@Anujpratap24 DSP के पास आय से अधिक संपत्ति 300 करोड़ के स्रोत क्या है कहां से प्राप्त किया गया ,प्राप्त होने की वजह क्या थी ,जांच में जानकारी ली जानी चाहिए ताकि ये भी पता चले कि व्यवस्था में कहां कमी है और कौन लोग शामिल हैं शख्ति से पूछताछ होनी चाहिए
सिंगरौली मध्यप्रदेश पहले से ही कोयला खदान और पावर प्लांट्स का बड़ा केंद्र है NCL द्वारा संचालित यह नया कोल ब्लॉक Adani Group के सिंगरौली क्षेत्र में विस्तार का हिस्सा है जो सिंगरौली में धिरौली कोल ब्लॉक (लगभग 27 वर्ग किलोमीटर) का नया कोल आवंटन किया गया है, जिसमे 2143 हेक्टेयर में खनन किया जाएगा ।
सिंगरौली के गांव प्रभावित होंगे धिरौली, फटपानी, सिरस्वाह के साथ 8 गांव, खनन से 6.5 मिलियन टन कोयला प्रतिवर्ष निकाला जाएगा अडानी ग्रूप की सब्सिडियरी को 2025 में खनन शुरू करने की मंजूरी मिली है।
जिसके कारण घने सदाबहार जंगल लगभग 6 लाख पेड़ काटने की योजना है, जिसमें साल और टीक जैसे पेड़ शामिल हैं
आदिवासी समुदायों का 2022 से विस्थापन, मुआवजा, रोजगार और पर्यावरण क्षति को लेकर विरोध जारी है हाथी कॉरिडोर भी गंम्भीर रूप से प्रभावित हो जाएगा ।
धिरौली कोल ब्लॉक जिसमें 1436.19 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट की जा रही है जिसके कारण घने जंगलों का नुकसान होगा ये क्षेत्र पहले "No-Go Zone" के रूप में चिह्नित था ।
इससे हाथी-मानव संघर्ष बढ़ने के साथ ही 18 दुर्लभ/संरक्षित प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।
ओपन कास्ट माइनिंग से मिट्टी का कटाव, सिल्टेशन और जल स्रोतों में प्रदूषण और भूजल स्तर प्रभावित होगा सिंगरौली पहले से ही कोयला खदान + पावर प्लांट्स के कारण उच्च प्रदूषण वाला क्षेत्र है ।
अतिरिक्त खनन, कोयला परिवहन और धूल से वायु गुणवत्ता और खराब होगी।
हुर्डुल नाला गांवों के लिए पानी का मुख्य स्रोत है, लगभग 40% लोग इस पर निर्भर हैं इसके डायवर्ट होने पर जल संकट बढ़ेगा ।
प्रभावित 8 गांवों में करीब 13,000 परिवार प्रभावित बताए जा रहे हैं, जिनमें ज़्यादातर आदिवासी परिवार है उनको भूमि के बाजार मूल्य के आधार पर 4 गुना अधिक मुआवजा देना चाहिए जो नहीं दिया जा रहा है ।
इसी के साथ मकान है तो उसका अलग मुआवजा,तालाब,कुआं, वृक्षों का अलग मुआवजा देना चाहिए। हर परिवार को एक नौकरी , शिफ्टिंग भत्ता, आजीविका सहायता, शिक्षा-स्वास्थ्य की व्यवस्था भी किया जाना है।
धिरौली कोल ब्लॉक में किसानों की ज़मीन का बाजार मूल्य विवादित है।
मुआवजा की सरकारी प्रक्रिया RFCTLARR Act 2013 के तहत चल रही है कुल 554 हेक्टेयर निजी भूमि का अधिग्रहण हो रहा है, जिसमें फतपानी भी शामिल है कुल 49 पट्टाधारकों को कुल रु 18 करोड़ मुआवजा देने की बात है यानी 1 लाख 30 हजार प्रति एकड़ भूमि का मुआवजा दिया जाना है जो अत्यधिक कम है ।
औसत दर मानकर भी गणना करें तो प्रति एकड़ 32 लाख प्रति एकड़ भूमि का मुआवजा दिया जाना चाहिए ।
स्थानीय आदिवासी और कार्यकर्ता लगातार कह रहे हैं कि प्रभावित गांवों (धिरौली, फतपानी आदि) में सही मायने में ग्राम सभा नहीं बुलाई गई और लोगों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।
कुछ रिपोर्टों में आरोप है कि जो Gram Sabha के कागजात दिखाए जा रहे हैं, उसमें फर्जीवाड़ा हुआ है ।
त्रिभुवन सिंह
जन अधिकार परिषद छत्तीसगढ़
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सहमति,वन अधिकार कानून 2006,बनाम
परामर्श, पेसा कानून 1996
पेसा कानून 1996 पांचवी अनुसूची में आने वाले 10 राज्यों में लागू है छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड,ओड़िसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान,हिमाचल,गुजरात ।
पेसा का प्रमुख उद्देश्य लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, आदिवासी समुदाय का सशक्तिकरण,प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण,भूमि अधिकारों का संरक्षण, सतत विकास सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रथाओं का संरक्षण करना साथ हो जनजातीय अधिकारों के साथ विकास में भागीदारी सुनिश्चित करना ।
छत्तीसगढ़ राज्य में पेसा अधिनियम 2022 में लागू किया गया लेकिन आदिवासी समुदाय के सशक्तिकरण की दिशा में कमजोर साबित होता दिख रहा है क्योंकि राष्ट्रीयकृत खनिजों के मामले में ग्राम सभा के अधिकारों को सिमित करते हुए ग्राम सभा या पंचायत का परामर्श लेने को पेसा अधिनियम धारा 4 (¡) लागू कर ग्रामसभा की शक्ति को कम कर दिया गया है ।
जिसके कारण ग्राम सभा के द्वारा सकारात्मक लोकहित में उचित परामर्श को भी मानना बंधनकारी नहीं है वहां प्राधिकृत अधिकारी का निर्णय अंतिम हो जाता है ।
जिसका लाभ कारपोरेट को मिलता है और पेसा नियम कमजोर नजर आता है, और फिर चारो तरफ जंगल के विनाश और खनिजों के उत्तखनन का रास्ता खुल जाता है।
वहीं दूसरी तरफ फारेस्ट राईट एक्ट 2006 में वन भूमि के डायवर्सन के लिए स्पष्ट प्रावधान है कि ग्राम सभा की सहमति लेना अनिवार्य है ।
तो अनुसूचित क्षेत्रों के लिए लागू पेसा अधिनियम 2022 में किसी भी परियोजना को लागू करने से पहले ग्राम सभा की सहमति को क्यों नहीं लागू किया गया जबकि पेसा कानून ( 4 k/l )में लघु खनिजों के लिए ग्राम सभा का अनुमोदन आवश्यक है।
पेसा एक्ट में विकास योजनाओं के अनुमोदन का अधिकार प्राप्त है । लघु वनोपज का मालिकाना,भूमि अलगाव रोकना साथ ही स्थानीय विवादों का समाधान करने का अधिकार है।
वनभूमि और राजस्व भूमि सहित परियोजना में ग्रामसभा से दोनों तरह से यानी FRA Act के तहत सहमति लेना अनिवार्य है और PESA Act के तहत परामर्श लेना जरूरी है ।
इसी अन्तर को देखते हुए प्रशासनिक अधिकारी परियोजनाओं के लिये भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाओं को प्रभावित के कर आम जन के लिए जटिल बना देते हैं ।
जिसके कारण परियोजना क्षेत्रों में भूमिस्वामियों और प्रभावित लोगों के अन्दर असंतोष के कारण विवादित परिस्थितयां उत्तपन्न होती है और आक्रोशित जन ,आन्दोलन के लिए आगे आते हैं , जिसका प्रमुख कारण पारदर्शी व्यवस्था का अनुपालन नहीं करना है ।
भूमि अधिग्रहण और खनिजों के उत्तखनन की प्रक्रियाओं को कई नियमों निर्देशों के अंतर्गत कार्य करना पड़ता है जैसे ,,,
लार अधिनियम 2013,खान एवं खनिज अधिनियम 1957,वन संरक्षण अधिनियम 1980, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986,पर्यावरण प्रभाव आंकलन अधिनियम 2006,जैव विविधता अधिनियम 2002,अनुसूचित जन जाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम 2006 पेसा अधिनियम 1996, जल अधिनियम 1974, वायु अधिनियम 1981,
अधिग्रहित क्षेत्रों को नियमों की व्याख्या में फंसा कर कई प्रकार के प्रभावी अधिनियमों के उलंघन और विसंगतियों के कारण विवाद उत्तपन्न होने से मुआवजा,पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन एवं अन्य सुविधाओं से वंचित हो जाते हैं
और नियमों का पालन नहीं होने से ग्रामीणों में असंतोष के कारण परियोजनाएं आन्दोलन की भेंट चढ़ जाते हैं ।
वन भूमि,राजस्व भूमि, एवं भूस्वामियों की भूमि के एवज में परस्पर तुलना करें तो बहुत विसंगतियों का सामना करना पड़ता है R&R का भी पालन नहीं होता और भूमि अधिग्रहण की शर्तों में भिन्नता होती है जहां भारतीय संविधान की आर्टिकल 13 और 14 का पालन नहीं होने से प्रभावित लोगों को अपूर्णीय क्षति होती है ।
त्रिभुवन सिंह
जन अधिकार परिषद,छत्तीसगढ़
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राम मंदिर में की गई चोरी गड़बड़ी और धार्मिक आस्था के केंद्र में अमानत में खयानत करना गंम्भीर आपराधिक कृत्य है और वो भी ऐसे लोगों के द्वारा जो राम के नाम पर सत्तासीन हुए हैं,उनके सब करीबी हैं,,
आम भक्त श्रद्धालु की आस्था के साथ विश्वास घात किया गया है जिससे सत्ताधारी दल के चाल चरित्र और चेहरा का और कितने बार पर्दाफाश होगा,,,
धार्मिक केंद्रों में हेराफेरी,प्राकृतिक संसाधनों की लूट,सार्वजनिक संस्थानों की दलाली,चारो तरफ अराजकता, लूटमार, अन्याय,अत्याचार,शोषण,,,,अंधेर नगरी
राम मंदिर में की गई चोरी गड़बड़ी और धार्मिक आस्था के केंद्र में अमानत में खयानत करना गंम्भीर आपराधिक कृत्य है और वो भी ऐसे लोगों के द्वारा जो राम के नाम पर सत्तासीन हुए हैं,उनके सब करीबी हैं,,
आम भक्त श्रद्धालु की आस्था के साथ विश्वास घात किया गया है जिससे सत्ताधारी दल के चाल चरित्र और चेहरा का और कितने बार पर्दाफाश होगा,,,
धार्मिक केंद्रों में हेराफेरी,प्राकृतिक संसाधनों की लूट,सार्वजनिक संस्थानों की दलाली,चारो तरफ अराजकता, लूटमार, अन्याय,अत्याचार,शोषण,,,अंधेर नगरी
राम मंदिर में की गई चोरी गड़बड़ी और धार्मिक आस्था के केंद्र में अमानत में खयानत करना गंम्भीर आपराधिक कृत्य है और वो भी ऐसे लोगों के द्वारा जो राम के नाम पर सत्तासीन हुए हैं,उनके सब करीबी हैं,,
आम भक्त श्रद्धालु की आस्था के साथ विश्वास घात किया गया है जिससे सत्ताधारी दल के चाल चरित्र और चेहरा का और कितने बार पर्दाफाश होगा,,,
धार्मिक केंद्रों में हेराफेरी,प्राकृतिक संसाधनों की लूट,सार्वजनिक संस्थानों की दलाली,चारो तरफ अराजकता, लूटमार, अन्याय,अत्याचार,शोषण,,,,अंधेर नगरी
आषाढ़ प्रथम दिवस
नेता या टिटहरी
सिर और गर्दन का आगे-पीछे का हिस्सा काला, सफेद गालों की पट्टी, लाल चोंच (नोक काली), आँखों के सामने लाल गलचर्म पीठ हल्की भूरी-बैंगनी चमक वाली, पेट सफेद, पैर पीले और लंबे आँखों मे चमक,आवाज़ तेज़ और चीख़ भरी अक्सर "टिट-टिट" या "डिड-ही-डू-इट" जैसी सुनाई देती है।
खतरा महसूस होने पर जोर-जोर से चिल्लाती है, इसलिए इसे "प्रकृति का अलार्म" भी कहते हैं।
यह सहज है, लेकिन अनुभव से बेहतर होता जाता है।
टिटहरी अलग-अलग शिकारियों के लिए अलग-अलग स्तर की नाटकीयता दिखा सकती है अगर आप घोंसले के पास जाएँ तो देख सकते हैं ये नाटक करते हैं जैसे पैर टूट गया है, पँखों में चोट लगी है लड़खड़ाकर चलते हुए अपने अंडों से दूर भ्रम जाल फैलाकर बचाने का उपक्रम करती है, ऐसा कर खतरों से दूर ले जाकर ,,,,अचानक उड़ जाती है !!!!!!
जैसे नेता सत्ता में आने के बाद प्रकृति का,जलवायु परिवर्तन का, पर्यावरण का, विनाश के शर्त पर विकास का नाटक मात्र कर सत्ता सुख भोगने में व्यस्त और लिप्त रहता है??????
विपक्ष या चातक
दूसरी तरफ सत्ता विहीन विरह की पीड़ा चातक की प्यास जैसे चातक बरसात की एक बूंद के लिए तरसता है, वैसे ही नेता सत्ता के लिए व्याकुल है।
चातक ज़मीन के गंदे पानी को कभी छूता नहीं केवल स्वच्छ वर्षा जल। यही उच्च आदर्श का प्रतीक है।
मानसून की आस, चातक का आगमन,मानसून का संकेत है। मेघदूत में बादल जैसे चुनाव लाने वाला है, जो विरह को समाप्त कर मिलन का साधन बनेगा।
कालिदास प्रकृति को मानवीय भावनाओं से जोड़ते हैं,टिटहरी और चातक के माध्यम से वे दिखाते हैं कि समूची प्रकृति भी विरह-मिलन के चक्र में बँधी है!!!!
टिटहरी अपने नाटकीय अंदाज में सत्ता संरक्षण करने का उपक्रम कर रहे हैं तो दूसरी तरफ चातक आषाढ़ के प्रथम दिवस वर्षा की एक बूंद के लिए
जैसे सत्ता की आस लगाए बैठे हैं??????
देश की जनता उल्लू बन बैठी और चमगादड़ बन उल्टा ?????
पर्यावरण संरक्षण बनाम सत्ता संरक्षण
@ravishndtv@dblive15@ashok_kashmir@sheeetalps@ranvijaylive@mayurjani@deepakSEditor@TheKPMalik
आषाढ़ प्रथम दिवस
नेता या टिटहरी
सिर और गर्दन का आगे-पीछे का हिस्सा काला, सफेद गालों की पट्टी, लाल चोंच (नोक काली), आँखों के सामने लाल गलचर्म पीठ हल्की भूरी-बैंगनी चमक वाली, पेट सफेद, पैर पीले और लंबे आँखों मे चमक,आवाज़ तेज़ और चीख़ भरी अक्सर "टिट-टिट" या "डिड-ही-डू-इट" जैसी सुनाई देती है।
खतरा महसूस होने पर जोर-जोर से चिल्लाती है, इसलिए इसे "प्रकृति का अलार्म" भी कहते हैं।
यह सहज है, लेकिन अनुभव से बेहतर होता जाता है।
टिटहरी अलग-अलग शिकारियों के लिए अलग-अलग स्तर की नाटकीयता दिखा सकती है अगर आप घोंसले के पास जाएँ तो देख सकते हैं ये नाटक करते हैं जैसे पैर टूट गया है, पँखों में चोट लगी है लड़खड़ाकर चलते हुए अपने अंडों से दूर भ्रम जाल फैलाकर बचाने का उपक्रम करती है, ऐसा कर खतरों से दूर ले जाकर ,,,,अचानक उड़ जाती है !!!!!!
जैसे नेता सत्ता में आने के बाद प्रकृति का,जलवायु परिवर्तन का, पर्यावरण का, विनाश के शर्त पर विकास का नाटक मात्र कर सत्ता सुख भोगने में व्यस्त और लिप्त रहता है??????
विपक्ष या चातक
दूसरी तरफ सत्ता विहीन विरह की पीड़ा चातक की प्यास जैसे चातक बरसात की एक बूंद के लिए तरसता है, वैसे ही नेता सत्ता के लिए व्याकुल है।
चातक ज़मीन के गंदे पानी को कभी छूता नहीं केवल स्वच्छ वर्षा जल। यही उच्च आदर्श का प्रतीक है।
मानसून की आस, चातक का आगमन,मानसून का संकेत है। मेघदूत में बादल जैसे चुनाव लाने वाला है, जो विरह को समाप्त कर मिलन का साधन बनेगा।
कालिदास प्रकृति को मानवीय भावनाओं से जोड़ते हैं,टिटहरी और चातक के माध्यम से वे दिखाते हैं कि समूची प्रकृति भी विरह-मिलन के चक्र में बँधी है!!!!
टिटहरी अपने नाटकीय अंदाज में सत्ता संरक्षण करने का उपक्रम कर रहे हैं तो दूसरी तरफ चातक आषाढ़ के प्रथम दिवस वर्षा की एक बूंद के लिए
जैसे सत्ता की आस लगाए बैठे हैं??????
देश की जनता उल्लू बन बैठी और चमगादड़ बन उल्टा ?????
पर्यावरण संरक्षण बनाम सत्ता संरक्षण
त्रिभुवन सिंह
मैनपाट की 3500 फिट की ऊंचाई और लाल माटी भौगोलिक सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक तथा पर्यटन के रूप में महत्वपूर्ण बनाती हैं और बॉक्साइट,लेटेराइट और नदियों के उद्द्गम और झरनों के कारण यह छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है । मिनी तिब्बत भी कहा जाता है मैनपाट लगभग 390 वर्ग किलोमीटर में फैला है ।
जहां प्रचुर मात्रा में बॉक्साइट है जिसका उत्खनन पहले किया गया विरोध हुआ लेकिन निहित स्वार्थवश आन्दोलन कामयाब नहीं हो सका,लगभग 600 हे, भूमि से बॉक्साइट उत्खनन पूर्व में जारी थी एक बार फिर से 550 हे भूमि मैनपाट क्षेत्र से उजाड़ने का षड्यंत्र जारी है ।
वहीं दूसरी तरफ मैनपाट क्षेत्र के निवासी और सामाजिक संस्थाओं तथा पर्यावरण प्रेमियों ने उत्खनन का विरोध शुरू किया है जनसुनवाई की जा रही है लेकिन प्रभावित क्षेत्र से दूरी पर मात्र औपचारिकता की जा रही है जो उचित नहीं ।
मैनपाट क्षेत्र के भूगर्भीय संरचनाओं को यदि समझे तो बेसाल्ट नीस ग्रेनाईट निचली सतह पर फिर केओलिनाइट बाक्साइट लेटेराइट और सबसे ऊपर लाल बलुआ मिट्टी की सतह जो लगभग 3 इंच से लेकर 4 मी की मोटी परत विभिन्न स्थानों पर मिलती है ।
मैनपाट का क्षेत्र साल के घने जंगल जहाँ साजा, बीजा, धावड़ा, महुआ, चार,
तेंदू ,जामुन,हर्रा, बहेड़ा आँवला और ऊंचाई के कारण हिमालयी प्रजाति जैसे चीड़ औषधीय पौधे एवं अन्य महत्वपूर्ण वनस्पतियों से आच्छादित मैनपाट अब पर्यावरणीय क्षति का संकट झेल रहा है जैव विविधता समाप्त होने के कगार पर है ।
मैनपाट को ही नहीं सरगुजा संभाग के पर्यावरण को बचाने
में असफल होता दिख रहा है जहां इमारती लकड़ियों की तस्करी,जंगल कटाई ,जंगल को आग से बचाने वन विभाग असफल रहा और अब खनिज उत्खनन के नाम पर जंगलों और वनस्पतियों को समाप्त कर रहे हैं । जिसके कारण मिट्टी की परत निरंतर क्षरण अपरदन के कारण बह कर समाप्त हो रही है और मैनपाट एक पथरीला और बंजर पाट के रूप में परिवर्तित हो रहा है।
मैनपाट क्षेत्र का तापमान पहले 0 डिग्री से 35 डिग्री तक रहता था वनस्पतियों के अंधाधुंध क्षति से वर्तमान में 3 डिग्री से लेकर 42 डिग्री तक तापमान चला जाता है ये जलवायु परिवर्तन के खतरनाक संकेतक हैं ।
मैनपाट के उत्खनन जंगल की कटाई और वनस्पतियों की बर्बादी के कारण पाट का क्षेत्र भूस्खलन की ओर तेजी से बढ़ रहा है और छोटे छोटे भूस्खलन वर्षा काल मे निरंतर होते रहते हैं, भूमि निरंतर बंजर हो रही है बड़ी-बड़ी दरारें पाट के ऊपर आसानी से देखी जा सकती है जो लगभग 1 से 2 मीटर तक चौड़ी दरारें लगभग 100 से 500 मीटर तक देखी जा सकती है ।
मैनपाट का क्षेत्र पारगम्य है लेटेराइट और बॉक्साइट की सरंध्रता के कारण वर्षा का जल मैनपाट की भूमि में समाहित संतृप्त होता है और अधो सतही जल प्रवाह के कारण ही मैनपाट पठार से बड़ी नदीयां मांड, रेहन ,गुमा, जटाशंकर ,इब, केलो और कई छोटे गदपानी नाला,टाईगर नाला, मछली नाला,उल्टा नाला, भुतही नाला,बाघ नाला आदि के प्रवाह के आकलन से यह पता चलता है कि उनकी प्रवाह की गति कम होती जा रही है और मैनपाट क्षेत्र में भूमिगत जल स्तर नीचे जा रहा है ।
अगर अभी भी हम सब जागरूक नहीं हुए तो एक दिन निश्चित ही मैनपाट प्राकृतिक रूप से परिपूर्ण हरियाली और समुद्र सतह से लगभग 3500 फिट का पठारी क्षेत्र एक दिन पथरीला, बंजर मैनपाट में बदल जायेगा ।
मैनपाट की मिट्टी में अब आलू , टाउ और अन्य खेती करना कठिन हो रहा है। कृषि पर आधारित जीवन से मैनपाट के तिब्बती, आदिवासी जनजातीय ,यादव एवं अन्य जातियों की जीवनशैली बदहाली के दौर से गुजरने मजबूर होंगे, मैनपाट के 10 बड़े झरने जो 40 से 300 फिट की ऊंचाई से गिरते हैं समाप्त हो जाएंगे,7 नदियों का जल प्रवाह कम हो रहा है, 6 नाले सूखने के कगार पर हैं ।
अकाल की परिस्थितियों को भोगने के लिए मैनपाट और तराई के क्षेत्रों में रहने वाले लोग तैयार रहें, तराई क्षेत्र के गुनघुटा बाँध,बरनई बाँध का जल क्षेत्र कम हो जाने से सिंचाई का क्षेत्र कम होगा,छोटे बाँध सुख जाएंगे खेती का रकबा 70% कम हो जाएगा ।
गोदावरी,महानदी,और गंगा बेसिन पर भी विपरीत पर्यावरणीय प्रभाव पड़ेगा ।
छत्तीसगढ़ का शिमला कहे जाने वाला मैनपाट का क्षेत्र मनोहारी प्राकृतिक भौगोलिक महत्व के कारण पर्यटन उद्योग के विकास के लिए अनुकूल है जहाँ धार्मिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक एवं पर्यावरणीय लगभग 30 स्थल ऐसे हैं जिनके विकास से लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे ।
मैनपाट बचाओ सरगुजा बचाओ
त्रिभुवन सिंह
भू जल विशेषज्ञ,पर्यावरण संरक्षक
7999560210
वही सीनियर नेता तो बूथ वाले नेता बनाने की मात्र औपचारिकता पूरी करते हैं तो जमीनी पकड़ वाले नेता या कार्यकर्ता कहाँ से आएंगे ,,,,प्रायः सब सीनियर नेताओं ने गोलमाल कर रखा है,
युवा पीढ़ी को आगे जिम्मेदारी देने से, प्रशिक्षित करने से, कांग्रेस संगठन में एकजुटता आ सकती है जो स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ संघर्ष से सफलता मिलेगी,
जिनके अन्दर प्रकृति से प्रेम नहीं होता ,!!!
पर्यावरण के प्रति चेतना नहीं होती,!!!
जीव जंतुओं से लगाव नहीं, !!!
तो क्या मनुष्यता है????
सबसे अधिक चिन्तनीय विषय यह है कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति चिन्ता भी नहीं संवेदना भी नहीं,,,,!!!
ऐसे ही मगरूर नेता अपनी मान मर्यादा की मृगतृष्णा में भटक रहे हैं और आम जन जीवन का सत्यानाश करने पर तुले हैं,,,!!!
@bhupeshbaghel छत्तीसगढ़ को आपके नेतृत्व की आवश्यकता है,,,,
अभी भी संगठन ने ऐसी कोई संगठनात्मक गतिविधियों की शरूआत नहीं कि है जिससे गांव गांव तक संगठन मजबूत हो सके,,,
लोग अपनी पद प्रतिष्ठा तक ही सीमित हैं नए लोगों को जोड़ने का कोई प्रयास नहीं दिखता और ना ही कार्यकर्ताओं का कोई कदर है,,,,