मुझे कई दोपहरी याद है. जब मां बिस्तर पर पेट के बल लेटकर, दोनों पांव पीछे मोड़कर हवा में हिलाते हुए कोई हिंदी की किताब पढ़ती. एक एक अक्षर पर उंगली रखकर धीरे धीरे शब्दों का उच्चारण करते, कहानी पढ़ते. मां को वैसे बस मैंने देखा है, बस मैंने.
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मुझे याद है एक बार, बस एक बार ऐसे ही मौके पर मां ने पेन फेंक दिया और फॉर्म फाड़कर चौके में चली गई. मुझे लगा, वो पापा के झल्लाने पर गुस्सा हुई है. मैं गलत थी. मां गुस्सा नहीं थी, वो दरअसल झेंप रही थी. उसको बुरा लगा था, खुद पर खीझ हुई थी कि क्यों वो सही दस्तखत नहीं कर पाई है.
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मां को बस तब पेन उठाते देखा, जब बैंक, पोस्टऑफिस का काम होता. पापा फॉर्म लाते, मां से साइन करने कहते. मां कोई बहाना बनाती. उनके सामने साइन नहीं करती. इसलिए कि सालों महीनों बाद उसको साइन करने बल्कि कुछ लिखने का मौका मिलता था. उसके सिग्नेचर हर बार अलग हो जाते. पापा झल्लाते थे.
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मां लड़की थी और लड़की को पढ़ाना किसी को ज़रूरी नहीं लगा. सो मां को बस चौथी तक पढ़ने की इजाजत मिली. नाना-नानी को सबसे ज़रूरी लगा बिटिया ब्याहना. तो मां छुटपन में, करीब 15-16 बरस में ब्याह दी गई.
ससुराल में किसी को क्यों होती परवाह कि उसको पढ़ाएं.
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यहां तक कि वाजपेयी ने भी 2004 में मुम्बई अधिवेशन में अपना उत्तराधिकारी प्रमोद महाजन को बनाया था। जबकि चंद्रशेखर जी को जेपी 1977 में ही प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।
फिर भी मीडिया के लिए चंद्रशेखर जी तथाकथित बाबूसाहब व अन्य सभी नेता सामाजिक न्याय के मसीहा है।
#ChandraShekharSingh
जबकि तथाकथित बाबूसाहब चंद्रशेखर जी ने अपने जीवनकाल में अपने बेटों को लोकसभा,विधानसभा का टिकट तक नही दिया।अपनी पार्टी में अपने बेटों को कोई पद नही दिया।उन्हें मंच पर स्थान नही दिया। चंद्रशेखर ने अपने कार्यकर्ताओं, समर्थकों को अपना उत्तराधिकारी बनाया।
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जबकि चंद्रशेखर जी के अलावा उपरोक्त सभी तथाकथित सामाजिक न्याय के चैंपियनों, तथाकथित महान समाजवादियों ने अपना उतराधिकारी अपनी जाति के लोगों को तो छोड़िये, अपने बेटे बेटियों को बनाया।
किसी कार्यकर्ता को इन महान समाजवादियों ने अपना उत्तराधिकारी नही बनाया।
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भारतीय मीडिया के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी बाबू साहेब हैं। उसी मीडिया के अनुसार नेहरू जी गांधीवादी समाजवादी है। चौधरी चरण सिंह एक किसान नेता है।,लालू यादव गरीबों के मसीहा व सामाजिक न्याय के मसीहा है।
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