स्कूलों की बदहाली छिपाने से हकीकत नहीं बदलेगी
सरकार ने स्कूलों में सुरक्षा और व्यवस्था के ना��� पर ऐसा फरमान जारी कर दिया है कि बिना अनुमति बाहरी व्यक्ति स्कूल परिसर में प्रवेश नहीं कर सकता, फोटो-वीडियो नहीं बना सकता और स्कूल की गतिविधियों को रिकॉर्ड नहीं कर सकता।
लेकिन सवाल यह है कि स्कूलों की दुर्दशा इतनी खराब है कि उसकी तस्वीर लेने के लिए अंदर जाने की जरूरत ही कहाँ है?
जर्जर दीवारें, टूटे भवन, गंदगी और बदहाल व्यवस्थाएँ बाहर से ही दिखाई दे जाती हैं।
जनता की आवाज को किसी आदेश, रोक या ��ानाशाही फरमान से दबाया नहीं जा सकता।
कैमरा बंद करवाने से हकीकत नहीं बदलेगी और सवाल पूछने पर रोक लगाने से समस्याएँ खत्म नहीं होंगी।
अगर व्यवस्था बेहतर है तो तस्वीरों से डर कैसा?
और अगर तस्वीरें ही डर पैदा कर रही हैं, तो शायद समस्या कैमर��� में नहीं, स्कूलों की हालत में है।
जनता सवाल भी करेगी, व्यवस्था की कमियाँ भी बताएगी और जहाँ जरूरत होगी वहाँ आवाज भी उठाएगी। @AshutoshRanka @Cockroachisback @madandilawar
सुनो स्वरा,
छत की मुंडेर, चाँद की रोशनी, और बीच में एक खामोश फासला... तुम उधर, मैं इधर; ना कोई बात, ना कोई शिकायत, बस एक दूसरे को देखते रहना।
तुम चाँद को हाथ बढ़ाकर छूने की कोशिश कर रही थी, और मैं बस तुम्हें देख रहा था क्योंकि मेरे लिए उस रात का सबसे खूबसूरत चाँद तुम ही थीं।
शहर सो रहा था, सड़कें सुनसान थीं, हवा में हल्की ठंडक थी पर हमारे बीच चल रही थी हजारों बातें...वो भी बिना बोले।
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं ना..जिन्हें पास आने की ज़रूरत नहीं होती।दो छतों का फासला भी कम लगता है, जब दिल एक हों; तुम्हारा हँसना, तुम्हारा चाँद को देखना, और फिर तुम्हारा पलट कर मुझे देखना.….बस यही मेरी रात की सबसे प्यारी कहानी थी।
लोग कहते हैं मोहब्बत में मिलना ज़रूरी है पर उस रात समझ आया...मोहब्बत तो बस महसूस करने का नाम है।चाहे बीच में दीवारें हों, दूरियाँ हों, या दो छतों का फासला... जब नज़रें मिल जाएँ तो हर रात चाँदनी बन जाती है।✨🩷
#રાધાસ્વરા
#बज़���म
सुनो प्रियतम!!
जब तुम मुझसे मिलने आना, तो हरी चूड़ियाँ साथ में लाना। मेरे हाथ मेंहदी से सजे हुए होंगे, और तुम खुद उन कोमल हाथों में चूड़ियाँ पहना देना। हर चूड़ी की खनक सुनकर तुम्हारा दिल और तेज़ी से धड़केगा, क्योंकि वो आवाज़ मेरे हाथों से आई होगी।
जब तुम मुझसे मिलने आना, तो हरी चुनर भी साथ लाना। मेरे बाल गजरों से सजे होंगे, और तुम खुद उस चुनर को मेरे सिर पर ओढ़ा देना। तुम्हारी उंगलियों का स्पर्श पाकर मैं भूल जाऊँगी कि दुनिया में और कुछ भी है। सिर्फ़ तुम, तुम्हारी मुस्कान और ये सावन की हल्की-हल्की फुहार।
जब तुम मुझसे मिलने आना, तो हरी बिंदिया ढूँढकर लाना।मेरे केशुओं को तुम संवारते हुए खुद ���िंदी लगा देना।उस पल में मेरी साँसें थम जाएँगी, तुम्हारा चेहरा इतना करीब होगा कि मैं आँखें भी नहीं खोल पाऊँगी। और तुम्हारी साँसों में मेरी पूरी दुनिया बस जाएगी।
जब तुम मुझसे मिलने आना, तो ज़्यादा इंतज़ार मत कराना। सावन के झूले पर सखियाँ झूल रही होंगी, लेकिन तुम सिर्फ़ मेरे संग पेंग बढ़ाना। मेरा हाथ पकड़कर झूले को ऊँचा उड़ाना, और मेरी हँसी हवा में घुल जाएगी। हर बार जब झूला ऊपर जा कर नीचे आए तब तुम मुझे अपने करीब खींचना।
तुम जब भी मुझसे मिलने आना, बस आ जाना। मैं हर बार ��ी तरह तुम्हारा इंतज़ार करूँगी,और वही हरी चीज़ें पहनूँगी, और वही प्यार महसूस करूँगी जो सिर्फ़ तुम्हारे आने से पूरा होता है।✨♥️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म
��ाँव में मत बसो,
वहाँ के लोगों की अपने से ज़्यादा दूसरों की
ज़िंदगी में दिलचस्पी होती है।
वहाँ ताज़ा दूध, सब्ज़ियाँ तो मिल जाती हैं,
मगर वहाँ के लोगों की बुरी नज़र, ईर्ष्या और
जलन, ना सिर्फ आपको,
बल्कि आपकी नस्लों को भी बर्बाद कर देती हैं!
नेता कोई भी हो,
समर्थन विचारों का होना चाहिए,
व्यक्ति का नहीं।
जो जनता के हित में काम करे
उसका साथ दें,
और जो गलत करे उससे सवाल करें
यही जागरूक नागरिक की पहचान है।
थकान की वजह से अभी दिमाग में ऐसा कुछ गहरा न अच्छा,न बुरा नहीं आ रहा जिसे शब्दों में ढाल सकूँ,फिलहाल तो बस इतना ही कर सकता हूँ कि चुपचाप मौसम का आनंद लेते हुए,मदिरा का ���क-एक घूँट भरूँ,और जो कुछ तुम लिखते हो उसे पढ़ूँ फिर जितना महसूस कर सकूँ,उतना तुम्हारी खुशियों को भी और तुम्हारी उदासियों को भी अपने भीतर उतारने की कोशिश करूँ...!
एक थका हुआ मर्द और एक आलिंगन की ताक़त!!
एक थका हुआ मर्द दुनिया का सबसे ख़ामोश योद्धा होता है।वो सुबह घर से निकलता है तो कंधों पर सिर्फ़ बैग नहीं होता,पूरी दुनिया का बोझ होता है, ज़िम्मेदारियों का,उम्मीदों का और दिल से आवाज़ आती है तुझे तो करना ही है।
वो दिन भर काम से, बॉस की डाँट से,क्��ाइंट के तानों से, ट्रैफ़िक की झल्लाहट से, पैसों की टेंशन से और सबसे ज़्यादा ख़ुद से लड़ता है।हर रोज़ वो अपने अंदर के उस लड़के को मारता है जो कहता है “अब नहीं होता” और उस मर्द को ज़िंदा रखता है जो कहता है “करना पड़ेगा”।
और जब वो शाम को घर लौटता है, तो वो थका हुआ होता है।सिर्फ़ जिस्म से नहीं,रूह से थका हुआ,उसकी आँखों में नींद कम, सवाल ज़्यादा होते हैं।उसके चेहरे पर पसीना कम, फ़िक्र ज़्यादा होती है।���सका दिल शिकायतों से नहीं, ख़ामोशी से भरा होता है।
वो नहीं चाहता कि,तुम उसके पैर दबाओ क्योंकि वो जानता है कि तुम भी तो थकी हो,वो नहीं चाहता कि तुम घंटे भर बैठकर उसकी दफ़्तर की कहानी सुनो, क्योंकि वो ख़ुद उन कहानियों से भागना चाहता है।वो नहीं चाहता कि तुम उसका दर्द बाँटो क्योंकि मर्द का दर्द बाँटने से कम नहीं होता और वो ये भी नहीं चाहता कि तुम उसे अपना जिस्म दो,उसे सिर्फ़ सुकून चाहिए होता है और व�� तो बस चाहता है कि तुम बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे, उसे अपने गले लगा लो।
��स एक आलिंगन…
न सवाल, न सलाह, न लेक्चर, न हमदर्दी… सिर्फ़ तुम्हारी बाहें,उस आलिंगन में जादू होता है,तुम्हारे सीने से लगते ही उसकी पीठ पर लदा पहाड़ उतर जाता है।तुम्हारी धड़कन सुनते ही उसके दिमाग़ का शोर थम जाता है।तुम्हारी उँगलियाँ जब उसके बालों में चलती हैं,तो लगता है किसी ने रूह पर मरहम रख दिया हो।
उसे पता है कि तुम उसकी प्रॉब्लम सॉल्व नहीं कर सकतीं और वो चाहता भी नहीं, वो तो बस चाहता है कि नौ���री के बाद जब वो घर आए, तो उसे लगे कि हाँ, कोई है जिसके पास आकर दिनभर का बोज कम हो जाएगा।
एक थके हुए मर्द के लिए स्त्री का आलिंगन किसी दवा से कम नहीं,वो आलिंगन उसकी थकान पल भर में दूर कर देता है, वो उसके ग़ुस्से को पिघला देता है, वो उसके चिड़चिड़ेपन को शांत कर देता है, वो उसे याद दिलाता है कि वो मशीन नहीं है, इंसान ही है और वो अकेला नहीं है, कोई उसका भी है।
क्योंकि मर्द रोते नहीं, ये दुनिया ने सिखाया है।मर्द टूटते नहीं,ये समाज ने कहा है, लेकिन मर्द थकत�� हैं बिखरते हैं, टूटते हैं और जब टूटते हैं तो आवाज़ नहीं करते, बस ख़ामोश हो जाते हैं।
और उस ख़ामोशी की एक ही दवा है तुम्हारा बिना शर्त, बिना सवाल, बिना वजह का गाढ़ आलिंगन।
तो अगली बार जब वो दरवाज़े से अंदर आए और उसकी आँखें खाली हों, उसकी आवाज़ बुझी हुई हो, उसके कंधे झुके हुए हों तो कुछ मत पूछना,कुछ मत कहना,बस उठना और अपनी बाहों में उसे भींच लेना।
यक़ीन मानो, उस एक आलिंगन में वो सब कुछ कह देगा जो लफ��्ज़ों में कभी नहीं कह पाया और तुम उसे वो सुकून दे दोगी जो दुनिया की कोई दौलत, कोई कामयाबी, कोई तारीफ़ नहीं दे सकती।
क्योंकि आख़िर में, एक थका हुआ मर्द सिर्फ़ घर नहीं चाहता... वो “घर जैसा एहसास” चाहता है और वो एहसास सिर्फ़ तुम्हारी बाहों में है।✨❤️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म
वृक्ष लगाइए, उसका स्वागत है। उसकी देखभाल कीजिए, उससे भ��� बड़ा स्वागत है। लेकिन हर पौधे के साथ अपना नाम जोड़ देना, उसके सामने खड़े होकर तस्वीरों का प्रदर्शन करना और नेमप्लेट लगाकर ये जताना कि "यह पेड़ मेरा है" ये सेवा से अधिक आत्मप्रदर्शन का परिच�� देता है।
प्रकृति किसी के प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं है। वह न आपकी तालियाँ चाहती है, न आपकी पहचान। पेड़ इसलिए नहीं उगते कि उन पर किसी का नाम चमके; वे इसलिए उगते हैं कि किसी अनजान राहगीर को छाया मिले, किसी प्यासे पक्षी को आश्रय मिले, किसी थके हुए इंसान को साँस लेने के लिए स्वच्छ हवा मिले।
यदि हर नेक काम के पीछे अपनी पहचान चिपकानी पड़े, तो समझ लीजिए कि उद्देश्य प्रकृति नहीं, प्रसिद्धि है। उपकार व��� होता है जिसका हिसाब न रखा जाए। जिस सेवा के साथ नाम का बोर्ड टाँगना पड़े, वह सेवा कम और प्रचार अधिक लगती है।
प्रकृति पर कोई एहसान नहीं किया जा रहा। हम तो केवल उस ऋण की एक मामूली-सी किस्त चुका रहे हैं, जिसकी बदौलत हर दिन साँस ले रहे हैं। इसलिए पेड़ लगाइए, उन्हें जीवित रखिए, लेकिन उन्हें अपने अहंकार का स्मारक मत बनाइए। सबसे सुंदर नेमप्लेट वही है, जिस पर कोई नाम नहीं लिखा होता, सिर्फ़ हरी पत्तियाँ ��ोती हैं। 🙏
राघवेन्द्र चतुर्वेदी 🔥
कुछ दिनों से कई लोगों की फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल बंद हो रही है,फिर वे नई प्रोफ़ाइल बनाकर उसी दुनिया को दोबारा तलाशने लगते हैं लेकिन नई प्रोफ़ाइल बना लेने से पुरानी दुनिया वापस नहीं आती वहाँ न वे लोग मिलते हैं,न वे बातें,न वे यादें,जो वर्षों में धीरे-धीरे उस दुनिया का हिस्सा बन गई थीं.!
सांझ...कितना छोटा-सा नाम है, पर जाने क्यों इसके भीतर मुझे अनंत आकाश का विस्तार दिखाई देता है। मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा क्यों होता है, पर जैसे ही ये नाम मन में उतरता है, भीतर कहीं एक अदृश्य दीपक स्वयं जल उठता है। ऐसा लगता है मानों कोई दैवीय उपस्थिति बिना कुछ कहे मेरे आसपास बैठ गई हो। जैसे ईश्वर ने दिन और रात्रि के बीच एक ऐसा क्षण रच��� हो, जहाँ समय भी कुछ पल के लिए अपनी गति धीमी कर देता हो और ब्रह्मांड अपनी ही धड़कनों को सुनने लगता हो।
मुझे लगता है कि "सांझ" कोई शब्द नहीं, कोई अलौकिक स्पर्श है। ��ोई मौन प्रार्थना है, जो बिना होंठ हिलाए आकाश तक पहुँच जाती है। कोई ऐसी आरती है जिसे मंदिरों की घंटियाँ नहीं, लौटते हुए पक्षियों के पंख गाते हैं। कोई ऐसा मंत्र है जिसे किसी ऋषि ने नहीं लिखा, बल्कि स्वयं प्रकृति ने अपने शाश्वत हृदय पर अंकित किया है।
जब मैं सांझ कहता हूँ, तो मेरे भीतर अनगिनत दीपशिखाएँ एक साथ प्रज्वलित हो उठती हैं। लगता है जैसे क्षितिज ने अपने केसरिया आँचल में समूचे संसार की थका�� समेट ली हो, जैसे अस्ताचल की ओर बढ़ता सूर्य कोई पराजित योद्धा नहीं, बल्कि अपनी दिव्य मुस्कान के साथ लौटता हुआ तपस्वी हो, जिसने पूरे दिन प्रकाश का यज्ञ पूर्ण किया हो।
कितना विचित्र है...कुछ नाम केवल सुनाई नहीं देते, वे भीतर उतरते हैं। वे रक्त में घुल जाते हैं, वे स्मृतियों में नहीं, आत्मा में निवास करते हैं। सांझ मेरे लिए वैसा ही एक नाम है। इसे पुकारते ही ऐसा लगता है जैसे किसी प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में वर्षों से अखंड जलता हुआ दीपक अचानक मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया हो।
इस नाम में मुझे मोगरे की श्वेत निष्कलुषता का सुवास मिलता है, रातरानी की गहन नीरवता का मधुर रहस्य मिलता है, हरसिंगार की भोर से पहले झर जाने वाली विनम्रता मिलती है, चाँदनी की निष्पाप शीतलता मिलती है, और उन अनगिनत तारों की मौन सभ्यता मिलती है जो बिना कोई पुरस्कार चाहे युगों से अंधकार को सुंदर बनाते आ रहे हैं।
कभी-कभी लगता है, यदि स्वर्ग का कोई रंग होता, तो वह सांझ का ही होता। यदि देवताओं की कोई भाषा होती, तो उसके सबसे मधुर शब्द का नाम सांझ होता। यदि करुणा का कोई चेहरा होता, तो उसकी आँखों में यही सांध्यवेला उतरती। यदि शांति का कोई स्पर्श होता, तो वह ठीक वैसा होता जैसा डूबते हुए सूर्य की अंतिम किरण धीरे से किसी वृक्ष की पत्ती को छूकर विदा लेती है।
मैंने जीवन में असंख्य शब्द पढ़े हैं। अनेक नाम सुने हैं, अनेक ध्व��ियाँ समय के साथ आईं और खो गईं, पर यह एक नाम जाने क्यों हर बार मेरे भीतर किसी पवित्र सरोवर में गिरती कमल-पंखुड़ी की तरह लहरें जगा देता है। ये मुझे किसी व्यक्ति से अधिक एक अनुभूति लगता है, एक ऐसी अनुभूति जो मन को संसार से नहीं, स्वयं से मिला देती है।
शायद इसलिए मुझे शोर कभी आकर्षित नहीं करता। मेरा मन उसी क्षण में ठहर जाना चाहता है जहाँ दिन ने अभी विदा ली हो और रात ने अभी अपना परिचय न दिया हो, जहाँ हवा भी धीरे-धीरे बोलती हो, जहाँ वृक्षों की छाया प्रार्थना बन जाती हो, जहाँ पक्षियों की वापसी किसी वेदपाठ जैसी लगती हो, जहाँ मौन भी संगीत बनकर बहता हो।
कई बार सोचता हूँ कि यदि मेरी आत्मा को कभी कोई विश्रामस्थल चुनना हो, तो वह किसी स्वर्णिम महल में नहीं, किसी नदी के शांत तट पर उतरती हुई सांझ की गोद में होगा। जहाँ दूर किसी मंदिर से आती घंटियों की ध्वनि हवा में घुल रही हो, जहाँ दीपक की लौ अंधकार से युद्ध नहीं कर रही हो, बल्कि उसे प्रेम से आलोकित कर रही हो, और जहाँ आकाश अपनी नीली चादर पर ��क-एक करके तारों के अक्षर लिख रहा हो।
पता नहीं यह केवल मेरा भ्रम है या किसी अनदेखे जन्म का कोई अधूरा संबंध, पर सांझ मुझे हमेशा किसी दैवीय लोक का निमंत्रण लगती है। ऐसा निमंत्रण, जिसे शब्दों से नहीं, केवल हृदय से स्वीकार किया जा सकता है।
और आज, इस क्षण, अपनी डायरी के इस पन्ने पर बैठा मैं बस इतना ही लिखना चाहता हूँ....
यदि कभी ईश्वर मौन होकर पृथ्वी पर उतरें, यदि कभी करुणा किसी नाम का रूप ले, यदि कभी शांति स्वयं अपना परिचय दे, यदि कभी प्रकाश और अंधकार बिना किसी विवाद के एक-दूसरे का हाथ थाम लें, तो शायद उस दिव्य मिलन का सबसे सुंदर नाम केवल एक ही होगा....
"सांझ"....❣️
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ❣️ 🫰 😌
कितना अजीब है ना एक स्त्री को समझना… वो कोई किताब नहीं है जिसके आखिरी पन्ने पर सारे सवालों के जवाब लिखे हों। वो तो बारिश की बूंदों जैसी होती है…. हाथ बढ़ाकर छू भी लो तो भी वो पूरी तरह मुट्ठी में नहीं आती,फिसलकर कहीं न कहीं छूट ही जाती है।
उसके दिल तक पहुँचने के लिए तुम्हें बह��त बड़े-बड़े अल्फाज़, या दुनिया भर की चालाकियाँ नहीं चाहिए होतीं। उसे बस थोड़ा सा वक़्त चाहिए, थोड़ी सी तवज्जो, और एक सच्चा सा अपनापन जिसमें वो बिना डरे खुद को रख सके।
बाहर से वो जितनी उलझी हुई, जितनी समझ से परे लगती है अंदर से वो उतनी ही मासूम होती है,बिल्कुल किसी बच्चे की तरह। ज़रा सा मना लो तो वही जो रूठी बैठी थी, पल भर में हँसकर सब भूल जाती है और कभी-कभी बिना किसी वजह के भी रूठ जाती है, सिर्फ इसलिए कि तुम उसे मनाओ, उसे ये एहसास दिलाओ कि वो तुम्हारे लिए ज़रूरी है।तुम अगर उसे मोहब्बत का एक छोटा सा कतरा भी दो, तो वो बदले में तुम्हें पूरा समंदर लौट�� देती है।तुम उससे इज़्ज़त से, नरमी से बात कर लो, तो वो तुम्हें अपने हिस्से का “भगवान” बना लेगी, वो आदमी जिसके लिए वो सब कुछ छोड़ सकती है।
अक्सर उसकी नाराज़गी का मतलब लड़ाई नहीं होता।वो बस एक खामोश दस्तक होती है तुम्हारे दरवाज़े पर, कि आओ और पूछो “क्या हुआ? तुम ठीक हो?” और अगर तुम उस दस्तक को सुनकर भी चुप रह जाते हो, तो वो सच में टूट जाती है, सच में उदास हो जाती है।
सच कहूँ तो कई बार वो खुद भी नहीं जानती कि उसे ठीक-ठीक क्या चाहिए… वो बस इतना जानती है कि जिससे वो मोहब्बत करती है, उससे वो अधूरा कुछ नहीं चाहती। उसे तुम्हारा पूरा वक़्त चाहिए, पूरा एहसास चाहिए, पूरा साथ चाहिए… और सबसे ज़्यादा, बिना शर्त वाला पूरा प्यार चाहिए।✨♥️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म
चले जाना नियति का फैसला हो सकता है मगर आंसुओ का गिरना व्यक्तिगत चुन���व है आप खुश है क्योंकि आप जानते है फायदे,आपकी आँखों में उम्मीद है मेरा दुःख इस बात से है कि सब मिल भी गया तो भी खालीपन बरकार रहेगा...!
ग्राम अराई, जिला अजमेर में प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला
ग्राम अराई में पुलिया निर्माण के नाम पर मुख्य सड़क को लगभग 10 दिनों से गहरा खोदकर छोड़ दिया गया है, जबकि आमजन की आवाजाही के लिए कोई वैकल्पिक मार्ग भी उपलब्ध नहीं कराया गया। इस लापरवाही के कारण लोगों को प्रतिदिन भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
खुदाई के दौरान पीने के पानी की पाइपलाइन भी क्षतिग्रस्त हो गई, जिससे क्षेत्र के निवासियों की जलापूर्ति कई दिनों से बाधित है। इतना ही नहीं, पास में विद्यालय होने के कारण स्कूली बच्चों और अभिभावकों को भी आवागमन में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे किसी दुर्घटना की आशंका बनी हुई है।
ग्रामीणों द्वारा संबंधित अधिकारि @gurjar_devvrat को कई बार इस समस्या से अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक न तो वैकल्पिक रास्ते की व्यवस्था की गई है और न ही क्षतिग्रस्त पाइपलाइन एवं सड़क की समस्या का समाधान किया गया है। @kumaridiya@onlinekanhaiya@mpbhagirathbjp
से आग्रह है कि जनहित को ध्यान में रखते हुए तत्काल आवश्यक कार्रवाई की जाए, वैकल्पिक मार्ग ���ी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए तथा पेयजल आपूर्ति और निर्माण कार्य को शीघ्र पूर्ण कराया जाए, ताकि आमजन को राहत मिल सके।
— ग्राम संवाद मंच अराई
मुझे नफ़रत करना नहीं आता। ये कोई उपलब्धि भी नहीं है और न ही मैं स्वयं को कोई संत या महात्मा मानता हूँ। ये तो बस मेरे स्वभाव का एक ऐसा कोना है जिसे समय ने, अनुभवों ने और जीवन की अनगिनत ठोकरों ने चुपचाप गढ़ दिया है। हाँ, मैं नाराज़ हो सकता हूँ,किसी के व्यवहार से आहत भी हो सकता हूँ,कई बार लंबे समय त��� दूरी भी बना सकता हूँ,मौन भी धारण कर सकता हूँ,लेकिन अपने भीतर किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध या उसके पतन की कामना का अँधेरा नहीं पाल पाता। शायद इसलिए कि मैंने धीरे-धीरे समझ लिया है कि मन के भीतर सबसे अधिक विष उसी पात्र में ��मा होता है जो उसे सँजोकर रखता है।
कई बार मुझे ज्ञात होता है कि मेरे विषय में बातें गढ़ी जा रही हैं,मेरे शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है,मेरे मौन को अहंकार कहा जा रहा है और मेरे सरल व्यवहार को कमजोरी समझा जा रहा है। मेरे पीछे ऐसे कथानक रचे जाते हैं जिनका मेरी वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। प्रारंभ में मन विचलित अवश्य होता था, पर अब नहीं। अब लगता है कि यदि कोई मेरे बारे में असत्य रचकर स्वयं को संतोष दे रहा है तो वह उसके संस्कारों का दर्पण है, मेरे चरित्र का नहीं।
वेदों की यह प्रार्थना बार-बार भीतर गूँजती है "असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय।"अर्थात्, हे परम चेतना! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और क्षणभंगुरता से अमृततुल्य चेतना की ओर ले चल। जब यह प्रार्थना भीतर जीवित हो, तब किसी मनुष्य के प्रति द्वेष रखने का स्थान धीरे-धीरे स्वयं ही समाप���त होने लगता है।
मुझे "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"* का भाव केवल स्मरण नहीं, जीवन का अभ्यास लगता है। मेरा अधिकार केवल अपने कर्म पर है, किसी की प्रशंसा पर नहीं; किसी की निंदा पर नहीं; किसी की स्वीकृति या अस्वीकृति पर भी नहीं। यदि मैं अपने दायित्व को ईमानदारी से निभा रहा हूँ तो फिर संसार का निर्णय अंतिम सत्य नहीं हो सकता।
मैंने समझा है कि कर्म कभी मौन नहीं रहते। मनुष्य बोलना बंद कर सकता है, समाज भूल सकता है,समय ���ुंधला कर सकता है,पर कर्म अपना लेखा कभी नहीं भूलते। उपनिषदों का भाव है कि जैसा मनुष्य कर्म करता है, वैसा ही वह बनता जाता है। इसलिए मैं अपने हिस्से का प्रकाश बचाए रखना चाहता हूँ। किसी और के अंधकार से लड़ने के लिए अपने भीतर दीपक बुझा देना मुझे उचित नहीं लगता।
मैं न्याय करने वाला नहीं हूँ,मैं किसी के भाग्य का निर्णायक भी नहीं हूँ। जो जैसा बोता है, वैसा ही किसी न किसी रूप में काटता भी है,ये विश्वास ��ुझे प्रतिशोध से दूर रखता है। इसलिए मैं बहुत-सी बातों को समय और कर्मफल के हाथों सौंप देता हूँ। ��मय से बड़ा न्यायाधीश शायद ही कोई हो।
कभी-कभी सोचता हूँ कि यदि मैं भी वही बन जाऊँ जो मेरे विषय में असत्य फैलाते हैं, तो फिर मेरे और उनके बीच अंतर ही क्या बचेगा? किसी की कटुता को अपने स्वभाव का आधार बना लेना स्वयं के अस्तित्व के साथ अन्याय होगा। इसलिए मैं अपने भीतर करुणा बचाए रखने का प्रयास करता हूँ। करुणा का अर्थ मूर्खता नहीं होता, क्षमा का अर्थ आत्मसम्मान खो देना नहीं होता, और मौन का अर्थ पराजय नहीं होता। कई बार मौन सबसे ऊँची आवाज़ होता है, जिसे केवल समय सुनता है।
ऋग्वेद का भाव कहता है "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" चारों दिशाओं से कल्याणकारी विचार हमारे भीतर आएँ। यदि मैं अपने मन को ही द्वेष से भर दूँ, तो फिर इस प्रार्थना का क्या अर्थ रह जाएगा? इसलिए मैं अपने भीतर जितना संभव हो सके, शुभ विचारों के लिए स्थान बचाकर रखना चाहता हूँ।
मैं केवल इतना जानता हूँ कि मुझे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना है। जो उत्तरदायित्व जीवन ने मेरे हाथों में रखा है, उसे पूरी निष्ठा, ईमानदारी और सजगता के साथ निभाना है। ��ोगों की धारणाएँ बदलती रहती हैं, परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, संबंध बदलते रहते हैं, पर चरित्र का निर्माण प्रतिदिन किए गए छोटे-छोटे कर्मों से होता है। मैं उसी निर्माण में लगा रहना चाहता हूँ।
यदि कभी कोई मुझे समझ ले, तो उसका आभार। यदि कोई न समझे, तो भी कोई शिकायत नहीं। क्योंकि अंततः मनुष्य का सबसे बड़ा साक्षी उसका अपना अंतःकरण होता है। वही रात के सन्नाटे में प्रश्न भी पूछता है और उत्तर भी देता ह���।
मैं अपने भीतर नफ़रत का घर नहीं बनाना चाहता। मैं इतना ही चाहता हूँ कि जब भी इस जीवन की संध्या आए और मैं पीछे मुड़कर देखूँ, तो ये कह सकूँ कि मैंने अपनी ओर से किसी के लिए जानबूझकर विष नहीं बोया। मैंने जहाँ तक संभव हुआ, अपने कर्मों को ईमानदारी से किया, अपने दायित्वों को निभाया, अपने अंतःकरण को छलने का प्रयास नहीं किया, और शेष सब कुछ उस अदृश्य न्याय के हाथों छोड़ दिया जिसके विधान में देर हो सकती है,��र अंधेर कभी नहीं। 🙏
राघवेन्द्र चतुर्वेदी 🔥
पुरुष का प्रेम!!
पुरुष का प्रेम कभी शोर नहीं करता, न ही वह किसी नुमाइश का हिस्सा बनता है। वह चूड़ियों की खनक या फूल���ं की महक में खुद को व्यक्त नहीं करता, बल्कि ज़िम्मेदारियों की भारी थकान में, रात की नींद त्यागकर की गई छोटी-छोटी देखभाल में अपना अस्तित्व जताता है। वह चुपचाप खड़ा रहता है, बिना किसी तारीफ़ की उम्मीद के, सिर्फ़ यह जानते हुए कि उसकी मौजूदगी ही उसकी सबसे बड़ी घोषणा है।
उसका इश्क़ शब्दों से कहीं ज़्यादा कामों में छिपा होता है। वह “आई लव यू” सौ बार दोहराने वाला नहीं होता, लेकिन रात को जब तुम ठंड से काँप रही होती हो, तो चुपके से तुम्हारा पैर अपनी ओर खींचकर चादर ठीक कर देता है।
सुबह की पहली चाय बनाने में नहीं, बल्कि ऑफिस से थका-हारा, धूल-धक्कड़ से भरा लौटकर भी तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान ला��े की कोशिश में उसका प्यार झलकता है।
वह तुम्हारी हर छोटी-बड़ी पसंद को अपनी आदत बना लेता है….चाहे वह तुम्हारा पसंदीदा खाना हो, तुम्हारा मनपसंद रंग हो, या वह गाना जो तुम बार-बार सुनती हो और अपनी हर तकलीफ़, हर दर्द, हर चोट को वह तुमसे छुपा लेता है, ताकि तुम्हारी चिंता न बढ़े।
पुरुष का प्रेम आँसुओं में नहीं बहता, क्योंकि उसके एक आँसू की कीमत पूरे परिवार की छत, उनकी सुरक्षा और उनकी मुस्कान होती है।वह आसानी से नहीं रोता, लेकिन जब टूटता है तो सिर्फ़ तुम्हारे सामने टूटता है, क्योंकि वह जानता है कि तुम ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी हो और उसी के साथ-साथ उसकी सबसे बड़ी ताकत भी, तुम्हारे सामने वह खुद को खोल देता है, क्योंकि वह विश्वास करता है कि तुम उसकी कमज़ोरी को कभी हथियार नहीं बनाओगी बल्कि उसे और मज़बूत बनाओगी।
उसका प्रेम गुलाब की पंखुड़ियों या महँगी डिनर में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से लड़कर तुम��हारा हाथ थामे रखने में है,वह बड़े-बड़े वादे कम करता है, लेकिन जो वादा करता है, उसे उम्र भर निभाता है।
“डर मत” कहकर तुम्हें तसल्ली नहीं देता,बल्कि चुपचाप तुमसे आगे खड़ा हो जाता है और हर मुश्किल का सामना खुद करता है।उसका इश्क़ बन-ठन कर, परफ्यूम लगाकर नहीं आता,वह पसीने से तर, धूल से सना, थकान से लदकर भी आता है, सिर्फ़ यह सुनिश्चित करने के लिए कि तुम सुरक्षित हो, कि तुम्हें कोई तकलीफ़ न हो।
वह तुम्हारे नख़रे सहता है, तुम्हारी छोटी-छोटी जिदें पूरी करता है, तुम्हारे ख़्वाबों को अपनी आँखों में सजाता है और अपने सारे सपनों को तुम्हारी एक हँसी के आगे कुर्बान कर देता है।जब तुम खुश होती हो, तो उसे लगता है कि उसने दुनिया जी ली है।
पुरुष का प्रेम समझना हो तो उसकी बातों को नहीं, उसकी ख़ामोशी को पढ़ो।उसकी आँखों में छिपी चुप्पी , उसके थके कंधों पर सवार जिम्मेदारी और उसकी उन छोटी-छोटी हरकतों को जो वह बिना बताए करता रहता है, यही उसका सच्चा प्रेम है।
हाँ, पुरुष का प्रेम ऐसा ही होता है।कम बोलता है, लेकिन जब बोलता है तो पूरा होता ���ै।वह जितना दिखाता नहीं, उससे कहीं ज़्यादा देता है। ख़ामोश रहकर भी इतना कुछ कह जाता है कि शब्दों की कोई किताब भी उसकी गहराई नहीं छू सकती।
यह प्रेम आँधी में खड़ा रहने वाला दीवार है, बारि�� में छाता बन जाने वाला हाथ है, और ज़िंदगी की हर लड़ाई में तुम्हारे साथ खड़े रहने वाला साथी है। यह प्रेम कभी थकता नहीं और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।बस आगे बढ़ता रहता है .. तुम्हारा हाथ थामे, तुम्हारी रक्षा करते, तुम्हें खुश रखते हुए।✨♥️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म