कभी लौटना मत,
अगर ठहरना न हो।
कुछ रास्ते एक ही बार तय किए जाएँ,
तो बेहतर होते हैं।
जो लौटकर भी फिर बिछड़ जाएँ,
वे स्मृतियों में शोर छोड़ जाते हैं।
अधूरी उपस्थिति से बेहतर है,
एक संपूर्ण अनुपस्थिति।
जो लोग रुक गए घर का कोई ज़रूरी काम करने में रोते हुए बच्चे को गोद उठाने में सूख रहे पौधे को पानी देने में
जो रुक गए किसी अपरिचित आवाज़ के पुकारने पर किसी के दुःख बाँटने के लिए किसी उदास आदमी को सुनने के लिए किसी अपरिचित के ख़त का जवाब लिखने के लिए
और वे लोग जिन्होंने दुनिया बचाना भागने से ज्यादा जरूरी समझा वे लोग हो सकते थे इस दुनिया के सबसे तेज़ धावक और जीत सकते थे यह पूरी दुनिया।
13 WINNING MINDSETS YOU NEED TO MASTER
1. They stop waiting
2. They focus on progress
3. They discipline themselves
4. They learn from failure
5. They keep their promises
6. They stop comparing
7. They turn problems into opportunities
8. They stay focused
9. They choose growth over comfort
10. They take responsibility for their lives
11. They let rejection redirect them
12. They protect their time
13. They keep going
रात के गहराते सन्नाटे में जब दुनिया थककर सो जाती है, तब एक लड़की किताबों को सिरहाने रखकर उनींदी आँखों से शब्दों की टहनियों पर झूल रही होती है। उसके लिए किताबें तकिए से ज्यादा आरामदायक हैं, क्योंकि वो जानती है हर पन्ना किसी अनकही दास्तान का घर है, हर शब्द किसी बीते एहसास का दस्तावेज़।
वो लड़की कोई आम लड़की नहीं बल्कि वो तो साहित्य में समाहित है, जैसे भोर की पहली किरण जो रात की स्याही को सोखकर नई सुबह रचती है। उसकी रगों में स्याही बहती है, उसके दिल की धड़कनों में कहानियों की लय बसी है। वो प्रेम को सिर्फ महसूस नहीं करती, बल्कि उसे शब्दों में ढालकर अमर कर देती है। विरह उसके लिए बस एक भावना नहीं, बल्कि एक पूरी कविता है। जिसमें आँसुओं की स्याही से भावनाओं की इबारत लिखी जाती है।
जब पूरी दुनिया सोती है, वो कल्पनाओं के देश में विचरती है। उसके ख्यालों में प्रेमचंद की सजीवता, ग़ालिब की शायरी, निराला की क्रांति और महादेवी का दर्द बसा होता है। वो कभी पृष्ठों में प्रेम ढूँढती है, कभी संघर्ष, कभी कोई भूली-बिसरी कहानी, तो कभी कोई ऐसा किरदार जो उसकी आत्मा का हिस्सा लगने लगे।
उसे किताबों से इश्क़ है, क्योंकि यही वो साथी हैं जो उसके सवालों का जवाब बनते हैं, उसकी खामोशी में बोलते हैं और उसकी तन्हाइयों को आबाद कर देते हैं। उसके लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत आवाज़ पन्नों की सरसराहट है और सबसे प्यारी महक पुराने ग्रंथों के कागज़ों की गंध। वो शब्दों को पढ़ती ही नहीं, उन्हें जीती है, महसूस करती है और फिर उन पर अपनी आत्मा की मोहर लगा देती है।
वो भोर-सी लड़की,जो साहित्य में समाहित है! जिसके लिए किताबें सिर्फ ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का संबल हैं। जिसके लिए शब्द केवल अक्षर नहीं, बल्कि आत्मा का संगीत हैं। वो लड़की जो अपने सिरहाने किताबें रखकर सोती नहीं, बल्कि हर रात किसी नई कहानी के जन्म का स्वप्न देखती है। उसकी दुनिया असल में वही है, जो कागज़ के इन पन्नों में साँस लेती है। जहाँ हर अक्षर उसकी पहचान बन जाता है और हर किताब उसके अस्तित्व का एक नया अध्याय..!❤️
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
मेरा अकेलापन कोई नहीं भर सकता, किसी के आने से या साथ होने से भी उसके आकर पर कोई अंतर नहीं आयेगा...ये भीतर का खालीपन है, बाहरी नहीं जो कोई आकर भर दे...!!!
मैं प्रेम में अभागा पुरुष हूँ
ये स्वीकार कोई शिकायत नहीं,
बस आत्मा की वो सच्चाई है
जिसे छुपाकर जीना अब संभव नहीं रहा।
मैंने चाहा तुम्हें
उस तरह जैसे सूखी ज़मीन
पहली बारिश को चाहती है
पूरे अस्तित्व से,
बिना ये पूछे
कि बदले में कुछ मिलेगा भी या नहीं।
मेरे हिस्से में प्रेम
हमेशा इंतज़ार बनकर आया,
तुम्हारे आने से पहले का समय
और न आ पाने के बाद की खामोशी।
मैंने हर बार
तुम्हारे मौन को भी
तुम्हारी मजबूरी समझा,
और अपने टूटने को
संयम का नाम दे दिया।
मैंने तुम्हें पाया नहीं,
पर हर रोज़ खोया है।
तुम मेरे साथ नहीं थीं,
फिर भी
मेरे हर फैसले में
तुम्हारी परछाईं शामिल रही।
मैं हँसता रहा
उन लोगों के बीच
जिन्हें मेरा दर्द
कभी दिखा ही नहीं,
और रात में
खुद से हारकर
तकिए से बातें करता रहा।
तुम्हारे लिए
मैंने अपने पुरुष होने का
अहंकार नहीं,
अपनी ज़रूरतें छोड़ीं।
मैं रोया नहीं
क्योंकि मुझे सिखाया गया था
कि पुरुष का रोना
कमज़ोरी है।
मैं चिल्लाया नहीं
क्योंकि डर था
कहीं तुम्हारी दुनिया
मुझसे असहज न हो जाए।
मैंने प्रेम किया
पर अधिकार नहीं माँगा।
तुम्हें चाहा
पर बाँधा नहीं।
और बदले में
मुझे वही मिला
जो अक्सर
अभागे पुरुषों को मिलता है
एक तरफ़ा निष्ठा
और आजीवन खालीपन।
जब तुम किसी और के साथ
मुस्कुराईं,
मैंने नज़रें झुका लीं।
जब तुम्हारी खुशी
मेरे बिना पूरी हुई,
मैंने उसे भी
अपनी जीत मान लिया।
क्योंकि प्रेम में
अभागा पुरुष
अपनी हार को भी
तुम्हारी भलाई समझकर
सीने से लगा लेता है।
मुझे किसी ने नहीं पूछा
कि तुमसे बिछड़कर
मैं कैसे ज़िंदा हूँ।
सबने बस यही कहा
“समय सब ठीक कर देता है।”
कोई ये नहीं जानता
कि समय ने मुझे
ठीक नहीं किया,
बस आदत डाल दी है
दर्द के साथ
सांस लेने की।
आज भी
अगर तुम सामने आ जाओ,
तो मैं शिकायत नहीं करूँगा।
बस तुम्हें देखकर
थोड़ा चुप हो जाऊँगा।
क्योंकि अभागा पुरुष
प्रेम में
सब कुछ खोकर भी
इल्ज़ाम नहीं लगाता,
वो सिर्फ़
ख़ुद को
और गहरा अकेला कर लेता है।
हाँ,
मैं प्रेम में अभागा पुरुष हूँ
और शायद
इसीलिए
आज भी
सिर्फ़ तुम्हें ही चाहता हूँ। 💔
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
कभी किसी को अपने इतना करीब महसूस किया है कि उसके चले जाने के डर से नींद न आए? किसी को खोने से डरते हो? कभी ऐसा लगता है कि उसके बिना शायद तुम आगे का जीवन तो काट ही लोगे,पर जीवन के अंतिम पड़ाव पर कहीं न कहीं ये अफ़सोस रहेगा कि वो एक,जो चला गया,अगर वो साथ होता तो जिंदगी कुछ और ही होती...!
"कभी रामायण पढ़ना....
समझ आएगा कि,समाज सच के साथ भी खड़ा नहीं होता!!
"कभी महाभारत पढ़ना.....
समझ आएगा कि हर रिश्ता भरोसे के लायक नहीं होता"
"फिर जिंदगी जीना.....
समझ आएगा कि सबसे मुश्किल लड़ाई अपनों से नहीं, बल्कि अपनों के बदल जाने से होती है।
"जीवन की सच्चाई यही है"।
सितंबर साल का वो महीना है,जब लगता है जैसे सब कुछ फिर से ठीक हो गया हो शायद इसलिए हर साल इसी महीने कहीं घूमने निकल जाता हूँ कुछ दिन रोज़मर्रा की भागदौड़ से दूर,कुछ नए रास्ते,कुछ नए नज़ारे और खुद के साथ थोड़ा वक्त और लौटकर ऐसा लगता है जैसे पूरे साल के लिए फिर से चार्ज हो गया हूँ...!