खैर गर्दिशों में चल रहे हैं तारे अभी ,
फिर भी मांग नहीं रहे हैं सहारे अभी ,
यह घुटनों के बाल रेंगने वाले मुझ पर हंस रहे हैं ,
मेरी सोच से वाकिफ नहीं है बेचारे अभी...!!
बिन पेंदी का लोटा हर सुनवाई के बाद नई दिशा में लुढ़कता है—फैसला मन का हो तो जज निष्पक्ष और सरकार महान; उल्टा पड़े तो दोनों बेईमान!
बस एक सिद्धांत अटल है—कुछ भी हो, चंदा चाहिए, QR कोड अपनी जगह अटल रहेगा! 😆
लोटा भी फूटा है जनाब—चंदा कहाँ टिकता है, यह पूछना मना है! 😏
कभी आंदोलन की ओर, कभी चुनाव की ओर—इस लोटे का लुढ़कना जारी रहेगा .......(to be contd.).............,,,
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वाह शर्मा जी
मतलब आपके हिसाब से न्याय क्या कहता है कि किसी मेहनती बेगुनाह की बलि चढ़ा कर भीड़ को खुश कर दें।
क्या आपके लिए मेहनत और ईमानदारी से चयनित छात्र का कोई मोल नहीं है।
वोट बैंक के लिए भीड़ का हिस्सा बन जाइए, वो गलत है या सही उसका ऑथेंटिसिटी से कोई मतलब नहीं।
गजबे हिपोक्रेसी है भाई।
JSSC CGL के चयनित अभ्यर्थियों ने रांची प्रेस क्लब में प्रेस वार्ता कर अपनी बात रखी। अभ्यर्थियों ने कहा कि वे वर्तमान में नौकरी कर रहे हैं, लेकिन उन पर पैसे देकर नौकरी हासिल करने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
चयनित अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने वर्षों की मेहनत और पढ़ाई के बाद परीक्षा पास की है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जो भी दोषी मिले, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए, लेकिन बिना दोष साबित हुए सभी चयनित अभ्यर्थियों की नौकरी रद्द करना उचित नहीं है।
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कोई कहता है "गेहुँ के साथ घुन भी पिसता है "
पर यहाँ तो थोड़ा सा घुन के लिए पूरा खलिहान ही जलाया जा रहा है।
600 लड़के ऐसे है जिन्होंने दूसरी केंद्रीय नौकरी तक छोड़ दी, सिर्फ इसलिए कि अपने राज्य, अपनी माटी की सेवा कर सके।
इसमें 600 ST भाई -बहन है जिन्होंने पहली बार अपने गांव में उम्मीद जगाई थी कि हम भी कुछ बन सकते है।
कहीं गड़बड़ी हुई है तो दोषी को सजा दो, और निर्दोषों को न्याय दो।
सत्य चाहे देर से आए पर जीतेगा तो मेहनत ही।
@HemantSorenJMM@JmmJharkhand@RahulGandhi@The_FollowUp@yourBabulal
#JSSC_CGL
#मेहनत_की_जीत
कुणाल प्रताप सिंह@kunalpratap86द्वारा माननीय झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान एवं पूरी न्यायपालिका को लेकर दिए गए कथित बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच से यह दावा करता है कि “हाईकोर्ट बिक गया है”, तो यह केवल एक सामान्य टिप्पणी नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
ऐसे गंभीर आरोपों के साथ ठोस प्रमाण और तथ्य भी सामने रखे जाने चाहिए। सवाल यह है कि इस दावे का आधार क्या है? कौन-से तथ्य या दस्तावेज इस आरोप को प्रमाणित करते हैं?
लोकतंत्र में सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका से सवाल पूछने का अधिकार सभी को है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाते समय शब्दों के साथ जिम्मेदारी और प्रमाण भी जरूरी हैं।
इसलिए संबंधित व्यक्ति को स्पष्ट करना चाहिए कि—
आरोप का आधार क्या है? प्रमाण क्या हैं? और यह दावा किन तथ्यों के आधार पर किया गया?
न्यायपालिका की आलोचना हो सकती है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर आरोप बिना प्रमाण के नहीं लगाए जाने चाहिए।
#JharkhandHighCourt #Judiciary @kunalpratap86@dgpjh@hemantsoren@JmmJharkhand@JharkhandPolice@The_FollowUp@yourBabulal
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भाजपा को अब ख़ुद अपनी CBI पर भरोसा नहीं रहा
और
इसे वह स्वीकार भी कर रहे हैं। देश की हवा बदल रही है - बंद तोता लगता है आज़ाद होना चाह रहा है।
साथ ही,
@JmmJharkhand पर सवाल उठाने से पहले थोड़ा कानून भी पढ़ लीजिए।
General Consent वापस लेना और यह कहना कि CBI राज्य सरकार के अधिकारियों की जांच करने से पहले सरकार से अनुमति ले, दोनों एक बात नहीं हैं।
और अगर CBI पर भरोसे का सवाल ही है, तो भाजपा शासित राज्यों में CBI की जांच को लेकर यही सवाल आप अपनी ही पार्टी से क्यों नहीं पूछते?
जब CBI की स्वायत्तता की बात आती है तो भाजपा को हर जगह “सहयोग” चाहिए, लेकिन जब जांच की दिशा अपने लोगों तक पहुँचती दिखे तो अचानक पूर्व अनुमति, प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र याद आने लगते हैं।
दूसरों के पुराने फैसले गिनाने से पहले अपने वर्तमान फैसले का जवाब दीजिए।
दोहरे मापदंड की राजनीति बंद कीजिए। 🔥