सांप अंकल ने दिया समर्थन, प्रशासन अब भी कुंडली मारकर बैठा!"
बोले—'इतना जहर तो हमारे पास भी नहीं!'
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गाजियाबाद जिला मुख्यालय धरना स्थल पर रविवार को एक अनोखा दृश्य देखने को मिला। जहां प्रशासन की आंखों पर संवेदनहीनता की पट्टी बंधी हुई है, वहीं जंगल समाज ने लोकतंत्र बचाने की जिम्मेदारी अपने फन पर उठा ली है। खबर है कि छठे दिन स्वयं "सांप अंकल" धरना स्थल पर पहुंचे और फुफकार कर अपना समर्थन दर्ज कराया।
यह घटना इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि जिन अधिकारियों को जनता की आवाज सुननी चाहिए थी, उनसे पहले एक सांप को हालात समझ में आ गए। अब सवाल यह है कि आखिर जंगल का जीव ज्यादा जागरूक है या हमारी व्यवस्था?
सांप अंकल ने मंच से कहा कि "हम पर तो बेवजह जहरीला होने का आरोप लगता है, लेकिन असली जहर तो उस व्यवस्था में है जो अन्याय देखकर भी चुप रहती है।" यह सुनकर वहां मौजूद लोग भावुक हो गए, जबकि कुछ अधिकारियों को शायद यह बयान सुनने के लिए भी एक विशेष आदेश की आवश्यकता होगी।
उधर पुलिस प्रशासन अपने वातानुकूलित कमरों में लोकतंत्र की धड़कन सुनने का प्रयास कर रहा है। समस्या बस इतनी है कि कमरों की दीवारें मोटी हैं, कांच साउंडप्रूफ हैं और संवेदनाएं शायद फाइलों के नीचे दब चुकी हैं।
अपूर्वा चौधरी और उनके साथी खुले आसमान के नीचे न्याय की मांग कर रहे हैं। छह दिन से धूप, धूल और संघर्ष उनके साथ हैं। मगर जिनके पास समाधान की चाबी है, वे मानो किसी और ग्रह की प्रशासनिक बैठक में व्यस्त हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि सांप अंकल बिना किसी सुरक्षा घेरे के आए, समर्थन दिया और चले गए। जबकि जनता की सुरक्षा का दावा करने वाली व्यवस्था अब तक यह तय नहीं कर पाई कि सच बोलना अपराध है या अधिकार।
लोकतंत्र का यह दौर बड़ा विचित्र है। यहां पत्रकार न्याय मांग रहा है, जनता समर्थन दे रही है, सांप एकजुटता दिखा रहा है और प्रशासन मौन साधे बैठा है। लगता है अगली बार अगर कोई और जीव समर्थन देने आए तो प्रशासन उसे भी ज्ञापन लेने के लिए आवेदन-पत्र भरने को कह देगा।
फिलहाल धरना जारी है, फुफकार जारी है और सवाल भी जारी हैं। अब देखना यह है कि पहले कौन जागता है—व्यवस्था, विवेक या फिर कोई और "सांप अंकल"।
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#journalistapoorva
@Bharatkbs@ghaziabadpolice यूपी की योगी जी की सरकार में पत्रकारो की भी आवाज नहीं सुनी जा रही हे ये बहुत ही निराशाजनक हे। क्या ये हे योगी जी की न्याय नीति???????