सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत के बयान के बाद शुरू हुई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ कैंपेन अब सोशल मीडिया पर बड़ा राजनीतिक और वैचारिक मुद्दा बनती जा रही है. एक्स पर कथित बैन के बाद ‘CJP is Back’ नाम से नया अकाउंट लॉन्च किया गया, जिसने कुछ ही घंटों में लाखों लोगों का ध्यान खींच लिया. कांग्रेस नेता, और समेत कई नेताओं ने इस पर प्रतिक्रिया दी है. अभिजीत दीपके का कहना है कि ये कैंपेन युवाओं की आवाज़ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है.
पाँच लघुकथाएँ
चड्डी-1
प्रभु:हे वत्स चड्डी छोड़ पैंट क्यों धारण की?
चडड्डीधारी:हे। प्रभो उन वस्त्र में शर्म आती थी इसलिए त्याग दिया।
प्रभु:जब अपने विचारों से शर्म आने लगे तो उन्हें भी त्यागना मत भूलना। वैसे शर्म जल्दी तुम्हें आनेवाली नहीं।कल्याण भव!
चड्डी-2
शब्दों का जाल, प्रेम का भ्रम, और बाकी सब सत्यानाश
लेखकों की दुनिया बड़ी मायावी है। लेखक शब्दों का जाल तो कागज पर बुनता है, पर उससे कहीं घना जाल उसके दिमाग में उलझा रहता है। लेखक की प्रेमिका होना आसान है, पत्नी होना मुश्किल, और अगर वह हिंदी लेखक हो तो बस सत्यानाश ही समझिए। ऐसे ही एक लेखक हैं हमारे श्री अष्टभुज, तखल्लुस ‘जालसाज’। नाम सुनकर हँसी आती है, पर वे खुद मानते हैं कि यह तखल्लुस उनके लिए जितना स्वाभाविक है, उतना ही उनके लिए जी का जंजाल है। उनकी पत्नी कहती हैं, “जाल तो तुम बुनते हो, पर उसमें फंसते हम ही हैं।”
तो हुआ यूँ कि एक दिन अष्टभुज जी के घर उनकी चचेरी बहन आ धमकी। ननद-भौजाई की गप्पें शुरू हुईं, और बातों-बातों में भौजाई ने ननद से पूछ डाला, “अपने भैया की शक्ल देखकर बताओ, क्या इनका कोई प्रेम-प्रसंग हो सकता है?” ननद ने पहले तो हँसी में टालने की कोशिश की, फिर बम फोड़ दिया, “लेखक हैं, कुछ न कुछ तो होगा ही।” भौजाई ने भवें चढ़ाईं, “अरे, बाल तो सफेद हो रहे हैं, अब भी?” ननद ने आग में घी डालते हुए कहा, “जब तक कलम चलेगी, शंका तो बनी रहेगी। लेखकों का कोई भरोसा नहीं।” और फिर दो-चार साहित्यिक उदाहरणों की ऐसी बौछार की कि अष्टभुज जी की आठों भुजाएं (या जितनी भी थीं) कांपने लगीं। उनकी पत्नी ने ऐसी तिरछी नजर से देखा, मानो कह रही हो, “लिखते तो तुम प्रेम कविताएँ हो, पर अब इसका हिसाब भी देना पड़ेगा।”
अष्टभुज जी लेखक बनकर पैदा नहीं हुए थे। उनकी कहानी शुरू हुई थी एक प्रेमपत्र से। जी हाँ, प्रेमपत्र। वह गुप्त दस्तावेज, जिसके लिए सैकड़ों कागजों की बलि चढ़ती है, और जिसके कारण लेखक के अंदर लेखन का अंकुर फूटता है। प्रेमपत्र लिखना आसान नहीं। सैकड़ों ड्राफ्ट कूड़े में जाते हैं, शब्दों की कब्रगाह बनती है, और फिर कहीं जाकर दो पंक्तियों की तुकबंदी बन पाती है। अगर वह पत्र सही ठिकाने पहुँच गया, तो समझिए एक नए प्रेम कवि का उदय होना तय है। वह विरह में डायरी भरेगा, मिलन में गीत रचेगा। और अगर पत्र गलत हाथों में गया या डाकखाने में गुम हो गया, तो वीर रस का कवि तैयार है, वह संसार से लड़ने को तैयार बैठा है। वर्तमान समय में इस से ड्राफ्ट में रह जाना या सेंड हो जाने की क्रिया समझ सकते हैं।
पहला प्रेम पत्र लिखने जब लेखक बैठता है तो फिर शुरू होती है घातक तुकबंदी। "तेरी आँखें में जो बादल है, उसके पीछे जग पागल है।"
अजी जग काहे पागल होगा। मन पागल है किया जाए। लेकिन किसका मन। नहीं जम नहीं रहा। बादल हटाए जाएँ। और कागज सीधा डस्टबिन में। शुरू से लिखा जाए "तिरछी नज़रों से देखा तूने तो ऐसा लगा.."
हट तिरछी नज़रों से काहे देखेगी। भेंगी थोड़ी है। और कागज गुड़ीमुडी होकर डस्टबिन के एक तरफ।
"तुम मधुवन में पुष्प सी, मैं भंवरे सा आवारा" और फिर, "नहीं, नहीं, ये तो बहुत घिसा-पिटा है!" दस कागज़ फटते हैं, बीस गालियाँ निकलती हैं (खुद को ही), और आखिरकार दो लाइन का एक ड्राफ्ट तैयार होता है। उन दो लाईनों में ही वो सब कुछ निचोड़ कर वह थोड़ा ग़ालिब ,थोड़ा दुष्यन्त और थोड़ा साहिर हो जाना चाहता है। वो ड्राफ्ट इतना नाजुक होता है कि लेखक उसे बार-बार पढ़ता है, जैसे उसके पढ़ने से वो तुकबंदी निखर जाएगी। प्रेमिका को वो पत्र मिलता है, तो वो हँस पड़ती है। और लेखक समझता है, कि थोड़ा बहुत गुलज़ार तो वो ही गया।
प्रेम वैसे भी मजबूत कलेजे वालों का खेल है। मजबूत कलेजे वाला लेखक एक साथ कई प्रेमिकाओं के लिए गद्य-पद्य रच डालता है। कमजोर कलेजे वाला बस डायरी में तड़पता है, और उसकी तड़प ही उसकी पहली किताब बन जाती है। कुछ कवि रह जाते हैं, कुछ जाले बुनते-बुनते गद्य की दुनिया में उतर आते हैं। शायद इसलिए कि बंदी तो याद रह जाती है, तुकबंदी याद रखना मुश्किल है। पर भावनाओं को ठूंसकर कहानी, व्यंग्य, या उपन्यास लिखना आसान है।
लेखक बनने की शुरुआत प्रेम से होती है। कोई मुस्कान, कोई काजल भरी आंख, या कोई ऐसी हंसी जो लेखक के दिल में स्याही बनकर उतर जाए। असली लेखक को प्रेमिका की जरूरत नहीं, उसे बस एक विचार चाहिए जो उसे रात-रात भर जागने को मजबूर कर दे, कागज़ पर दो लाइन लिखने के लिए दस कागज़ फाड़ने को विवश कर दे। जो एक विचार के ही प्रेम में पड़कर किताब लिख मारे लेखक तो वही है। और विचार तो अमूर्त चीज है, सो लेखक उसमें अपनी मनपसंद प्रेमिका गढ़ लेता है।
इसके आगे का हिस्सा प्रतिलिपि पर पढ़ें ...
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द करी ईटर!!
करी शब्द अंग्रेजी से लिया गया है। भारतीय व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाले ढेर सारे मसालों और के साथ पके हुए रसदार, ग्रेवी युक्त व्यंजन से बनी तरकारी ( तर= गीली, कारी ~ curry) को अंग्रेज करी कहते है।
और करी ईटर एक गाली है।
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ब्रिटिश का आम भोजन उबला, बिना तेल मसाले का होता है। यह उनका अपना कल्चर है। वे भारत मे आये। और अपने से अलग, तेल मसाले वाले भोजन रसदार को एक नए शब्द "करी" से परिभाषित किया।
और करी खाने वाले लोग उनके गुलाम थे।।काले या ताम्बई रंग के, छोटी हाइट के, दुबले पतले, शाकाहारी, अशिक्षित, बर्बर, हारी हुई कौम, जो उनके जूते तले रहती थी।
इसे एक शब्द में करी ईटर कहा गया।
जो एक गाली थी।
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आज भी यूरोप-अमेरिका में करी ईटर शब्द, साउथ एशियन्स (इंडो-पाक-बंग्लादेश) वालो के लिए एक जेनोफोबिक गाली है।
ठीक वैसे ही, जैसे हलाला पुत्र, चार बीवी चालीस बच्चे, जालीदार टोपी एक गाली है।
वैसे ही हिन्दू भी एक गाली है।
गाली की तरह इस्तेमाल करने वालो के लिए हिन्दू का मतलब होता था- चित्र विचित्र शक्लो वाली मूर्ति को भगवान समझने वाला, छोटी हाइट के, दुबले पतले, शाकाहारी, अशिक्षित, बर्बर, हारी हुई कौम, जो उनके जूते तले रहती थी।
याने मोहम्मद घोरी, गजनवी और दिल्ली सल्तनत के आरंभिक युग मे, रूलर्स से अलग जो "शासित कौम'' थे- याने तमाम बाम्हन, बनिया, शूद्र etc को वे कलेक्टिवली हिन्दू कहा जाता।
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आपके लिए करी एक व्यंजन है। आपके जीवन का सांस्कृतिक हिस्सा है। कायदे से इस पर शर्म गर्व कुछ नही है।
हलाल मीट, लहसुन प्याज मुक्त जैन भोजन, मारवाड़ी बासा, राजस्थानी और गुजराती थाली चलाने वाले, भारत और विदेश के सारे होटल रेस्तरां भोजन नही,इसी सांस्कृतिक कम्फर्ट को बेचते हैं।
पर जब इस प्रेफरेंस को एक जीनोफोबिक गाली के रूप में प्रचलित कर दिया जाये, तो यह पहचान का प्रश्न बन जाता है।
आपकी कौम का सम्मान इस साधारण चीज से जुड़ जाता है। तो एक दौर की गाली, अगले दौर में- "गर्व से कहो हम हिन्दू है" के नारे में कन्वर्ट हो जाती है।
करी ईटर क्रिश्चियन सुनीता विलियम्स और ऋषि सुनक हिन्दू सुप्रीमेसी के वाहक बन जाते हैं।
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सांस्कृतिक विभाजन की खाई चौड़ी होती है। आइसोलेशन बढ़ता है, और दो स्पस्ट कबीले बन जाते हैं। हर कबीला,अपनी हर चीज को ऊंचा कहता हैं।
फिर हास्यास्पद तर्क औऱ कटु विवाद होते हैं। कोई यज्ञ से पर्यावरण शुद्ध होने की थ्योरी देता है, कोई सजदे से होने वाले 5 वक्त के व्यायाम के फायदे बताता है।
एक वेज भोजन की गुणवत्ता बताता है। दूसरा काउंटर में प्रोटीन की जरूरत बताता है। तुम्हारे दुबलेपन या तोंदू होने, इतिहास में बार बार गुलाम होने का मजाक बनाता है।
जवाब में कोई किसी को कटुआ कहता है, कोई सरकमसीजन (खतना) के पीछे वैज्ञानिक तथ्य गिनाता है। उससे यौन शक्ति बढ़ने का दावा करता है।
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ये सब विशुद्ध मूर्खताएं है।
औऱ इसका मूल है- जीनोफोबिक गाली..
और यह जीनोफोबिक बायस इंडियन्स का स्वभाव है।
मित्र अमित चांदना कनाडा में ट्रक चलाते हैं। भारत मे यह छोटा काम है, वहां सम्मानजनक और कमाऊ। वे खूब घूमते है, मस्त जीते है, बीयर पीते है, बेटिंग करते है, और दुनिया को ठेंगे पर रखते हैं।
इस मस्तमौले पन की वजह से वे मुझे पसन्द हैं।
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लेकिन जीनोफोबिक पहलू नापसंद।
भारत का अन्य प्रदेश हो, या विदेश। जब आप दूसरी सोसायटी, दूसरी भूमि में रोजी रोटी, अच्छे जीवन, सुख सुकून मांगने जाते है। ठीक उस वक्त आपकी सारी सांस्कृतिक/धार्मिक/भौगोलिक/भाषाई/ उच्चता ध्वस्त हो जाती है।
आप सच मे इतने बेहतर ही होते तो कनाडाई भारत मे, औऱ मुम्बईकर पटना में माइग्रेट होता।
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जॉब और जीवन के लिए भागे भागे फिर रहे है। रस्सी जल गई, पर ऐंठ है कि जाती नही।
विदेश में जाकर, इंडिया-इंडिया करो। अपने धर्म, अपने जाति, अपनी भाषा का एक क्लोज बुलबुला बनाकर उसी में सांस लो। और फिर थोड़ा सेट हो गए, तो कंफर्टेबल होकर, वहां भी बजाप्ता हिन्दू मुसलमान करो।
गर्भ में डालकर जो नफरत लेकर गए, उसका प्रसव विदेश में करो। वहां भी नफरत फैला दो। फिर उसे रहने का नाकाबिल जगह बना दो। तब मार्स पर माइग्रेट कर जाना।
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अपने बायस, अपने सांस्कृतिक, जीनोफोबिक गालियां, किसी कम्युनीटी को खास तरह से पेंट करना ठीक नही।
4 दिन की जिंदगी है
मौज से जियो भाई
भगवान ने माथे पर लिखकर नही भेजा कि तू विश्व मे हिंदुत्व की उच्चता, मुस्लिमो की निम्नता, और करी के स्वाद का अभिप्रमाणक योद्धा बनने को पैदा किया गया है।
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जो विदेश में रहने वाले भारतीय है, वहां रहकर, भारत मे सहकार, शांति, प्रेम, बुद्ध औऱ गांधी को फैला सकें, तो ठीक।
वरना जो धरती छोड़ गए, उसे दूर से मीट करी न बनायें। भारत को उसके हाल पर छोड़ दें।
🙏