अगर हम आपको बताएँ कि... एक समय ऐसा भी था जब भारतीय खाना तीखा नहीं होता था?
आज जिस लाल और हरी मिर्च के बिना हमें दाल, सब्ज़ी, चाट या करी अधूरी लगती है, वह कभी भारतीय रसोई का हिस्सा थी ही नहीं।
सुनने में अजीब लगता है, लेकिन सच यही है।
मिर्च की उत्पत्ति दक्षिण और मध्य अमेरिका में हुई थी। इसे 15वीं–16वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारी अपने साथ भारत लेकर आए।
अब आपका सवाल होगा....तो फिर उससे पहले भारतीय खाना तीखा कैसे होता था?
उस समय हमारी रसोई में काली मिर्च, पिप्पली (लॉन्ग पेपर) और अदरक—स्वाद और तीखेपन का काम करते थे। आज भी भारत के कई पारंपरिक मंदिरों के भोग और धार्मिक व्यंजनों में लाल या हरी मिर्च की जगह काली मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है—एक ऐसी परंपरा, जो उस दौर की याद दिलाती है जब मिर्च भारत पहुँची ही नहीं थी।
जब पुर्तगाली व्यापारी गोवा के रास्ते मिर्च लेकर भारत आए, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटा-सा फल एक दिन भारतीय खाने की पहचान बन जाएगा। लेकिन भारतीय पहले से ही तीखेपन के आदी थे। मिर्च यहाँ की मिट्टी में खूब फली-फूली, किसानों ने इसे अपनाया और रसोइयों ने अपने मसालों में इस तरह शामिल किया कि आज इसे भारतीय भोजन से अलग सोच पाना लगभग नामुमकिन है।
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े मिर्च उत्पादकों और निर्यातकों में गिना जाता है। कश्मीर की तीखी मिर्च, राजस्थान की मथानिया मिर्च, आंध्र प्रदेश की गुंटूर मिर्च, कर्नाटक की ब्यादगी मिर्च और नागालैंड की राजा मिर्च जैसी अनगिनत किस्में आज देश ही नहीं, दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखती हैं।
शायद यही भारतीय भोजन संस्कृति की सबसे बड़ी खूबसूरती है। हमारी रसोई ने बाहर से आए स्वादों को सिर्फ़ अपनाया नहीं, बल्कि उन्हें इतना अपना बना लिया कि आज पूरी दुनिया उन्हें भारतीय पहचान के साथ जोड़ती है।
आज मिर्च भले ही भारत में पैदा न हुई हो... लेकिन इसकी सबसे यादगार कहानी शायद भारत की रसोई में ही लिखी गई।
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अगर कोई आपसे पूछे कि भारत की सबसे बड़ी डिश कौन-सी है… तो शायद आप किसी एक नाम पर नहीं रुक पाएँगे।
क्योंकि भारत में खाना सिर्फ़ पेट भरने के लिए नहीं बनता। यहाँ हर डिश के पीछे एक कहानी है, एक परंपरा है और सबसे बढ़कर—लोगों को एक साथ लाने की भावना है।
शायद यही वजह है कि जब भी किसी भारतीय व्यंजन ने Guinness World Records में जगह बनाई, तो उसने सिर्फ़ अपने आकार या वज़न का रिकॉर्ड नहीं बनाया… उसने दुनिया को भारत की सामूहिक ताकत भी दिखाई।
ज़रा सोचिए…
- 14 टन से ज़्यादा की बिरयानी, जिसे सैकड़ों लोगों ने मिलकर बनाया।
- 918 किलो की खिचड़ी, जिसे रिकॉर्ड बनने के बाद ज़रूरतमंद लोगों में बाँट दिया गया।
- 29 टन से भी ज़्यादा का बूंदी का लड्डू, जिसने त्योहारों की मिठास को दुनिया तक पहुँचाया।
- 16.68 मीटर लंबा डोसा, जिसने दक्षिण भारत की पाक-कला को नई पहचान दी।
- और 145 किलो की रोटी… हाँ, वही रोटी, जो हर भारतीय घर की सबसे साधारण चीज़ मानी जाती है, लेकिन उसने भी एक विश्व रिकॉर्ड बना दिया।
लेकिन इन रिकॉर्ड्स की सबसे खूबसूरत बात इनका आकार नहीं है।
इनमें से हर डिश भारत के अलग-अलग हिस्सों से आती है। अलग भाषा, अलग संस्कृति, अलग स्वाद… लेकिन जब बात खाने की होती है, तो पूरा देश एक साथ नज़र आता है।
यही भारतीय भोजन की सबसे बड़ी ताकत है।
हमारे यहाँ खाना सिर्फ़ एक रेसिपी नहीं है। यह लोगों को जोड़ता है, त्योहारों को यादगार बनाता है और अलग-अलग समुदायों को एक साथ लेकर आता है।
इसलिए अगली बार जब आप बिरयानी, खिचड़ी, डोसा, लड्डू या रोटी खाएँ, तो याद रखिए…ये सिर्फ़ व्यंजन नहीं हैं।
ये भारत की उस विरासत का हिस्सा हैं, जिसने अपने स्वाद के साथ-साथ दुनिया भर में अपनी पहचान भी बनाई है।
शायद सच ही कहा गया है, भारत में रिकॉर्ड अकेले नहीं बनते… मिलकर बनाए जाते हैं, और जब बात खाने की हो, तो हम भला अलग कैसे रह सकते हैं? यहाँ तो एक कप चाय पर भी पूरी बैठक हो जाती है… फिर सोचिए, जब बात बिरयानी, खिचड़ी या लड्डू की हो!
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राजस्थान की मिठास की बात हो और घेवर का नाम न आए, ऐसा कैसे हो सकता है?
जालीदार कुरकुरा घेवर, ऊपर से मलाईदार रबड़ी और साथ में बादाम-पिस्ता… हर बाइट में स्वाद भी है और राजस्थान की परंपरा भी। खासकर सावन और तीज के मौसम में घेवर सिर्फ मिठाई नहीं, एक एहसास बन जाता है।
आपको कौन सा घेवर सबसे ज्यादा पसंद है, सादा, मलाई या मावा?
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Breastfeeding is not just a mother's responsibility; it is a shared commitment.
A mother's journey becomes stronger when she is supported by her family, healthcare professionals, workplaces, and society.
This #WorldBreastfeedingWeek, let us strengthen the support systems that empower every mother to give every child the healthiest possible start in life.
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Simple habits often create the biggest impact!
A balanced diet, regular physical activity, routine health check-ups for early detection, and stress management through yoga and pranayama remain the cornerstones of lifelong wellness. Prevention is always more powerful than cure.
A wonderful contribution by @drmohanv in today’s Times of India Health+ special edition, “Your Alphabet for Mindful Living,” highlighting everyday habits that help build a healthier India.
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कुछ मिठाइयाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर लोग पूछते हैं—"ये क्या है?"
"नारियल का लच्छा" ऐसी ही एक मिठाई है।
आज की पीढ़ी, और खास तौर पर GEN Z ने इसका नाम भी शायद पहली बार सुना होगा। लेकिन एक समय था जब बिहार, खासकर पटना और आसपास के इलाकों में, यह मिठाई त्योहारों, मेलों और मिठाई की दुकानों की शान हुआ करती थी।
दिखने में यह बहुत साधारण सी लगती है। लेकिन इसकी असली खूबसूरती इसकी बनावट में है, इसमें नारियल का हर रेशा अलग दिखाई देता है और हर निवाले में नारियल की natural मिठास होती है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में नारियल से बनी कई पारंपरिक मिठाइयाँ हैं। कहीं बर्फी बनाई जाती है, कहीं लड्डू, कहीं पाक... लेकिन नारियल का लच्छा की अपनी अलग पहचान उसकी महीन कतरणों और हल्की मिठास की वजह से बनती है।
आज यह मिठाई पहले जैसे आसानी से नहीं मिलती। बदलती पसंद, नई मिठाइयों का बढ़ता चलन और समय लेने वाली पारंपरिक विधियों ने इसे धीरे-धीरे हमारी रोज़मर्रा की मिठाई की दुकानों से दूर कर दिया है।
लेकिन शायद यही वजह है कि नारियल का लच्छा सिर्फ़ एक मिठाई नहीं, बल्कि हमारी पाक विरासत का एक ऐसा स्वाद है जिसे फिर से पहचान दिलाने की ज़रूरत है।
क्योंकि भारत की सबसे खूबसूरत रेसिपीज़ हमेशा सबसे मशहूर नहीं होतीं...कई बार वो वही होती हैं, जिन्हें हमने धीरे-धीरे भुला दिया होता है।
खेर... आप बताओ आपने कभी नारियल का लच्छा खाया हैं।
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बारिश, गर्मी, सर्दी... मौसम कोई भी हो। घर, सड़क, या रेस्टोरेंट... जगह कोई भी हो। लेकिन जब सामने आग पर सिंकती हुई लिट्टी, अंदर सत्तू, ऊपर से देसी घी... और साथ में बैंगन, आलू और टमाटर का चोखा हो, तो एक ही बार में समझ आ जाता है कि आखिर बिहार में लिट्टी-चोखा को लेकर इतना प्यार क्यों है।
स्वाद तो है ही, लेकिन लिट्टी-चोखा का असली प्रेमी वही है, जिसे इसके इतिहास के बारे में भी पता हो।
कहते हैं कि लिट्टी बिहार के पुराने मगध क्षेत्र की खान-पान परंपरा से जुड़ी है। इसे बनाने के लिए न बहुत ज़्यादा बर्तनों की ज़रूरत होती थी, न ही ढेर सारी सामग्री की। सत्तू से भरी लिट्टी को आग पर आसानी से सेंका जा सकता था। यही वजह थी कि यह किसानों, मज़दूरों और लंबी यात्रा करने वालों के लिए आसान, सुविधाजनक और पेट भरने वाला भोजन बन गई।
समय के साथ लोगों ने इसके साथ चोखा जोड़ा, जिसे भुने हुए बैंगन और टमाटर, उबले आलू, प्याज़, हरी मिर्च, धनिया और सरसों के तेल के साथ तैयार किया जाता है।
इतनी साधारण सामग्री से बने इस व्यंजन से बेहतर स्वाद शायद ही कहीं मिले। शायद इसीलिए कभी बिहार के गाँवों और रास्तों का आम भोजन रहा लिट्टी-चोखा आज देश-विदेश के बड़े शहरों, रेस्तरां और फूड फेस्टिवल्स तक अपनी जगह बना चुका है।
यही हमारी क्षेत्रीय पाक विरासत की खूबसूरती है—जो खाना कभी ज़रूरत और स्थानीय संसाधनों से पैदा हुआ, वही समय के साथ पूरे प्रदेश की पहचान बन गया।
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याद कीजिए, बचपन में आपके घर में कोई ऐसी dish ज़रूर बनती होगी, जिसका taste आज कहीं नहीं मिलता।
हो सकता है वह आपकी दादी की कोई खास recipe रही हो, किसी त्योहार पर बनने वाली डिश या फिर ऐसी चीज़, जिसे बनाने का तरीका घर में सिर्फ़ एक-दो लोगों को ही पता था।
अब सोचिए... अगर अगली पीढ़ी ने उसे बनाना ही नहीं सीखा, तो उन्हें उसके स्वाद के बारे में कैसे पता चलेगा… और आखिर में फिर उस स्वाद का होगा क्या ?
भारत में ऐसी सिर्फ़ एक-दो नहीं, बल्कि अनगिनत रेसिपीज़ हैं, जो धीरे-धीरे हमारी रसोई और हमारी थाली से दूर होती जा रही हैं। बदलती जीवनशैली, जल्दी बनने वाले खाने और कुछ चुनिंदा व्यंजनों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच कई स्थानीय व्यंजन पीछे छूट गए।
लेकिन, जिन्हें हम आज “lost recipes” कहते हैं, उनमें से कई वास्तव में खोई ही नहीं हैं। वे आज भी किसी गांव के घर में बन रही हैं, किसी छोटे शहर के त्योहार का हिस्सा हैं या किसी बुज़ुर्ग के पास उनकी recipe आज भी safe है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि हममें से बहुत से लोग अब उनके बारे में जानते नहीं हैं।
और यही वजह है कि भारत की पुरानी और भूली-बिसरी रेसिपीज़ को फिर से सामने लाना इतना ज़रूरी है।
क्योंकि एक recipe सिर्फ़ यह नहीं बताती कि खाने में क्या डालना है और उसे कैसे पकाना है। उसके पीछे पूरी कहानी होती है, उस इलाके में क्या उगता था, मौसम के हिसाब से लोग क्या खाते थे, त्योहार कैसे मनाए जाते थे और उपलब्ध चीज़ों से स्वादिष्ट खाना कैसे बनाया जाता था।
हमारे कई पुराने व्यंजन स्थानीय अनाज, सब्ज़ियों, मसालों और पारंपरिक तरीकों पर आधारित रहे हैं। यानी जिन्हें आज हम local, seasonal और sustainable eating कहते हैं, वह हमारी रसोई में पीढ़ियों से मौजूद रहा है।
इसका एक अच्छा उदाहरण "पांता भात" है। पूर्वी भारत में लंबे समय से खाया जाने वाला यह बेहद साधारण भोजन जब International Stage पर चर्चा में आया, तो अचानक बहुत से लोगों ने इसे नए नज़रिए से देखना शुरू किया।
लेकिन हर पारंपरिक व्यंजन को पहचान मिलने के लिए किसी बड़े मंच का इंतज़ार क्यों करना पड़े?
हमें अपने घरों से शुरुआत करनी होगी। दादी-नानी से उनकी रेसिपीज़ पूछनी होंगी, पुराने पकवानों को लिखना और रिकॉर्ड करना होगा, स्थानीय लोगों से उनके पीछे की कहानियाँ जाननी होंगी और सबसे ज़रूरी, उन्हें फिर से अपनी रसोई में बनाना होगा।
क्योंकि जब कोई रेसिपी हमारे खाने से गायब होती है, तो सिर्फ़ एक स्वाद नहीं जाता। उसके साथ एक कहानी, एक तरीका, स्थानीय सामग्री से जुड़ा ज्ञान और हमारी संस्कृति का एक छोटा-सा हिस्सा भी चला जाता है।
भारत की पाक विरासत को बचाने का शायद सबसे आसान तरीका यही है, जो स्वाद हमें पिछली पीढ़ियों से मिले हैं, उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुँचा दें।
वरना एक दिन हमारी कई पसंदीदा रेसिपीज़ सिर्फ़ किताबों और तस्वीरों में रह जाएँगी... और कोई यह बताने वाला नहीं होगा कि "हमारे घर में इसे ऐसे बनाया जाता था।"
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भारत में कई व्यंजनों की शुरुआत रसोई से नहीं... मंदिरों से हुई है।
रसबली ऐसी ही एक पारंपरिक ओड़िया मिठाई है, जिसे विशेष रूप से रथ यात्रा के अवसर पर तैयार किया जाता है और भगवान जगन्नाथ को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग का हिस्सा माना जाता है।
यही भारतीय पाक विरासत की खूबसूरती है, यहाँ भोजन सिर्फ़ पेट नहीं भरता, बल्कि परंपराओं, श्रद्धा और संस्कृति को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाता है।
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गर्मी का मौसम हो, सामने मिट्टी का कुल्हड़ हो और उसमें ठंडी-ठंडी, गाढ़ी लस्सी... फिर भला और क्या चाहिए?
लस्सी उन ड्रिंक्स में से है जो भारत के किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं हैं। पंजाब के ढाबों से लेकर राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों तक, जगह बदलते ही लस्सी का स्वाद, गाढ़ापन और उसे परोसने का अंदाज़ भी बदल जाता है।
कहीं इसे मिट्टी के कुल्हड़ में ऊपर मोटी मलाई के साथ परोसा जाता है, कहीं नमकीन लस्सी में जीरा और मसाले डाले जाते हैं, तो कहीं मीठी लस्सी में केसर, इलायची, गुलाब या सूखे मेवे अपना स्वाद जोड़ते हैं।
लेकिन इन सभी के बीच इसकी बुनियाद बेहद सरल है, दही को मथना और उससे एक ऐसी ड्रिंक तैयार करना जो स्वादिष्ट होने के साथ गर्म मौसम में ताज़गी भी दे।
दही को मथकर ड्रिंक बनाने की परंपरा भारतीय खान-पान में बहुत पुरानी रही है। समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों ने इसमें अपनी स्थानीय पसंद और सामग्री जोड़ी और लस्सी के कई रूप बनते चले गए।
इसी कहानी में कानपुर देहात की लस्सी का भी अपना अंदाज़ है। यहाँ गाढ़े दही को पारंपरिक तरीके से मथकर उसमें चीनी मिलाई जाती है और ऊपर से मलाई या रबड़ी डालकर इसे भरपूर स्वाद दिया जाता है। कुल्हड़ में परोसी गई यह गाढ़ी लस्सी स्थानीय खान-पान का जाना-पहचाना हिस्सा है।
आपके शहर में लस्सी किस अंदाज़ में बनाई जाती है—मीठी, नमकीन, मलाई वाली या किसी और तरीके से? 👇
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विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर के अन्नक्षेत्र में एक खूबसूरत नई शुरुआत हुई है।
‘#EkBharatAnekParampara’ पहल के तहत अब हर मंगलवार और शुक्रवार श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में इडली, डोसा, वड़ा, सांभर, नारियल की चटनी, लेमन राइस, कर्ड राइस और पोंगल जैसे South Indian Cuisines भी परोसे जाएंगे।
अब सोचिए... बाबा महाकाल के दर्शन के लिए तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना या केरल से आया कोई श्रद्धालु जब उज्जैन में प्रसाद ग्रहण करे और थाली में उसे अपने घर का कोई जाना-पहचाना स्वाद मिल जाए... तो वह सिर्फ़ भोजन नहीं, बल्कि अपनेपन का एहसास भी होगा।
और बात सिर्फ़ menu में कुछ नई dishes जोड़ने की नहीं है।
भारत में भोजन हमेशा से लोगों को जोड़ने का माध्यम रहा है। हमारे देश की खूबसूरती ही यही है कि हर कुछ किलोमीटर पर स्वाद, ingredients और बनाने का तरीका बदल जाता है, लेकिन साथ बैठकर खाने और भोजन के ज़रिए जुड़ने का भाव नहीं बदलता।
महाकाल के दर्शन के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु उज्जैन पहुँचते हैं। उनकी भाषा अलग हो सकती है, पहनावा अलग हो सकता है और उनकी रसोई का स्वाद भी अलग हो सकता है। लेकिन जब सभी एक जगह बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, तो ये सारी दूरियाँ कहीं पीछे छूट जाती हैं।
हम अक्सर कहते हैं कि Indian cuisine की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी diversity है। शायद इसे समझने के लिए इससे बेहतर तस्वीर मुश्किल है।
क्योंकि भारत को जोड़ने वाली चीज़ें सिर्फ़ भाषा, संगीत और त्योहार नहीं हैं... कई बार एक dish भी पूरे देश को करीब ले आती है।
#CuisinesOfIndia #Mahakaleshwartemple
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Hepatitis E is more common than many people realize, and in most cases, it spreads through contaminated drinking water.
While most people recover within a few weeks, Hepatitis E can be particularly dangerous for pregnant women, especially during the third trimester. Safe drinking water, good hygiene, proper sanitation, and handwashing remain the most effective ways to reduce the risk.
#WorldHepatitisDay #PreventiveHealthcare #LetsBreakItDown #IllnessToWellness
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अगर आपने अभी तक नागालैंड का #Kingpineapple नहीं खाया... तो समझ लीजिए आपको अभी बहुत कुछ खाना बाकी है!
There's a reason people keep talking about Nagaland pineapples. Their sweetness, aroma, and juiciness are in a league of their own. And the best part? They're not just eaten fresh.
In Naga kitchens, these pineapples find their way into smoky chutneys, tangy pickles, pork and pineapple curries, bamboo shoot & pineapple dishes, etc, and this is exactly why local produce deserves as much recognition as the dishes themselves.
Thank you, @AlongImna ji and @abumetha ji, for updating us with another delicious chapter of #Nagaland's culinary heritage. We look forward to discovering so many stories from the state's kitchens that deserve to be celebrated.
#CuisinesOfIndia #NagaCuisine
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भारतीय मिठाइयों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वे सिर्फ़ चीनी से नहीं, बल्कि परंपराओं से मीठी होती हैं।
अमेठी की गुड़ की खीर इसका एक सुंदर उदाहरण है। सदियों से भारत में गुड़ को सिर्फ़ एक मिठास नहीं, बल्कि प्रकृति का उपहार माना गया है। रिफाइंड चीनी के व्यापक प्रचलन से पहले, गुड़ ही अधिकांश भारतीय घरों में मिठास का मुख्य स्रोत था। त्योहारों, पूजा-पाठ, फसल कटाई और पारिवारिक उत्सवों में गुड़ से बनी खीर शुभता, समृद्धि और अपनापन का प्रतीक मानी जाती रही है।
अमेठी की यह पारंपरिक खीर शुद्ध दूध, चावल और देशी गुड़ के संतुलित मेल से तैयार होती है। धीमी आँच पर धैर्यपूर्वक पकाने की कला और सही समय पर गुड़ मिलाने की तकनीक ही इसके स्वाद और सुगंध को खास बनाती है।
यही वजह है कि इसे @UP_ODOC के अंतर्गत एक स्थानीय व्यंजन के साथ साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत के हिस्से के रूप में शामिल किया हैं।
वैसे... आपके घर में खीर चीनी से बनती है या गुड़ से?👇
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The #IndiaUSJointStatement signals a decisive leap in economic engagement between two major growth engines of the world. A balanced framework that expands opportunities for trade, technology and investment will strengthen Indian enterprises, especially MSMEs, start-ups and export-oriented industries, while ensuring protection for sensitive sectors.
Congratulations to Hon’ble PM @narendramodi ji and Hon’ble Minister @PiyushGoyal ji for steering this outcome through focused and forward looking negotiations.
This agreement will energise industry, enhance competitiveness and deepen India’s integration with global value chains.
@PMOIndia | @CimGOI | @DoC_GoI | @PIB_India | @IMC_India | @PiyushGoyalOffc
We are pleased to welcome Mr. Anoop Vrajlal Mehta, Chairman & Managing Director, Mohit Diamonds Pvt. Ltd. and President, Bharat Diamond Bourse, as a Speaker at the 26th IMC Bharat Calling Conference 2026.
With deep expertise in global trade and exports, Mr. Mehta will be part of the Enabling India’s Export Surge Panel on:
“From Factory to World: Doubling India’s Exports through Trade Corridors & FTAs.”
📅 27th February 2026
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We are delighted to announce that the 26th IMC Bharat Calling Conference 2026 is proudly supported by Mitchell USA (@MitchellUSAIN) as the Gold Partner.
This association reflects a shared vision of strengthening India’s manufacturing ecosystem and accelerating its journey towards becoming a globally competitive manufacturing and export powerhouse.
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📅 Friday, 27th February 2026
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