तुम भी उन्हीं लोगों की तरह बनकर रह गए...
जो न पूर्ण रूप से साथ होते हैं, न ही कभी सच में दूर जा पाते हैं,बस अपनी अधूरी उपस्थिति के साथ हृदय में एक अनचाही रिक्तता छोड़ जाते हैं, जो अंततः पीड़ा का रूप ले लेती है,क़रीब इतने कि भुलाए न जा सकें और दूर इतने कि मिलन भी संभव न हो सके...
पहली बार मिलने के बाद :
वो बोला उसे की चलो घर छोड़ देता हूं , अकेले नही जाने दूंगा।
वो जो परिवार की सबसे बड़ी जिम्मेदार लड़की थी एक पल को उसे लगा कि ऐसा कैसे हो सकता कि कोई उसका भी ख़्याल रख सकता है। आजतक तो वही सबको लाती ले जाती थी।
उसे घर छोड़ कर वो जाने लगा तो
वो बोली : सुनो , ध्यान से जाना और मैसेज करना घर पहुँचते ही।
इतना सुन कर वो एक पल को सोच मे पड़ गया आज तक तो मैं सबका ध्यान रखता आया हूं , ऐसे कैसे अचानक कोई यूँ मिल गयी मुझे मेरा ध्यान रखने वाली ....
कुछ जो अधूरा था जीवन मे , एक दूसरे में शायद ढूंढ लिया था दोनों ने।
मैं जानता था कि तुम मेरे लिए ठहरोगी ही नहीं इसीलिए मैं पीछे मुड़कर देखा ही नहीं कभी। मैं जानता हुं मुझसे दूर जाने के बाद अपने जीवन को तुम अपने हिसाब से जीने लायक बना लीं होगी। अब मैं तुम्हें फेसबुक, इंस्टा हर जगह खोजना बंद कर दिया हूं। मुसलसल भूल रहा हुं तुम्हें।
प्यार और अपनापन ऐसा नहीं कि कोई आपको आपके हिसाब से दे,इनका अपना समय, स्थान और व्यक्ति निश्चित होता है,शायद जिससे आप चाह रहे वो ना भी हो।
क्यों करनी नाकाम कोशिश?इससे आप उन्हें बस फालतू लगने लगेंगे और कुछ नहीं, इससे अच्छा है कि नाउम्मीदी में जीवन बिताएं,खुश रहे, उन पर ध्यान ना दें।
हम जितना सोच भी नहीं सकते
उससे कई गुना अधिक दुःख इस संसार में है
लोग पीड़ा में हैं असहाय हैं
हाँ, प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों और उनके परिणामों का भागी है
और उन्हें भोगना भी पड़ता है
फिर भी यदि हमारे हृदय में दया और करुणा का उदय हो
और हम किसी एक व्यक्ति के भी काम आ सकें
तो शायद यही मानव होने का सबसे सुंदर अर्थ है...!!
ये जीवन का ठीक वो दौर रहा जिसमें मैं अपने प्रेम को किसी और होते देखा हूँ, अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ है, और मन कर रहा है भागकर, आवाज़ लगाकर, कैसे भी रोक लूं... मगर दिमाग कह रहा है, बस बहुत हुआ.. जिसको जाना था वो चला गया, मुझमें जितना सामर्थ्य था मैंने कर दिया...!!!
प्रेम करना अच्छी बात है, लेकिन प्रेम में यह समझना बहुत जरूरी है कि सामने वाला आपसे जुड़ा जरूर है, लेकिन वह आप नही हैं। इसलिए ज्यादा ख्याल रखना कभी-कभी सामने वाले के लिए असहजता बन जाती है। क्योंकि हर व्यक्ति का अपना एक अलग अस्तित्व है, अपनी सोच, अपनी सीमाएँ, अपनी प्राथमिकताएँ हैं।
जिस्म मेरी ग़र्ज़ है, कमज़ोरी है,
मोहब्बत से मेरा कोई वास्ता नहीं,
मैं कई मोहब्बत साथ कर सकता हूँ,
वफ़ा से मेरा कोई वास्ता नहीं।
मोहब्बत आशिक़ों से खेलती है, और आवारा......खेल रहा है मोहब्बत से,
तवायफ़ भी शामिल हैं मेरी महबूबाओं में,
हाँ शर्म से मेरा कोई वास्ता नहीं।
- अज्ञात 🍁
अगर मैं उसके लौटने से पहले मर जाऊँ
तो उससे कहना,
मैंने आख़िरी दिनों में कोई बड़ी दुआ नहीं माँगी थी,
बस यही कि एक बार दरवाज़ा खुले
और वो लौट आए,
जैसे सूने आँगन में धूप उतरती है।
उससे कहना
मैंने उसका नाम लेना नहीं छोड़ा।
मैं हर रात उसकी याद को सिरहाने रखकर सोया,
जैसे कोई बूढ़ा अपनी मर चुकी औरत की चूड़ियाँ
बरसों संदूक में सँभालकर रखता है।
और ये भी कहना
कि जब रूह जिस्म से अलग हो रही थी,
तो मुझे मौत से ज़्यादा दुख इस बात का था
कि वो उस वक़्त मेरे पास नहीं थी।
मेरी साँस टूट रही थी,
मगर इंतज़ार नहीं टूटा था।
अगर वो कभी लौटे,
तो मेरी क़ब्र पर आने की ज़रूरत नहीं,
बस एक बार मेरा नाम लेकर इतना समझ ले
कि एक आदमी था
जो आख़िरी साँस तक उसी का रहा,
और शायद मरकर भी
उसी का इंतज़ार करता रह गया।
- मलाल 🍁
एक उम्र के बाद हम शराब को नशे के लिए नहीं पीते बल्कि इसलिए पीते हैं क्योंकि हर घूंट के साथ कुछ न कुछ याद आता है,पहला पैग लेते ही वो चेहरे,वो बातें,वो जगहें और आख़िरी पैग तक आते-आते जैसे पूरा अतीत जी लेते हैं
दरअसल हम शराब नहीं पीते हम वो वक़्त पीते हैं,जो कभी हमारा था...!
मेरी सबसे बड़ी समस्या शायद यही है कि मैं सभी को अपने जैसा समझ लेता हूँ मैं जैसा हूँ,वैसा ही सबको भी मान बैठता हूँ और उनसे भी वही संवेदनशीलता और वही व्यवहार की उम्मीद करने लगता हूँ लेकिन जब वो मेरी तरह नहीं होते,तो शिकायत उससे कम और उदासी खुद से ज़्यादा होने लगती है...!
संतुलित जीवन चाहिए तो किसी भी चीज में जबरदस्ती मत करो चाहे वो बात करनी हो, दोस्ती हो, कोई रिश्ता हो या प्यार हो। जिस भी चीज के लिए भीख मांगनी पड़े/जोर लगाना पड़े, वो आपके काम की नही है। जो चीज जैसी चल रही है, उसे वैसे ही चलने दो। जो रुकता है उसे रुकने दो, जो जाता है उसे जाने दो।
एक आखिरी ख्वाब था,
मिलना था तुमसे उस छोर पर जहाँ दो किनारे मिला करते हैं,
जहाँ हमें कोई जानता नहीं बस अजनबी कहा करते हैं,
हर ख्वाब की तरह ये भी धुँधला सा हो गया जमाने की धुंध में,
याद हो तो तुम चले आना जहाँ अक्सर हम तुम्हारा इंतजार करते हैं।
मनुष्य को प्रेम की आवश्यकता इसलिए नहीं होती
कि वह अकेला है, बल्कि इसलिए होती है
कि उसके भीतर अनगिनत भावनाएँ होती हैं,
जिन्हें सुनने वाला कोई एक हृदय चाहिए !
जैसे नदी को समुद्र, चाँद को आकाश और शब्दों को अर्थ
वैसे ही मनुष्य को मनुष्य चाहिए - प्रेम के रूप में..!!❤️🪽
अब मैं न किसी के आने को भाग्य का खेल मानता हूँ..!!
न किसी के जाने को नियति का दंड..!!
मैं बस इतना जान गया हूँ कि सबसे मार्मिक सच यह है कि जिसे हम सबसे ज़्यादा चाहते हैं वही हमें सबसे ज़्यादा हमे खुद से मिलाता भी है और धीरे-धीरे खुद से अलग भी करता जाता है...!!!
मैं वो नहीं, जिसे ढूंढा जाए..मैं वो नहीं, जिसकी चाहत हो
मैं वो नहीं, जो खो गया,
मैं वो जो छोड़ा गया, मैं वो जो योग्य नहीं... मैं वो जो आसानी से मिल गया और इसी कारण अब मैं वो हो गया हूं जो कुछ भी नहीं, किसी का...
सुनो मैंने हमेशा चाहा मेरे अंतिम समय मे मिलना तुम मुझे तुम्हें देखते हुए आंखें बंद करनी है..
मत आना जिंदगी की इतनी ज्यादा चाह मुझे कभी नहीं हुई होगी जितनी उस पल होगी जब तुम सामने होगे और मुझे हमेशा के लिए जाना पड़ेगा.. इतने तङपते हुए नहीं मरना चाहती हूं..