसा लेते लेते।
आज संसद में इस शर्मनाक दुखद सच्चाई
को रखा…
"My name's Hank. I'm 66. I deliver propane to homes. Rural routes, farms, folks off the grid. I fill their tanks, check connections, drive to the next house. Most customers just sign the slip, barely look up. I'm just the propane guy.
But last February, during that brutal cold snap, I noticed something at the Miller place.
Pulled up to fill their tank, gauge showed empty. Completely dry. In 15-degree weather.
I knocked on the door. Mrs. Miller answered, three kids bundled behind her in coats. Inside the house.
"Ma'am, your tank's bone dry. How long you been without heat?"
"Four days." Her voice was steady, but her hands shook. "Bill's due Friday. We're waiting on my husband's paycheck."
Four days. Three kids. Fifteen degrees.
"Ma'am, I'm filling it now."
"I can't pay until"
"I'll mark it as a delivery error. Computer glitch. Nobody'll know."
She started crying. "Why would you do this?"
"Because those kids are wearing coats inside."
I filled their tank. Checked the furnace. Made sure heat kicked on before I left.
Drove away thinking about what I'd seen. Kids doing homework in winter jackets. A mom choosing between heat and food.
Started paying attention different after that. The elderly veteran whose tank was at 10%, he was rationing, keeping one room warm. The single dad whose payment was two weeks late, he'd been burning firewood he couldn't really afford.
I started doing something I shouldn't. When I saw someone struggling, someone who'd run out, someone rationing heat—I'd add 50 gallons. Mark it as "meter calibration" or "pressure test residual."
Small amounts. Enough to get them through.
Did it eleven times that winter. My boss noticed the discrepancies. Called me in.
"Hank, we're showing extra gallons delivered but not billed."
I told him the truth. Everything.
He stared at me for a long time. Then said, "My daughter was a single mom once. Chose between heat and groceries every winter. I wished someone had helped her."
He didn't fire me. Instead, he created something, "Warm Hearts Emergency Fund." Customers could donate. We'd match it. Use it for families in crisis who couldn't afford propane.
But here's what broke me, Mrs. Miller came to our office in May. She'd gotten a better job, caught up on bills.
She handed me an envelope. Inside, $200.
"For the next family. The one you'll find in February, four days without heat, trying to be brave for their kids."
She grabbed my hands. "Hank, my youngest has asthma. Four more days in that cold... I don't know if..." She couldn't finish.
Last winter, the Warm Hearts Fund helped 23 families. Not with handouts, with heat when they had none. With dignity when they felt broken.
And here's the thing, other propane companies heard about it. Started their own programs. Now there are "emergency heat funds" in six states.
But the moment that destroyed me happened last month. Got a call to deliver to an address I recognized, the Miller place.
Mrs. Miller answered. "Hank! Come in, please."
Inside, warm, kids doing homework at the table, laughing. She handed me a check. Full payment, plus extra.
"For the fund. But also..." She pulled out a drawing her youngest had made. Stick figure man with a propane truck. Caption in crayon: "Mr. Hank, my hero."
"She asks about you every winter. 'Is Mr. Hank making sure people are warm?'"
I'm 66. I deliver propane to houses nobody notices.
But I learned this- Cold doesn't wait for paychecks. And no child should do homework in a winter coat inside their own home.
So if you deliver anything, oil, propane, firewood, and you see someone struggling, someone empty, someone rationing,
Find a way. Mark it wrong. Call your boss. Start a fund. Do something.
Because heat isn't a luxury. It's survival.
And the difference between freezing and living shouldn't be whether your paycheck arrived on time.
Be the reason someone stays warm."
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Let this story reach more hearts....
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Ai image is for Demonstration purpose only
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Credit: Mary Nelson
10,000 Steps in a day!
An Average Adult living in a city walks 2,000-3,000 steps per day, mostly out of compulsion.
The more we move, the better it is for us.
And since walking is the only form of movement that is applicable to us today, the more we walk the better it is..
Every step counts.
Walking helps us correct posture, improve blood circulation and burns calories.
Every 1,000 steps you take, you burn around 25-50 kcal basis age,body weight and pace.
And if weight loss is the goal, walking 7,000-10,000 steps per day, can contribute to an extra 200-600 calories burnt per day which is significant.
1)Best is to accumulate steps throughout the day. A few mins of walking at different points of time throughout the day will give you a better chance of walking more and sustaining the effort.
2)Be greedy for movement.
Just walking more enough, mentally hardwire yourself to start thinking like an active person.
An active person will look for every opportunity to move, at the airport, parking lot, neighborhood store, vegetable vendors.
If you see easy access, shun it.
Walking may not qualify as an exercise, but it’s an underrated activity which doesn’t need resources.
“Movement is Medicine”
Since the US has invaded so many countries should India stop buying US LNG, amongst other things.?
As the oldest democracy should the US continue to support a terror sponsoring Islamist state like Pakistan against the world’s largest democracy, India?
Trump has just announced investment in Pakistan’s “ massive oil reserves”.
What is the explanation for the world’s oldest democracy building its biggest trade partnership with a communist dictatorship like China instead of India, the world’s largest democracy?
Some introspection would be helpful. @RepDonBacon
Hon. PM Sri @narendramodi Ji will inaugurate the all important Yellow Line metro on August 10.
On behalf of all people of Bengaluru, I thank PM for always prioritising infrastructure development of our city.
This line will cater to close to 8L riders and the infamous Silk Board jam will be addressed greatly. Public transport is the only option to reduce traffic congestion.
P.S. We are meeting the August 15 deadline! It happened only because of PM’s personal insistence that this must be open to public without any further delay.
Here's my conversation with @narendramodi, Prime Minister of India.
It was one of the most moving & powerful conversations and experiences of my life.
This episode is fully dubbed into multiple languages including English and Hindi. It's also available in the original (mix of Hindi & English).
On X, I post the full English-dub version. See comment for more.
So the options are:
- Audio: English, Hindi, Original (Mixed), and more
- Subtitles: English, Hindi, and more
Timestamps:
0:00 - In this episode...
3:07 - Introduction
9:19 - Fasting
21:38 - Early life
33:33 - Advice to Young People
39:16 - Journey in the Himalayas
50:45 - Becoming a monk
52:33 - RSS and Hindu nationalism
1:00:17 - Explaining India
1:04:27 - Mahatma Gandhi
1:16:23 - Path to peace in Ukraine
1:19:37 - India and Pakistan
1:25:16 - Cricket and Football
1:29:41 - Donald Trump
1:40:51 - China and Xi Jinping
1:47:56 - Gujarat riots in 2002
2:03:33 - Biggest democracy in the world
2:13:48 - Power
2:18:34 - Hard work
2:21:42 - Srinivasa Ramanujan
2:23:48 - Decision-making process
2:31:35 - AI
2:41:50 - Education
2:52:06 - Learning and focus
2:57:56 - Mantra
2:59:41 - Meditation
3:05:38 - Lex visiting India
3:10:04 - Siddhartha
Dear well-wishers,
Sivasri & I are eagerly looking forward to see you all at our wedding reception tomorrow.
However, we have a request.
- In the 1 crore+ weddings that take place annually in India, 85% of wedding flowers & bouquets are discarded within 24 hours after the event.
- And 300,000 kg of dry fruits from weddings are left behind annually.
The potential charity value of such bouquets and dry fruits stands at ₹315 crore annually.
With this in mind, we request you to please avoid bringing floral bouquets or dry fruits on this occasion.
Special arrangements have also been made for the easy access of senior citizens & Divyang.
We look forward to receiving your wholesome blessings tomorrow from 11 am at Vruksha, Palace Grounds, Bengaluru.
आज मेरे पिता जी का जन्मदिन है। वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने हमेशा मुझे सही मार्ग पर चलाया है।
2016 में, तनाव के कारण मेरा रक्तचाप बहुत बढ़ गया और मुझे आईसीयू में भर्ती होना पड़ा। वे मेरे कमरे में आए और मुझसे कहा, “बेटा, तुमने बहुत कुछ हासिल कर लिया है और तुमने खुद को साबित भी कर दिया है। तुम्हें अब किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है। बहुत से लोग हैं जिन्हें तुम्हारी मदद की जरूरत है। जब वे तुम्हारे पास आएं, तो कम से कम उनकी बात सुनो और यदि संभव हो, तो उनकी समस्या हल करने की कोशिश करो। जो भी तुम्हारे वश में हो, उतना करो और संतुष्ट रहो।”
मेरे पिता ने मुझे आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और आज भी मैं उनके शब्दों का अनुसरण करता हूँ। जब भी कोई मुझसे सलाह या मदद मांगता है, मैं अपनी क्षमता के अनुसार पूरी कोशिश करता हूँ।
धन, सत्ता—इनका कोई महत्व नहीं है। असली महत्व इस बात का है कि आपकी इच्छा कितनी प्रबल है किसी की मदद करने और उनमें बदलाव लाने की।
मेरे पिता एक महान आत्मा थे और शिरडी साईं बाबा के परम भक्त थे। मैं खुश हूँ कि इस वर्ष मैंने उनका सपना पूरा किया और श्रीरामपुरम में एक मंदिर बनवाया।
हर सुबह मेरे पिता का फोन आता था, और उनका बस एक ही सवाल होता था—“क्या तुमने नाश्ता किया?”
उन्होंने जो संस्कार मुझमें डाले हैं, उसके लिए मैं हमेशा उनका ऋणी रहूँगा और उनके दिखाए मार्ग पर चलता रहूँगा।
कुछ दिन पहले जब मैं वंचित समुदायों के पक्ष में बोलने गया, तो मेरे अंदर भय का एक भाव आया। लेकिन तब मुझे मेरे पिता के शब्द याद आए—“ईश्वर तुम्हें रास्ता दिखाएगा। बस आगे बढ़ते रहो…”
वे हमेशा कहते थे—“भगवान तुम्हारे साथ है।”
#जीतो_प्रतिदिन
यदि आप या आपके परिवार में कोई 50+ आयु के हैं और उन्हें मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज की परेशानी है तो यहां पढ़ें कि मैंने इन परेशानियों से कैसे छुटकारा पाया। चलिए मेरे साथ अपनी फिटनेस जर्नी शुरू कीजिए।
मेरा वजन 105 किलो था, बहुत सालों से बीपी की दवाई लेता था और 6 के HBA1C के साथ डायबिटीज के मुहाने पर खड़ा था।
अब मेरा बीपी नॉर्मल है, वजन 84 किलो है और HBA1C 5.2 है।
यहां कुछ प्वाइंट बता रहे हैं जिससे यदि आप भी फिटनेस जर्नी शुरू कर रहे हैं तो जान सकें कि कैसी बाधाएं आ सकती हैं। साथ ही बताएंगे कि कैसे इन बाधाओं से बचना है।
1. सही जानकारी जुटाना : फिटनेस से जुड़ी जितनी भी बातें इंटरनेट पर उपलब्ध हैं जरूरी नहीं कि वह सब ठीक ही होगी कई बार सूचनाएं गलत भी होती हैं। शुरू में मेरे 6 महीने सिर्फ इस कारण खराब हुए की कुछ यूट्यूब चैनल पर विश्वास करके मैं यह समझने लगा था कि चीनी की जगह पर गुड़ खाने या प्रतिदिन अपने खाने में सब्जियों का सूप शामिल करने से मोटापा कम हो जाएगा। इसलिए सही जानकारी प्राप्त करना बहुत आवश्यक है। शुरू में चीजों को समझने में भी समय लगता है और जब आपको पता चलता है कि क्या करने से कैसा रिजल्ट आ रहा है तो आप सही और गलत जानकारी में अंतर करना समझ जाते हैं।
2. लोगों की बातें : बहुत लोग आपको ऐसी बातें कहेंगे जिससे कि आपको निराश होने लगेगी अधिकतर ऐसी बातें परिवार रिश्तेदारी के लोग और ऑफिस के साथी करते मिलेंगे। हो सकता है कोई आपका मजाक भी उड़ाने लगे या यह भी कहे कि आप सब कुछ गलत कर रहे हो। आपको ऐसी बातों को हंस के टालना है किंतु सही जानकारी विश्वसनीय स्रोत से लेकर अपनी जर्नी पर बढ़ते जाना है।
3. शारीरिक क्षमता : व्यायाम या दौड़ सैर करने पर शुरू में आपका शरीर आपका साथ नहीं भी दे सकता है। कम कदमों से शुरू करें। शुरू में 5 से 8 हजार कदम रोज चलें। धीरे धीरे बढ़ाते चलें। मैं अभी 15 से 20 हजार कदम सप्ताह में 6 दिन चलता हूं।
4. मानसिक क्षमता : यदि आप सुबह-सुबह सैर पर निकल रहे हैं तो दो चेलेंज होते हैं एक तो सुबह उठना और दूसरा सैर पर निकलना। बस आलस ही तो छोड़ना है। आलस आ गया तो फिर आपने उद्देश्य में कैसे सफल होंगे? लक्ष्य कैसे प्राप्त करेंगे?
5. रिजल्ट ना मिलना : कई बार ऐसा होगा कि लगेगा की इतनी मेहनत करने और डाइटिंग करने का कष्ट देने के बावजूद वह रिजल्ट नहीं मिल रहे हैं। यहां आपको जिद्दी होना पड़ेगा हो सकता है की व्यायाम की सैर या दौड़ की अवधि बढ़ा दे या अपनी डाइट को एक बार फिर से चेक करें कि पौष्टिक तत्व लेते हुए भी कैसे कुछ और कैलरी कम की जा सकती हैं।
6. निरंतरता में कमी : अपने व्यायाम या सैर पर निरंतर निकालना बेहतर रिजल्ट देता है जब भी ऐसा हुआ कि मैंने माह में 10 से 15 दिन रेस्ट कर लिया तो उस महीने अच्छा रिजल्ट नहीं मिला किंतु जब माह में 25 से 28 दिन तक भी सैर पर गया तो उस महीने अच्छे रिजल्ट मिले।
7. वास्तविक बाधाएं : कई बार वास्तविक बाधाएं भी आती हैं। मौसम खराब होता है, बहुत प्रदूषण होता है, तबीयत खराब हो सकती है या कोई वस्तता हो सकती है। ऐसी वास्तविक बाधाओं का कोई इलाज नहीं होता है ऐसे में हम मौसम या प्रदूषण के ठीक होने का इंतजार ही कर सकते हैं या घर के भीतर या जिम में ट्रेडमिल पर ही जितना हो सके व्यायाम या सैर कर सकते हैं।
8. पारिवारिक सहयोग : फिटनेस जर्नी में परिवार का सहयोग बहुत जरूरी है इसके बिना आप कभी सफल नहीं हो सकते। यदि सहयोग न मिले तो आप बैठकर बात कर सकते हैं और परिवार को समझा सकते हैं कि यह सब आपके लिए कितना आवश्यक है और वह बहुत आसानी से इसे समझ भी जाते हैं।
9. खान पान : खानपान में बदलावों को लागू करना थोड़ा कठिन हो सकता है। घर में जब बाजार का खाना जंक फूड या स्नैक्स वगैरा होते हैं तो उन पर नियंत्रण कर पाना कठिन हो जाता है इस बात का ख्याल रखें कि घर में सॉफ्ट ड्रिंक अधिक कैलरी वाले ड्रिंक और बिस्किट स्नैक्स ना ही हों तो अच्छा है और यदि हो तो सीमित मात्रा में हो और कम से कम सामने तो ना दिखते हों। यदि परिवार में खाना उसे तरह से नहीं बन रहा जैसा की आप अपनी डाइट में रखना चाहते हैं तो खुद खाना बनाना भी सीख सकते हैं।
अंत में संक्षेप में :
इस उम्र में रिजल्ट पाना चाहते हैं तो
आलस छोड़ो
जिद्दी बनो
निरंतर प्रयास करो
बाधाओं से मत घबराओ
#जीतो_प्रतिदिन