Game of thrones का एक डायलॉग है
उसने कभी तुम्हे मूर्ख नहीं बनाया
तुम्हे पता था वो exactly कौन है, कैसा व्यवहार है उसका
फिर भी तुम उसे प्यार किए
और जब अंजाम सामने आ गया तो तुम उसे गाली देने लगे,
जब पता है ये कुत्ता काटता है तो फिर क्यों उसके पास बेफिक्र होकर गुजरना है🤔
देर रात
धीमे से डरावने सच भी
बताये जा सकते हैं-
इसलिए बता रहा हूँ-
कि
कुछ मरुस्थलों में कभी नहीं होगी बारिश,
समुन्दर हरदम खारे ही रहेंगे,
और
कुछ ज़ख्म कभी नहीं भर पाएंगे।।
🔹 फफूँद
(आर्ट : ज़ोया)
रात लिखी ये कविता
तुम्हें सुबह ओस में मिले।
टटोलो जब तुम घाव अपने
ये तुम्हें अपने हर दोष में मिले।
न ढूंढ पाओगे कि कहाँ खत्म होता है ये पहाड़,
तुम घर बैठो और ये तुम्हें अपने पड़ोस में मिले।
1/2
प्रेम में अगर कुछ बचता है तो सम्मान बचे रहना चाहिए। अगर कुछ मरना चाहिए तो अहंकार मरना चाहिए। अगर कुछ दफन होना चाहिए तो निजी बातें दफन होनी चाहिए। हो सकता है आपका लगाव खत्म हो जाए, लेकिन प्रेम और प्रेमी की गरिमा खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं मिलना चाहिए।
मैं खड़ा बीच मझधार किनारे क्या कर लेंगे
मैने छोड़ी पतवार सहारे क्या कर लेंगे
तुम क़िस्मत-क़िस्मत करो जियो याचक बन कर
मैं चला क्षितिज के पार सितारे क्या कर लेंगे
तुम दिखलाते हो राह मुझे मंजिल की,
मैं आँखों से लाचार इशारे क्या कर लेंगे
हम ने जो कुछ भी कहा वही कर बैठे
जो सोचें सौ-सौ बार बेचारे क्या कर लेंगे
ना समझ कहोगे तुम मुझको मालूम है
ये फ़तवे हैं बेकार तुम्हारे क्या कर लेंगे
अमिताभ त्रिपाठी 'अमित'
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ईश्वर तुम
कैसे समेटते हो
इतनी राख ?
कैसे सहते हो
कोमल सपनो से भरे
हृत्पिंडों के जलने का
दुर्गन्ध !
या
अपनी किसी
अयोग्य कलाकृति
की तरह
इस धरती को
कर चुके हो
बहिष्कृत ?
- सुनीता सिंह
अक्सर हम किसी व्यक्ति के बारे में सोचते-सोचते यह मान लेते हैं कि उलझन उसकी वजह से है। सच यह है कि उलझन हमारी अपेक्षाओं से है। सामने वाला कुछ कहे तो मन अर्थ निकालता है। कुछ न कहे, तो भी मन अर्थ गढ़ लेता है। मन खाली जगहों को कहां सहन कर पाता है, वह तो उन्हें कल्पनाओ से भर देता है।
कोई सागर नहीं है अकेलापन
न वन है
एक मन है अकेलापन
जिसे समझा जा सकता है
आर-पार जाया जा सकता है जिसके
दिन में सौ बार
कोई सागर नहीं है
न वन है
बल्कि एक मन है
हमारा तुम्हारा सबका अकेलापन!
भवानीप्रसाद मिश्र
मैं तो सदा से ही निर्बल व्यक्ति रहा हूं। चलो, तुम्हारी यह बात भी मान लेता हूं कि मन की स्थितियां बदलती रहती है और इनके साथ निर्णय भी। परन्तु एक प्रश्न आज भी मेरे भीतर अनुत्तरित है यदि परिवर्तन ही प्राकृति का शाश्वत नियम है तो मैं क्यों नहीं बदला?
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