आज मैं पोस्ट ऑफिस गया था, एक स्पीड पोस्ट करने के लिए 1 घंटा लाइन में खड़ा रहा। फिर भी मैं निजीकरण का विरोध करता हूं। देरी का कारण स्टाफ की कमी थी। एक कर्मचारी तीन कर्मचारियों के बराबर काम कर रहा है। सरकार खाली पदों पर भर्ती नहीं करती, जिससे सीधा नुकसान आम जनता को होता है।
बोलने पर पाबंदी
सोचने पर ताज़ीरें
सत्ता के तलवे चाट कर तो बहुत से मीडिया संस्थान ने तरक्की की है।
लेकिन, तमाम दुश्वारियों के बावजूद पूरी ताकत से आम लोगों खासकर युवाओं की आवाज को उठाकर भी आगे बढ़ा जा सकता है, ये @moliticsindia जैसे संस्थान ने साबित किया है।
हर डरपोक नेता को तानाशाह बनने की चाहत होती है। बाघ का कलेजा का दावा करने वाले के पास असल में कबूतर का कलेजा है। इसलिए @neeraj_jhaa जैसे बेबाक पत्रकारों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
हमारे साथ साथ इस देश के युवाओं का एक बड़ा वर्ग निष्पक्ष पत्रकारिता के साथ खड़ा है।
कीप डूइंग व्हाट यू आर डूइंग भाई!
सवाल ये नहीं है कि @IYC ने प्रोटेस्ट कहां किया, असली सवाल यह है कि प्रोटेस्ट क्यों किया गया?
सरेंडर जी ने ट्रंप के दवाब और अडानी के यारी में देश से गद्दारी की है।
✅यह बेरोजगारी बढ़ाने वाली डील है।
✅यह मंहगाई बढ़ाने वाली डील है।
✅यह किसानी बर्बाद करने वाली डील है।
उमर खालिद को बेल क्यों नहीं मिली?
• ये नया भारत है। कोर्ट में अब न्याय कानून के आधार पर नहीं पब्लिक सेंटीमेंट पर मिलता है। जो उमर के पक्ष में नहीं है।
• बहुत लोगों को लगता है कि उमर खालिद को बेल इसलिए नहीं मिल रही क्योंकि वो मुसलमान है।
• ऐसा नहीं है, उमर खालिद को बेल इसलिए नहीं मिल रही क्योंकि वह 'कट्टर मुसलमान' नहीं है। अगर वह कट्टर मुसलमान होता तो उसे नफरत फैलाने के लिए खुला छोड़ दिया गया होता।
• लेकिन ये तो गांधी और अबुल कलाम आजाद को नेता मानता है। मुहब्बत और भाईचारे की बात करता है।
• इस देश का हिंदू इस घोर अन्याय पर इसलिए चुप है क्योंकि वो उमर खालिद को मुसलमान मानता है।
• और मुसलमान इसलिए चुप है क्योंकि वो इसे 'पक्का मुसलमान' नहीं मानता।
• कुछ सयाने प्रभावी लोग जो यह सब कुछ समझते हैं। वो इसलिए चुप हैं, क्योंकि उनकी "पॉलिटिकल पोजिशनिंग" खराब हो जाएगी।
• इस देश में सहानुभूति और न्याय पाने के लिए आपका निर्दोष इंसान होना काफी नहीं है।
आपको कट्टर हिंदू , कट्टर मुसलमान या कट्टर फलाना होना पड़ेगा। क्योंकि कट्टर इंसान होना तो संभव है नहीं!
#UmarKhalid
I am addressing this open letter to Mr. @deepigoyal, fully aware that entrepreneurs like him are merely symptoms of a larger problem.
The real failure lies with a government that oversees widespread unemployment and allows exploitative business models to thrive unchecked.
जो लोग धूप, बरसात, गर्मी, ठंड, धूप, पॉल्यूशन में आपकी जिंदगी आसान बनाते हैं, उन्हें आपके साथ की जरूरत है।
swigy, zomato, blinkit, zepto जैसी कंपनियों में काम कर रहे Gig workers को आपके समर्थन की जरूरत है।
वर्कर्स ने आज स्ट्राइक का ऐलान किया है। क्योंकि बड़ी कंपनिया इन्हें कोई अधिकार नहीं देतीं और सरकार को इनकी कोई चिंता नहीं है।
बिहार चुनाव परिणाम पर विद्वान लोग दो तरह की राय दे रहे हैं।
1. कुछ विद्वानों का कहना है कि महागठबंधन के नेता लोग नालायक हैं इन्हें चुनाव लड़ना नहीं आता है। NDA ने अच्छा काम किया, अच्छा चुनाव लड़े इसलिए जीत गए।
2. कुछ विद्वानों का कहना है चुनाव आयोग ने ठीक से काम नहीं किया। वोट चोरी हुई है।
-----------------------------
जो लोग जिस पक्ष के हैं वो अपने अपने हिसाब से जवाब दे रहे हैं। लेकिन अगर ईमानदारी से विचार करना है, तो कुछ और भी सवालों का जवाब ढूंढना होगा।
इन सवालों को पढ़िए। अपने दिल पर हाथ रखिए। अपने खुदा, अपने भगवान को याद कर जो जवाब आए वो सोचिए। उत्तर मिल जाएगा।
1. क्या चुनाव आयोग की नियुक्ति का अधिकार सिर्फ प्रधानमंत्री के हाथ में होना चाहिए?
2. ऐसी क्या जरूरत पड़ी कि चुनाव आयोग के चयन समिति से CJI को निकाल कर प्रधानमंत्री के द्वारा एक नामित मंत्री को रखा गया? क्या भाजपा को CJI पर भरोसा नहीं है?
3. NDA सिर्फ जीता नहीं है। Brute Majority से जीता है। 2020 में भाजपा ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा, 74 सीटों पर जीते, जद (यू) ने 115 सीटों पर चुनाव लड़ा, 43 जीते।
जबकि 2025 में 101 सीटों में से बीजेपी ने 89 और 101 सीटों में जद यू ने 85 सीटें हासिल की।
सोचिए कि NDA ने 2020 और 2025 के बीच ऐसा कौन सा क्रांतिकारी काम कर दिया कि बिहार में आंधी आ गई?
बीस साल सरकार में रहने के बाद इतिहास में कौन सी सरकार इस तरह का प्रदर्शन कर पाई है?
4. चुनाव के घोषणा के बीच 1.35 करोड़ महिलाओं के खाते में 10000 रुपये डाले गए। क्या आदर्श आचार संहिता की धज्जियां नहीं उड़ाई गई? क्या अगर विपक्ष की सरकार ऐसा करती तो चुनाव आयोग ऐसा होने देता?
5. अगर SIR का विरोध नहीं होता तो जितने नाम कटने के बाद जुड़े वो जुड़ते?क्या यह चुनाव आयोग के सत्ता की पक्षधरता का खुला सबूत नहीं है?
6. क्या SIR के फाइनल लिस्ट आने के बाद इतना समय था कि पार्टियां वोटर लिस्ट की जांच कर पाए? आखिर चुनाव आयोग ने इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई? इसका क्या तर्क है?
7. क्या दूसरे राज्यों से लाकर भरी तादाद में लोगों के नाम जुड़वा कर, ट्रेनों में भर भरकर वोट कराने का मामला सामने आने पर भी चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई की?
----------------------------
सारांश
क्या महागठबंधन और ज्यादा मेहनत कर सकती थी? और बेहतर समन्वय बना सकती थी?
- ईमानदार जवाब है, हां कर सकती थी। भाजपा बेहतर चुनाव लड़ी। लेकिन दोनों में इतना अंतर नहीं था कि विपक्ष गायब ही हो जाय।
क्या चुनाव आयोग ने निष्पक्ष चुनाव करवाया? वोट चोरी हुई?
- जवाब है, चुनाव आयोग बिलकुल निष्पक्ष नहीं रही। वोट चोरी या वोट खरीदी में खुले आम मदद किया।
चुनाव आते जाते रहेंगे। जीत हार होती रहती है।
इसलिए चुनाव किसने जीता यह सवाल उतना महत्वपूर्ण नहीं है। असल और महत्वपूर्ण सवाल ये है कि निष्पक्ष चुनाव क्यों नहीं हुआ?
कान खोलकर सुन लीजिए! अगर हमने अपनी पार्टी के मोह में लोकतांत्रिक संस्थाओं को बर्बाद होने दिया तो कुछ नहीं बचेगा।
हम भविष्य की बात करते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी जी हमें इतिहास में ले जाने का प्रयास करते हैं।
हमें बिहार को बेहतर बनाने के लिए कुछ बातों पर फोकस करना है-
⦁ छात्रों को पढ़ाई
⦁ युवाओं को कमाई
⦁ बुजुर्गों को दवाई
⦁ वंचितों को भागीदारी
⦁ महिलाओं को मान
⦁ किसानों को सम्मान
⦁ तभी बिहार बनेगा महान
: @AnupamConnects जी
📍 बिहार
सुपौल विधानसभा क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अनुपम जी @AnupamConnects को उम्मीदवार बनाया। उनके एकाधिक और एकाध दशक पुराने ट्वीट्स को लेकर उनकी उम्मीदवारी कांग्रेस ने वापस ले ली।
मैं नहीं जानता कि उन ट्वीट्स में से कितने की क्या प्रामाणिकता है! अगर उनमें सच्चाई भी है तो अनुपम चाहते तो कांग्रेस ज्वाइन करते वक़्त या उससे पहले या उसके बाद उन्हें डिलीट कर सकते थे। पर, उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपनी विचार यात्रा में अपने क्रमिक विकास की असलियत को दुनिया के सामने खुला छोड़ दिया। यह पारदर्शिता गांधी में थी। सत्य के साथ अपने अनेक प्रयोग जिनमें कुछ अव्यावहारिक व अनावश्यक भी जान पड़ते हैं; उन्हें कभी ढका नहीं। वे कहते थे, किसी भी विषय पर या किसी स्थिति में मेरी अंतिम राय को ही तवज्जो दी जाए। जब वे जहाज में बैठ कर 'हिन्द स्वराज' (1909) लिख रहे थे, तो संसद के लिए उन्होंने एक ऐसे शब्द का प्रयोग किया जो न सिर्फ़ सुरुचिपूर्ण नहीं था, बल्कि पढ़ कर किसी को बहुत अजीब लगे! एनी बेसेंट के आग्रह पर उन्होंने उस शब्द को बाद में बदला।
मैं अनुपम जी की आप से संबद्धता को जानता हूं और उस दौर में वाहिद शख़्स थे लालू प्रसाद जी जो उसके पीछे संघ की भूमिका को ऐलानिया बरहना कर रहे थे सदन के अंदर भी और सदन के बाहर भी। लेकिन, कौन नेता, पार्टी और संगठन नहीं थे जो अण्णा के मंच पर नहीं चढ़े? भाषा और उसे बरतने की ज़हनियत को लेकर सवाल हो सकते हैं। हर इकोसिस्टम अपनी ज़िद में आपको कभी थोड़ा, कभी अधिक लेती है! पर, एक व्यक्ति जब वहां से अलग होता है तो नयी आब-ओ-हवा उसे शनै:-शनै: बदलती है या कि बदले हुए स्वत्व व चित्त शुद्धि के साथ वह नये घर-आंगन को अंगीकार करता है।
क्या राहुल गांधी जी से भाई अनुपम ने आम आदमी पार्टी के साथ अपने पुराने राब्ते को छुपाया था? क्या उन्हें अंधेरे में रखा गया था? माले के बड़े नेता विनोद मिश्रा जी ने "मंदिर-मंडल फ़्रेंज़ी" जैसी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया था? क्या समता पार्टी के साथ 1995 में अनेक सीटों पर एक समझदारी के साथ माले ने चुनाव नहीं लड़ा था? पर, आज हम साथ हैं एक साझा लड़ाई में!
क्या महिला आरक्षण के सवाल पर "क़ोटे के अंदर क़ोटा" की लड़ाई में कांग्रेस हमारे साथ थी? क्या उसके विचार हमसे मेल खाते थे? नहीं, बल्कि सोनिया जी ने यहां तक कहा था कि किसने इन सोशलिस्ट पार्टियों को महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण में स्वेच्छा से वंचित महिलाओं को टिकट देने से रोका है? पर, अधिनियम तो फ़्लैट 33 % का ही बनना चाहिए। लेकिन, आज सोनिया जी से लेकर राहुल जी की वही राय है जो एक ज़माने से लालू जी, मुलायम जी और शरद जी की राय थी।
क्या राहुल गांधी द्वारा अध्यादेश फाड़े जाने को हम यथोचित मानते हैं? नहीं। पर, जब राहुल गांधी पर ख़ुद वह क़ानून थोप दिया गया, तो उन्हें उसकी भयावहता समझ में आई, और वे आज भिन्न राय रखते हैं।
इसलिए, एक मनुष्य के सफ़र को उसके व्यतिक्रम, विचलन व विसंगति के साथ एक निरंतरता में देखा जाना चाहिए। इंसान सतत सीखता है। कुंवर नारायण कितना दुरुस्त कहते हैं:
अबकी बार लौटा तो
मनुष्यतर लौटूँगा
घर से निकलते
सड़कों पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं
अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूँगा
अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूँगा।
बिना विचलित हुए चलते रहना है, अनुपम भाई! आपको हिम्मत व धीरज मिले, बड़प्पन के साथ काम करना है, रोज़-ब-रोज़ परिवेशजन्य अपनी किंचित लघुता से स्वयं को मुक्त करते चलना है। अध्यवसाय, न्याय-बोध, अपरिग्रह और बुद्ध की करुणा के जल से आसपास के संसार को अभिसिंचित करना है। आगे यात्रा ही यात्रा है, मंज़िल छलावा है!
मिरे राहबर मुझको गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है।
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है।
(ख़ुमार बाराबंकवी)
जयन्त
20 अक्टूबर 2025
अनुपम जी एक बेहतरीन उर्जावान युवाओं में से एक संघर्षशील जननेता है और देश के गरीबों बेसहारों बेरोजगारों जरूरतमंदों को समझने में जन प्रिय नेता है देश के कोने कोने से सबकी शुभकामनाएं इनके साथ है सुपौल से लेकर दिल्ली तक सुख दुख में सबके साथ रहते है
शुभकामनाएं।
#AnupamforSoupoul
@_govindmishra
#YuvaHallaBol के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुपम भैया जी को बिहार के सुपौल से टिकट देकर जननायक @RahulGandhi जी ने बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन को नई ताकत दी है।
देश के युवाओं की आवाज अब सड़क से लेकर सदन तक और अधिक मजबूत व बुलंद होगी।
@INCIndia के शीर्ष नेतृत्व का आभार..!
@AnupamConnects
Absolutely. I have only a fleeting acquaintance with Anupam. But I have followed his work and he is the kind of people Bihar needs in the legislature. I am so happy that he is contesting on a Congress ticket. I hope the Biharis appreciate his worth. Aap Ka MLA Kaisa Ho?/ Anupam Kumar Jai sa Ho !
Best of luck bro.
युवाओं से जुड़े मुद्दे और आंदोलन से देश में अपनी पहचान बनाने वाले, युवा हल्ला बोल के संस्थापक अग्निपथ आंदोलन के दौरान तिहाड़ जेल के साथी और मित्र अनुपम बिहार से चुनाव लड़ रहे |
राजनीति के इस दौर आंदोलन से निकले युवा नेताओं को मेनस्ट्रीम की पॉलिटिक्स में जगह बनाते देख उसके इतने सालों का संघर्ष और विचार को छोड़ कर आज कुछ लोग कुंठा में या जानकारी के अभाव में केवल इसलिए उनकी टांग खिंचाई कर रहे क्योंकि वो किसी अपराधी, धनबल या बाहुबल या