केशव मौर्य सिर्फ़ मदरसों पर हमला कर सकते हैं, क्योंकि उनकी कुर्सी दरअसल एक स्टूल है।
जिन्हें अंग्रेज़ों से मोहब्बत हो, उन्हें मदरसे कैसे पसंद आएँगे? मदरसे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ साज़िशों और आज़ादी की जद्दोजहद के मरकज़ थे। उन्होंने बेशुमार मुजाहिदीन-ए-आज़ादी पैदा किए, जबकि सावरकर अंग्रेज़ों को माफ़ीनामे लिख रहे थे।
आज़ाद भारत का पहला दहशतगर्द गोडसे किसी मदरसे का तालीब-ए-इल्म नहीं था। लेकिन भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मदरसे में पढ़े थे। मुंशी प्रेमचंद और राजा राम मोहन राय ने भी मदरसे में तालीम हासिल की थी।
दस्तूर का आर्टिकल 30 हर अक़ल्लियती बिरादरी को अपने तालीमी इदारे क़ायम करने और चलाने का हक़ देता है। ये बेहद शर्मनाक है कि एक दस्तूरी ओहदे पर बैठा शख़्स ऐसी ज़हरीली ज़बान इस्तेमाल करे।
मगर जब कुर्सियाँ कम हों, तो स्टूल वालों को अपनी सियासी अहमियत बनाए रखने के लिए ज़हर उगलना ही पड़ता है।
ये विडियो कुवैत की है
जहां एक अरबी के घर बच्चा हुआ
जिसकी खुशी में उसने रोड से जाते दो लोगों को रोका
और कहा आज मेरे घर बच्चा हुआ है मैं बहुत खुश हूं।
मैं तुम्हारे साथ अपनी खुशी बांटना चाहता हूं आओ मेरे साथ कहकर इन लोगों को एक एटीएम पर ले जाता है
सबसे बड़ी बात उस अरबी ने ना तो उनका नाम पूछता है और ना ही धर्म जबकी आप देखकर समझ सकते दोनों हिन्दू भाई हैं
एटीएम मशीन में कार्ड और पासवर्ड डालकर कहता है अपनी मर्ज़ी से जितना तुम्हें चाहिए वो डालो रकम इस पर एक शख़्स कहता है 100 दीनार इंडियन 30000, अरबी शख़्स फैसला उस पर छोड़ता है पहला व्यक्ति सौ 100 दीनार निकालकर रख लेता है
इससे दूसरे को यक़ीन हो जाता है सच में उसने पैसे दे दिए इसलिए वो डबल 200 दीनार यानी तक़रीबन साठ हज़ार 60000 से अधिक डालकर ले लेता है,,और दुआ देता है
इस पर अरबी बोलता है नहीं नहीं रोको अभी आओ मेरे साथ और दोनों को लेकर हाइपर मार्किट जाता है और कहता है जो चाहिए ख़रीद लो चाहे पूरा मार्किट फ़िर दोनों शख़्स खुश होकर वहां शापिंग करते हैं
यही तो अच्छाईयां हैं इस्लाम की और इस्लाम के तालीम की जो सामने आ जातीं हैं ।।
आप किया कहेंगे इस अरबी शख्स को...